ड्रैगन के गेम की खुली पोलः नेपाल ने 3 महीने पहले ही मांगी थी चीन से मदद, अब तबाही के बाद दिखा रहा झूठी सहानुभूति

Edited By Updated: 31 Aug, 2026 04:20 PM

before floods nepal asked china for early warnings as risks mounted

Reuters के अनुसार, नेपाल और चीन ने 27 मई को ग्लेशियर, बाढ़ और सीमा-पार आपदाओं पर सहयोग के लिए बैठक की थी। नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बाद में उन्हें पर्याप्त ग्लेशियर और जलस्तर संबंधी डेटा नहीं मिला। चीन ने आरोप खारिज करते हुए कहा कि जरूरी...

 Kathmandu: नेपाल में विनाशकारी बाढ़ ने 900 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और हजारों लोग अब भी लापता हैं। लेकिन इस त्रासदी के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है क्या नेपाल ने इस खतरे को लेकर चीन से पहले ही मदद और अहम जानकारी नहीं मांगी थी?  Reuters  की रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ से करीब तीन महीने पहले नेपाल और चीन के अधिकारियों की बैठक हुई थी, जिसमें ग्लेशियर, बाढ़ और सीमा-पार आपदाओं की निगरानी को लेकर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई थी। नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बैठक के बाद उन्हें चीन से उतना डेटा नहीं मिला, जितना उन्होंने मांगा था। Reuters के मुताबिक, 27 मई को काठमांडू में नेपाल और चीन के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों की बैठक हुई थी। 

 

संभावित खतरों पर दोनों देशों की हुई थी बात
 इस बैठक में नेपाल की तरफ से करीब 10 अधिकारी और चीन की तरफ से लगभग एक दर्जन अधिकारी शामिल हुए थे। इनमें तिब्बत के अधिकारी भी थे। बैठक का मुद्दा बेहद संवेदनशील था हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, खराब मौसम, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे। यानी जिस क्षेत्र में तीन महीने बाद भयावह तबाही हुई, उससे जुड़े संभावित खतरों पर दोनों देशों के अधिकारी पहले ही बातचीत कर चुके थे।  बैठक में नेपाली पक्ष ने ग्लेशियल झीलों की सूची तैयार करने, जोखिम वाले इलाकों की मैपिंग और आपदा की शुरुआती चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने जैसे मुद्दे उठाए थे। नेपाल के हाइड्रोलॉजिस्ट सौहार्द्र जोशी, जो उस बैठक में शामिल थे, ने Reuters को बताया कि नेपाल चाहता था कि अगर ग्लेशियर या उसके आसपास के इलाके में कोई शुरुआती बदलाव दिखाई दे तो उसे पहले से जानकारी मिल सके। यानी नेपाल की मांग सिर्फ सामान्य मौसम पूर्वानुमान तक सीमित नहीं थी। वह ग्लेशियर की गतिविधियों और पानी के स्तर में संभावित बदलाव की अग्रिम जानकारी चाहता था। लेकिन नेपाली अधिकारियों को पर्याप्त डेटा नहीं मिला।

 

चीन की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल
यहीं से चीन की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल उठता है।  Reuters के मुताबिक, नेपाल के दो अधिकारियों ने कहा कि मई की बैठक के बाद उन्हें ग्लेशियर से जुड़े खतरों और जलस्तर के बारे में उतनी जानकारी नहीं मिली, जितनी उन्होंने मांगी थी। नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि चीन मौसम संबंधी पूर्वानुमान और भारी बारिश की जानकारी साझा करता था, लेकिन दूसरे गंभीर खतरों खासकर ग्लेशियर में बदलाव के बारे में सूचना पर्याप्त नहीं थी। नेपाल में चीनी दूतावास का कहना है कि दोनों देश लगातार संपर्क में थे और मई की बैठक में सीमा-पार आपदा संबंधी जानकारी साझा करने में “काफी प्रगति” हुई थी।चीनी पक्ष ने यह भी कहा कि हिमालय के बेहद दुर्गम इलाकों में खतरे की निगरानी करना बहुत कठिन है और चीनी तथा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को वहां कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दूतावास के अनुसार, चीनी टीमों ने नेपाल के साथ महत्वपूर्ण जानकारी समय पर साझा की थी। इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में नेपाल का आरोप और चीन का बचाव दोनों मौजूद हैं।

 

ग्लेशियर बना आपदा का प्रमुख कारण
 सबसे बड़ा सवाल है कि क्या चेतावनी मिलती तो नुकसान कम होता? दरअसल, 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर बर्फ और चट्टानों का विशाल मलबा नदी में जा गिरा। इसके बाद अचानक बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। Reuters की सैटेलाइट तस्वीरों की समीक्षा में ग्लेशियर के टूटने और बड़े पैमाने पर मलबा जमा होने के संकेत मिले थे। विशेषज्ञों ने भी ग्लेशियर के अस्थिर होने को आपदा का प्रमुख कारण माना। Reuters के मुताबिक, नेपाल ने पिछले साल भी इसी इलाके में आई बाढ़ के बाद चीन के सामने सीमा-पार जल और ग्लेशियर संबंधी जानकारी साझा करने की जरूरत उठाई थी। उस घटना में नेपाल में कम से कम नौ लोगों की मौत हुई थी और कई लोग लापता हुए थे। यानी दोनों देशों के बीच हिमालयी आपदा और डेटा शेयरिंग का सवाल पहले से मौजूद था। नेपाल और चीन की सीमा का बड़ा हिस्सा अत्यंत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में आता है। इस क्षेत्र में ग्लेशियर, नदियां और ऊंचाई वाले इलाके सीधे दोनों देशों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े हैं। ऐसे में वास्तविक समय में सैटेलाइट डेटा, ग्लेशियर की गतिविधियों और जलस्तर की जानकारी साझा करना केवल पर्यावरणीय सहयोग नहीं, बल्कि सीमा-पार सूचना सहयोग भी बन जाता है। यही कारण है कि नेपाल लंबे समय से अधिक औपचारिक और भरोसेमंद डेटा-शेयरिंग व्यवस्था चाहता है।

 

चीन की मदद सच्ची या...
Reuters के मुताबिक, अब नेपाल चीन के साथ भारत जैसी औपचारिक व्यवस्था चाहता है, जिससे उसे बर्फ की गतिविधियों और पानी के स्तर की रीयल-टाइम जानकारी मिल सके।दिलचस्प बात यह है कि सूचना को लेकर सवालों के बीच चीन अब नेपाल के राहत और बचाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। Reuters के मुताबिक, चीन ने 2,100 से ज्यादा बचावकर्मी भेजे हैं और राहत कार्यों के लिए करीब 3.3 करोड़ डॉलर का प्रावधान किया है। चीन और भारत दोनों के विशेषज्ञ नेपाल के बचाव अभियान में शामिल हैं। यानी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है चीन इस समय नेपाल की मदद भी कर रहा है, लेकिन आपदा से पहले डेटा साझा करने को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं हुए हैं।नेपाल के लिए अब सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि अगली आपदा से पहले उसे कितनी जल्दी और कितनी सटीक जानकारी मिल सकती है। 

 

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