Edited By Tanuja,Updated: 03 Sep, 2026 06:59 PM

नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के आठ दिन बाद भी हजारों लोग लापता हैं। शव नहीं मिलने पर परिवार कुश घास के प्रतीकात्मक पुतलों से अंतिम संस्कार कर रहे हैं। कई लोगों के घर भी बह चुके हैं। काठमांडू के शोक आश्रय स्थल भर चुके हैं और पीड़ित परिवार...
Kathmandu: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ को आठ दिन बीत चुके हैं, लेकिन हजारों परिवारों की तलाश अब भी खत्म नहीं हुई है। कई लोगों को अपने लापता परिजनों के लौटने की उम्मीद थी, लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, यह उम्मीद भी कमजोर पड़ती जा रही है। शव नहीं मिलने पर परिवार अब कुश घास से बने प्रतीकात्मक पुतलों के जरिए अंतिम संस्कार की रस्में निभाने को मजबूर हैं। इस आपदा ने लोगों से सिर्फ उनके प्रियजन ही नहीं छीने, बल्कि हजारों परिवारों के घर, जमीन-जायदाद और जीवनभर की जमा-पूंजी भी बहा दी। कई परिवारों के सामने अब सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस घर में बैठकर वे अपनों का शोक मनाते, वह घर भी बाढ़ में नहीं बचा।
26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई अचानक बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। पानी के तेज बहाव में घर, सड़कें और पुल बह गए। त्रिशूली नदी के किनारे बसे कई गांवों और बस्तियों का अस्तित्व तक मिट गया। रसुवा जिले के पाहारेबेसी गांव में आठ दिन बाद भी कई लोगों का पता नहीं चल पाया है। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, कुछ परिवारों ने अब लापता परिजनों के लिए अंतिम संस्कार की रस्में शुरू कर दी हैं। उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष माधव प्रसाद आर्याल ने बताया कि जिन परिवारों को अब लगता है कि उनके लापता परिजन शायद कभी नहीं मिल पाएंगे, उन्होंने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में लापता लोगों के लिए कुश घास के प्रतीकात्मक पुतले तैयार किए जा रहे हैं। इन पुतलों को लापता व्यक्ति का प्रतीक मानकर परिवार अंतिम संस्कार और शोक की परंपरागत रस्में पूरी कर रहे हैं। परिवारों के लिए यह फैसला बेहद पीड़ादायक है।
एक तरफ वे अपने प्रियजन का शव तक नहीं देख पाए और दूसरी तरफ लगातार तलाश के बावजूद कोई सुराग नहीं मिलने से उन्हें अब उनकी मौत को स्वीकार करने जैसा कठिन फैसला लेना पड़ रहा है। त्रासदी की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई परिवारों के पास शोक की पारंपरिक रस्में निभाने के लिए अपना घर तक नहीं बचा है। उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका की उपाध्यक्ष चामेली गुरूंग ने कहा कि पुरानी बस्ती में लगभग कुछ भी नहीं बचा है। ऐसे में सभी परिवारों का एक जगह इकट्ठा होकर शोक की रस्में निभाना भी संभव नहीं है। पाहारेबेसी के 20 से अधिक परिवार शोक की अवधि पूरी करने के लिए काठमांडू और दूसरे इलाकों की ओर चले गए हैं। कई अन्य परिवार भी गांव छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
बाढ़ पीड़ितों के लिए काठमांडू में बनाए गए कई सार्वजनिक आश्रय स्थल भी भर चुके हैं। तारकेश्वर स्थित रुद्रमती महादेव मंदिर के किरियापुत्री भवन में आठ समूह ठहरे हुए हैं। इनमें से प्रत्येक परिवार ने रसुवा बाढ़ में तीन से पांच परिजनों को खोया है। पास के गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के किरियापुत्री भवन के सभी आठ कमरे भी भरे हुए हैं। जगह की कमी को देखते हुए प्रबंधन ने तंबू लगाने के साथ छह अतिरिक्त कमरे भी तैयार किए हैं। किरियापुत्री भवन हिंदू परिवारों के लिए बनाया गया ऐसा आश्रय स्थल है, जहां किसी परिजन की मृत्यु के बाद परिवार आमतौर पर 13 दिनों तक शोक और अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में पूरी करते हैं। प्रबंधन समिति के सदस्य ऋषि प्रसाद नेपाल के मुताबिक, फिलहाल कोई कमरा खाली नहीं है और मौजूदा परिवारों की शोक अवधि पूरी होने तक नए लोगों के लिए जगह मिलना मुश्किल है।
बाढ़ प्रभावितों की दिक्कतें
पीड़ित परिवारों की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। शोक की अवधि के दौरान खाना बनाने के लिए जरूरी रसोई गैस हासिल करना भी चुनौती बन गया है। कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जिन्हें शव मिलने और अंतिम संस्कार करने के बाद भी काठमांडू आना पड़ा, क्योंकि उनके गांव में उनका घर ही नहीं बचा था। ऐसे में वे अपने ही गांव में पारंपरिक शोक की रस्में पूरी नहीं कर सकते।
शवों की पहचान भी बड़ी चुनौती
बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में शव बरामद हुए हैं, लेकिन उनकी पहचान करना प्रशासन और परिवारों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। कई शवों की हालत ऐसी है कि पहचान के लिए वैज्ञानिक प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ रही है। कुछ पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया है कि बरामद शवों को जल्दबाजी में सामूहिक रूप से दफनाया जा रहा है। इससे परिजनों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि वे अपने लापता रिश्तेदारों की पहचान सुनिश्चित करना चाहते हैं। इस आपदा में 7,000 से ज्यादा घर बह गए, जबकि कई बचे हुए मकान भी रहने लायक नहीं रह गए हैं। गुरुवार सुबह तक 1,200 से ज्यादा शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।