Edited By Rohini Oberoi,Updated: 24 Mar, 2026 11:11 AM

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक पूरा देश बिना व्हाट्सएप, गूगल या नेट बैंकिंग के कैसे चलता होगा? पूर्वी अफ्रीका का छोटा सा देश इरिट्रिया आज भी डिजिटल युग की दौड़ में कोसों पीछे है। यहां की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यह भी नहीं जानता कि 'इंटरनेट'...
Country With No Internet : क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक पूरा देश बिना व्हाट्सएप, गूगल या नेट बैंकिंग के कैसे चलता होगा? पूर्वी अफ्रीका का छोटा सा देश इरिट्रिया आज भी डिजिटल युग की दौड़ में कोसों पीछे है। यहां की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यह भी नहीं जानता कि 'इंटरनेट' असल में कैसा दिखता है और कैसे काम करता है।

क्यों है यहां इंटरनेट पर ताला?
इरिट्रिया के इस डिजिटल कटे होने के पीछे तीन सबसे बड़े कारण हैं:
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सरकार का लोहे का हाथ (Strict Control): यहां इंटरनेट पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में है। सरकार तय करती है कि कौन क्या देखेगा। हर ऑनलाइन गतिविधि पर पैनी नजर रखी जाती है जिससे आम नागरिक खुलकर इसका इस्तेमाल करने से डरते हैं।
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जर्जर बुनियादी ढांचा (Broken Infrastructure): यहां न तो ढंग के ब्रॉडबैंड कनेक्शन हैं और न ही मोबाइल टावरों का जाल। जो थोड़ा-बहुत इंटरनेट उपलब्ध है उसकी स्पीड इतनी धीमी है कि एक साधारण वेब पेज खुलने में भी कई मिनट लग जाते हैं।
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महंगाई की मार: यहां डेटा की कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि एक औसत नागरिक की महीने भर की कमाई भी शायद कुछ एमबी डेटा न खरीद सके।

कैसे कटती है यहां की जिंदगी?
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इंटरनेट कैफे का दौर: जहां दुनिया में कैफे खत्म हो रहे हैं यहां गिनती के कुछ सरकारी कैफे ही सहारा हैं। वहां भी लंबी लाइनें और सख्त नियम लागू होते हैं।
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स्मार्टफोन का अभाव: ज्यादातर लोगों के पास आज भी पुराने 'कीपैड' वाले फोन हैं। पर्सनल कंप्यूटर तो यहां अमीरी की निशानी माने जाते हैं।
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शिक्षा और व्यापार ठप: यहां के छात्रों के पास न 'यूट्यूब' है न 'ऑनलाइन लाइब्रेरी'। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए आज भी लोग पुराने पारंपरिक तरीकों (डाक या लैंडलाइन) पर निर्भर हैं।

दुनिया से कटा हुआ एक टापू
ग्लोबल डिजिटल गैप (Global Digital Gap) की यह सबसे बड़ी मिसाल है। जहां पूरी दुनिया एक 'ग्लोबल विलेज' बन चुकी है वहीं इरिट्रिया के लोग आज भी ताज़ा सूचनाओं के लिए रेडियो और सरकारी समाचार पत्रों के भरोसे हैं। यह देश 2026 में भी यह कड़वा सच बयां कर रहा है कि 'डिजिटल डिवाइड' समाज में कितनी गहरी खाई पैदा कर सकता है।