Edited By Sarita Thapa,Updated: 04 Aug, 2026 11:00 AM

हिंदू धर्म में ग्रहण को एक बहुत अध्यात्मिक और खगोलीय घटना माना जाता है। ग्रहण लगने से कुछ घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है, इस दौरान कुछ कामों को करने की सख्त मनाही होती है।
Why not to touch idols in eclipse : हिंदू धर्म में ग्रहण को एक बहुत अध्यात्मिक और खगोलीय घटना माना जाता है। ग्रहण लगने से कुछ घंटे पहले ही सूतक काल लग जाता है, इस दौरान कुछ कामों को करने की सख्त मनाही होती है। सूतक काल लगने के बाद कुछ खास नियमों का पालन करना बहुत जरूरी होता है। उन्हीं नियमों में एक है ग्रहण के दौरान न तो भगवान की पूजा की जाती है न ही उनकी मूर्तियों को छुआ जाता है। ग्रहण के दौरान मंदिर के सारे कपाट भी बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ग्रहण में ऐसा क्यों किया जाता है। तो आइए जानते हैं इसके पीछे के कारण के बारे में-
धार्मिक मान्यता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब राहु और केतु नामक राक्षसों ने छल से अमृत पान कर लिया था, तब सूर्य और चंद्रमा ने भगवान विष्णु को यह बात बताई थी। इसी शत्रुता के कारण राहु और केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रास बनाते हैं, जिसे हम ग्रहण कहते हैं। धार्मिक दृष्टि से, ग्रहण के समय ब्रह्मांड के इन दो प्रमुख प्रकाश स्रोतों पर संकट होता है, जिससे पूरे वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा और अशुद्धता फैल जाती है। चूंकि देवी-देवता अत्यंत पवित्र और सात्विक ऊर्जा के प्रतीक हैं, इसलिए इस अशुद्ध या दूषित समय में भगवान की मूर्ति को छूना वर्जित माना गया है, ताकि हमारी नकारात्मकता या वातावरण का दोष उन तक न पहुंचे।
वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण
अगर इसे वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो सूर्य ग्रहण के समय सूर्य से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेटऔर अन्य हानिकारक किरणें पृथ्वी के वातावरण को प्रभावित करती हैं। इस दौरान जीवाणु और सूक्ष्म जीव तेजी से पनपते हैं। प्राचीन काल में ऋषियों ने वातावरण के इस बदलाव को भांप लिया था। चूंकि मूर्तियों की सफाई और पूजा के लिए पानी व अन्य सामग्रियों का उपयोग होता है, जिनमें इस दौरान बैक्टीरिया पनपने का खतरा सबसे ज्यादा होता है, इसलिए संक्रमण से बचने के लिए मूर्तियों को न छूने और पूजा न करने का नियम बनाया गया।
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