Edited By Sarita Thapa,Updated: 31 May, 2026 10:09 AM

ताइवान की पहचान बन चुकी ‘ताइपै 101’ इस देश की आधुनिक सोच और इंजीनियरिंग क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग 508 मीटर ऊंची इमारत वर्ष 2004 में तैयार हुई और उस समय दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में शामिल थी और 2015 तक उसका यह जलवा कायम भी रहा।
Taiwan Historical Story : ताइवान की पहचान बन चुकी ‘ताइपै 101’ इस देश की आधुनिक सोच और इंजीनियरिंग क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग 508 मीटर ऊंची इमारत वर्ष 2004 में तैयार हुई और उस समय दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में शामिल थी और 2015 तक उसका यह जलवा कायम भी रहा। 101 मंजिलों वाली यह इमारत दूर से देखने पर बांस के लंबे पौधे जैसी दिखाई देती है, जो पारंपरिक एशियाई संस्कृति में समृद्धि और विकास का प्रतीक माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत ‘ट्यून्ड मास डैम्पर’ तकनीक है। इमारत के भीतर लटकाई गई करीब 660 टन वजनी विशाल सुनहरी स्टील की गेंद तेज हवा और भूकम्प के दौरान कम्पन को नियंत्रित करती है। यही कारण है कि भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में होने के बावजूद यह इमारत बेहद सुरक्षित मानी जाती है।
इसकी तेज रफ्तार लिफ्ट भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है, जो महज 37 सैकेंड में पांचवीं मंजिल से 89वीं मंजिल तक पहुंचा देती है यानी हमारी 89 तक तेजी में की जाने वाली गिनती पूरी भी नहीं हुई और हम 89वीं मंजिल पर थे... और 89 मंजिल से सब कुछ साफ नजर आ रहा था। सामने की कई बिल्डिंगों के ऊपर लगा ‘एच’ का निशान दर्शाता था कि हैलीकॉप्टर से कभी भी यहां उतरा-चढ़ा जा सकता है। ताइवान आधुनिक तकनीक तक सीमित नहीं, यहां मौजूद नैशनल पैलेस म्यूजियम एशिया की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में गिना जाता है। वर्ष 1965 में स्थापित इस संग्रहालय में 7 लाख से अधिक ऐतिहासिक वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। यहां हजारों साल पुरानी पेंटिंग, मूर्तियां, चीनी मिट्टी के बर्तन और दुर्लभ कलाकृतियां मौजूद हैं। संग्रहालय की हर गैलरी चीन के अलग-अलग राजवंशों और उनकी कला परंपराओं की कहानी सुनाती है।
राजधानी ताइपै में स्थित च्यांग काई-शेक मैमोरियल हॉल ताइवान के राजनीतिक इतिहास और राष्ट्रीय स्मृति का प्रमुख प्रतीक है। लगभग अढ़ाई लाख वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला यह स्मारक ताइवान के पूर्व राष्ट्रपति और राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई-शेक की याद में बनाया गया था। सफेद संगमरमर से बनी इसकी भव्य इमारत और नीली अष्टकोणीय छत दूर से ही पर्यटकों का ध्यान आकॢषत करती है। स्मारक तक पहुंचने के लिए 89 सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं, जो उनकी उम्र का प्रतीक मानी जाती हैं। हर घंटे होने वाली गार्ड चेंजिंग सैरेमनी पर्यटकों के लिए खास आकर्षण रहती है। ताइवान की धार्मिक विविधता और सांस्कृतिक आस्था की झलक लुंगशान मंदिर में साफ दिखाई देती है। लगभग 300 वर्ष पुराना यह मंदिर ताइपै के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है।

