भारत उनका निशाना... RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान: 'असुर शक्तियां भारत, हिंदू और संघ को तोड़ने में जुटीं'

Edited By Updated: 20 Oct, 2026 11:29 AM

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को आरोप लगाया कि “असुर शक्तियां” भारत, हिंदुओं और संघ को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने इन प्रयासों को “नष्ट करने” (dismantling) की कोशिश बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी...

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को आरोप लगाया कि “असुर शक्तियां” भारत, हिंदुओं और संघ को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने इन प्रयासों को “नष्ट करने” की कोशिश बताया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल और छात्र संगठन, मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञान कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

महाराष्ट्र के नागपुर में रेशिमबाग मैदान में RSS के शताब्दी विजयदशमी उत्सव को संबोधित करते हुए, भागवत ने सत्ता बदलने की कोशिशों, भारत, हिंदुओं और संघ को कमजोर करने के प्रयासों पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक गतिविधियों से समाज में बंटवारा नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “सत्ता बदलने से हालात बदल जाएंगे, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ है। न तो पहले ऐसा हुआ और न ही आज हो रहा है। जो लोग अपने स्वार्थ साधते हैं, वे हमेशा अपने इशारों पर नाचने वाले मोहरों (कठपुतलियों) का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया भर में ये सब कैसे हो रहा है? भारत का उत्थान ऐसी गतिविधियों पर रोक लगा देगा, और इसीलिए भारत उनका मुख्य निशाना है।”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि भारत को कमजोर करने वाली ताकतें देश, हिंदुओं और RSS को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं, और उन्हें ऐसे लोगों का समर्थन मिल रहा है जो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं।

भागवत ने कहा, “इन असुर शक्तियों को यह बात पता है, और इसीलिए भारत उनका निशाना है। वे भारत, हिंदुओं और संघ को तोड़ने के तरीके खोजते हैं और इसे ‘नष्ट करना’  कहते हैं। उन्हें समर्थन भी मिलता है। ऐसे लोग जिनकी सोच उनसे मिलती-जुलती है, और सत्ता की लालसा रखने वाले महत्वाकांक्षी नेता-जिनमें विवेक की कमी होती है-वे उनके साथ जुड़ जाते हैं।”

उन्होंने कहा, “भारत में भी इसी तरह की कोशिशें की जा रही हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में भारत ने एक मजबूत नीति अपनाई है, और इसके नेतृत्व ने भी उतनी ही दृढ़ता के साथ देश का मार्गदर्शन किया है। इसके साथ ही, भारत की युवा पीढ़ी में देशभक्ति की भावना जागृत हुई है-यह अहसास कि उन्हें अपने देश के लिए कुछ करना है और उनके देश की वैश्विक जिम्मेदारी भी है- जिससे समाज का समर्थन मिला है, और इसी वजह से ऐसी गतिविधियों पर रोक लग गई है।”

उनकी यह टिप्पणी तब आई है, जब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा और कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने दिल्ली में सम्मेलनों और प्रेस वार्ता के दौरान, चल रहे विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में सार्वजनिक रूप से “शासन परिवर्तन” (regime change) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया या उन पर चर्चा की। आरएसएस प्रमुख ने आगे कहा, “समाज बहुत बड़ा है और हमारा देश अभी भी विकासशील है, इसका विकास अभी पूरा नहीं हुआ है। इसलिए, समस्याएं मौजूद हैं और हमेशा बनी रहेंगी। इन्हीं समस्याओं की वजह से आंदोलन खड़े होते हैं, और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन होना स्वाभाविक है।”

आरएसएस प्रमुख ने आगे कहा, “लेकिन विरोध प्रदर्शन किसलिए होने चाहिए? इनका उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए। विरोध प्रदर्शन का मकसद ही किसी समस्या का हल निकालना है। चाहे विरोध करने वाला कोई समूह हो, शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाने वाली सरकार और प्रशासन हो, या फिर राजनीतिक नेता- हमारे किसी भी काम से हमारे एकजुट समाज में कोई कलह, नफरत या बंटवारा नहीं पैदा होना चाहिए।”

भागवत ने प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक नेताओं और प्रशासन से संयम बरतने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि उनके कदम संवैधानिक और कानूनी दायरे के भीतर ही रहें।
उन्होंने कहा, “हमारी भावनाएं चाहे कितनी भी तीव्र क्यों न हों, हमारे संविधान, कानून द्वारा तय की गई सीमाओं और हमारे बोलचाल व व्यवहार में शालीनता के मानकों का हमारे कार्यों पर नियंत्रण होना चाहिए। हम सभी को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक फायदे का लालच हमारी समझदारी और सद्भावना पर हावी नहीं होना चाहिए। यह सुनिश्चित करना हम सबकी जिम्मेदारी है। समाज को इस जाल में फंसने से बचाने के लिए, आम लोगों को भी समझदारी से सोचना और काम करना चाहिए।” इसके अलावा, भागवत ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की आज भी प्रासंगिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है और आह्वान किया कि इसे पूरे गर्व और आत्म-सम्मान के साथ, पूरा गाया जाना चाहिए।

उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' के सभी छह पदों को गाने का निर्देश दिया गया है, जिसका विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं। भागवत ने कहा, "वंदे मातरम आज भी हमें प्रेरित करने में सक्षम है। पूरे गीत को ऊंचे स्वर में, गर्व और आत्म-सम्मान के साथ गाने में कोई हिचकिचाहट या विरोध नहीं होना चाहिए। भारत को अपनी मातृभूमि मानकर उसे नमन करना, उसके प्रति समर्पण रखना, अपने पूर्वजों के जीवन पर गर्व करना और उनके आदर्शों को अपनाना, तथा भारत की शाश्वत संस्कृति के सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के अनुरूप अपना जीवन ढालना - ये वे बातें हैं जो हमें हमेशा एकजुट रखेंगी। ये हमारी सभी विविधताओं - चाहे वे धर्म, क्षेत्र, भाषा या जाति से जुड़ी हों - का आधार हैं।"  

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