Edited By Tanuja,Updated: 11 Jun, 2026 06:59 PM

ऑस्ट्रेलिया की एक अदालत में सुनवाई के दौरान ISIS के ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिनमें महिला कैदियों और यजीदी महिलाओं को गुलाम बनाने, खरीदने-बेचने और उनके साथ अमानवीय व्यवहार को वैचारिक रूप से सही ठहराने की कोशिश की गई थी। दस्तावेजों ने एक बार फिर...
International Desk: आतंकी संगठन Islamic State (ISIS) की क्रूरता और महिलाओं के प्रति उसकी अमानवीय सोच से जुड़े चौंकाने वाले दस्तावेज ऑस्ट्रेलिया की एक अदालत में सामने आए हैं। सुनवाई के दौरान खुलासा हुआ कि संगठन ने महिलाओं और लड़कियों को गुलाम बनाने, उन्हें खरीदने-बेचने और उनके साथ अमानवीय व्यवहार को वैचारिक आधार देने के लिए बाकायदा लिखित पुस्तिकाएं तैयार की थीं। इन दस्तावेजों का जिक्र उस मामले की सुनवाई के दौरान हुआ, जिसमें कथित तौर पर ISIS से जुड़ी एक महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई चल रही है।
महिलाओं दरिंदगी के लिए बनाई गाइडबुक
अदालत में पेश जानकारी के अनुसार, ISIS के तथाकथित रिसर्च और फतवा विभाग ने एक पुस्तिका तैयार की थी, जिसमें महिला बंदियों और गुलामों से जुड़े सवाल-जवाब शामिल थे। जांचकर्ताओं के मुताबिक, इस दस्तावेज में महिलाओं को इंसान के बजाय एक वस्तु की तरह पेश किया गया था। इसमें उन्हें खरीदने-बेचने, उपहार में देने या अदला-बदली करने जैसी प्रथाओं को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी। साथ ही बंदी महिलाओं के साथ व्यवहार और नियंत्रण को लेकर भी तथाकथित नियम बताए गए थे।
प्रचार सामग्री में भी किया बचाव
अदालत में बताया गया कि ISIS ने अपनी प्रचार पत्रिकाओं और अन्य प्रकाशनों में भी इन प्रथाओं को वैचारिक समर्थन देने का प्रयास किया था। रिपोर्टों के अनुसार, संगठन ने विशेष रूप से यजीदी समुदाय की महिलाओं को बंदी बनाने और उन्हें गुलामी में रखने को सही साबित करने वाले लेख प्रकाशित किए थे। बाद में गुलामी और बंदीकरण से जुड़े अलग-अलग दस्तावेज भी जारी किए गए। अदालत में बताया गया कि अगस्त 2014 में Sinjar क्षेत्र पर ISIS के हमले के बाद यजीदी समुदाय को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया था।
यजीदी युवती का बयान
अनुमानों के अनुसार हजारों यजीदी नागरिक मारे गए। लगभग 6,800 यजीदी महिलाएं और बच्चे बंदी बना लिए गए। कई लोग आज भी लापता हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में भी इन घटनाओं को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताया गया है। सुनवाई के दौरान एक यजीदी युवती का मामला भी सामने आया। आरोप है कि जब वह 15 वर्ष की थी, तब ISIS लड़ाकों ने उसके परिवार पर हमला किया। उसने अदालत में बताया कि उसकी मां और भाई की हत्या कर दी गई। उसे बंदी बनाने के बाद कई वर्षों तक उसे अलग-अलग लोगों के बीच बेचा गया। उसे लगातार शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ीं। उसकी स्वतंत्रता पूरी तरह छीन ली गई थी। जांचकर्ताओं के अनुसार, पीड़िता को बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह काटकर रखा गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि ISIS के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में महिलाओं, विशेषकर यजीदी महिलाओं की स्थिति सबसे अधिक दयनीय थी। उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध बंदी बनाकर रखा जाता था और उनके बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित किया जाता था। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ISIS पर मानवता के खिलाफ अपराध, नरसंहार, गुलामी और यौन हिंसा जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। अदालत में सामने आए दस्तावेज और गवाहियां इस बात की याद दिलाती हैं कि ISIS की हिंसा केवल युद्ध या हत्याओं तक सीमित नहीं थी। संगठन पर आरोप है कि उसने महिलाओं को गुलाम बनाने और उनके साथ अमानवीय व्यवहार को वैचारिक रूप से सही साबित करने की कोशिश की।