शुरुआत में यह मंदिर बौद्ध देवी गुआनयिन की पूजा के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में यहां ताओ और लोक धर्मों से जुड़े देवी-देवताओं की भी पूजा होने लगी। यही वजह है कि यह ताइवान की धार्मिक सहिष्णुता और विविधता का प्रतीक माना जाता है। भव्य नक्काशी, पारंपरिक छतें और लाल-सुनहरे रंगों से सजा वातावरण पर्यटकों को पुराने ताइवान की अनुभूति कराता है। जैसे भारत में होता है, भगवान से मान-मनौव्वल की आदत यहां पर भी खूब है। इसके लिए बाकायदा दो पांसे की तरह के प्लास्टिक की आकृति का इस्तेमाल किया जाता है। इसी के आधार पर पता चलता है कि काम होगा या नहीं।
काउशुंग शहर में झील के किनारे स्थित 7 मंजिला ड्रैगन एंड टाइगर पैगोडा पारंपरिक चीनी और ताओवादी वास्तुकला शैली में तैयार किए गए हैं। पर्यटक ड्रैगन के विशाल मुंह से प्रवेश करके टाइगर के मुंह से बाहर निकलते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह प्रक्रिया सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। रंग-बिरंगी सजावट और झील के खूबसूरत दृश्य इस स्थान को बेहद आकर्षक बनाते हैं। इसी झील के पास बने स्प्रिंग एंड ऑटम पवेलियन भी पर्यटकों को आकॢषत करते हैं। चार मंजिला और अष्टकोणीय आकार में बने ये मंडप ताइवान की पारंपरिक ताओवादी संस्कृति का शानदार उदाहरण हैं। इनके सामने ड्रैगन पर सवार दया की देवी गुआनयिन की विशाल प्रतिमा बनाई गई है। दोनों मंडपों को जोडऩे वाला ‘नाइन-बैंड ब्रिज’ इस जगह की सुंदरता को और बढ़ा देता है।

पुराने ताइपे की झलक देखनी हो तो दिहुआ ओल्ड स्ट्रीट खास मानी जाती है। लगभग 150 साल पुरानी यह सड़क ताइवान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। 19वीं शताब्दी में यह इलाका चाय व्यापार का बड़ा केंद्र था। आज यहां पुरानी लाल ईंटों वाली इमारतों को संरक्षित करके उनमें कैफे, आर्ट गैलरी और डिजाइन स्टूडियो बनाए गए हैं। चीनी, जापानी और पश्चिमी वास्तुकला का अनोखा मिश्रण इस सड़क को अलग पहचान देता है। ताइवानियों की जीवन प्रत्याशा, यानी वे कितनी औसत उम्र जीते हैं, यह भी जानकर ताज्जुब होगा कि यह 80 साल से ज्यादा है जबकि भारत में 70 के आसपास ही है। इसका कारण उनका हैल्दी खान-पान है। मिर्च-मसाला काफी कम खाते हैं और हरी सब्जियों और सूप पर ज्यादा ध्यान होता है।

हमने तो शिताऊ में ली मिडी होटल में अपने लिए खुद भी शानदार डिश बनाने में सफलता पाई लेकिन यहां साथ में जब ‘आवारा हूं...’ गाने के अलावा ‘दिल तो दीवाना है’ सैक्सोफोन पर सुना तो सोने पर सुहागा हो गया। इसी तरह ताइपे में विश्वप्रसिद्ध बबल टी (वह भी इसके जनक सुन शी तंग के होटल में) का आनंद भी अलग रहा। ताइवान की यही खासियत उसे दुनिया के बाकी देशों से अलग बनाती है कि यहां आधुनिक तकनीक और पारंपरिक संस्कृति के बीच कोई टकराव दिखाई नहीं देता, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर आगे बढ़ते हैं। गगनचुंबी इमारतों से लेकर प्राचीन मंदिरों तक, हर जगह ताइवान अपने इतिहास, संस्कृति और भविष्य की झलक एक साथ दिखाता है। अनुशासन तो यहां गजब का है। कोई भी कार बेतरतीब से नहीं दिखेगी। बैटरी चालित स्कूटर यहां 90 प्रतिशत से ज्यादा हैं और कहीं पर भी रखा जाता है तो करीने से। यही कारण है कि यह छोटा-सा द्वीप देश आज दुनिया भर के यात्रियों, इतिहास प्रेमियों और वास्तुकला में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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