विदेश में पढ़ाई का सपना महंगा! कमजोर रुपए ने बढ़ाई टेंशन, नौकरी की घटती उम्मीद से छात्रों की बढ़ी चिंता

Edited By Updated: 31 Mar, 2026 11:02 AM

the dream of studying abroad comes at a high price

विदेश जाकर पढ़ाई करना अब सिर्फ एक अकादमिक फैसला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक और करियर से जुड़ा जोखिम बनता जा रहा है। बीते कुछ महीनों में रुपए की कमजोरी और विदेशों में नौकरियों की घटती संभावनाओं ने छात्रों और उनके परिवारों को दोबारा सोचने...

National Desk : विदेश जाकर पढ़ाई करना अब सिर्फ एक अकादमिक फैसला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक और करियर से जुड़ा जोखिम बनता जा रहा है। बीते कुछ महीनों में रुपए की कमजोरी और विदेशों में नौकरियों की घटती संभावनाओं ने छात्रों और उनके परिवारों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। यही वजह है कि 2026 में स्टडी अब्रॉड सेक्टर की रफ्तार थमती नजर आ रही है।

कुल खर्च में 10 से 12 प्रतिशत तक हुआ इजाफा 
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी शिक्षा पर कुल खर्च में करीब 10 से 12 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। इसकी बड़ी वजह भारतीय मुद्रा का लगातार कमजोर होना और विदेशों में बढ़ती महंगाई है। चूंकि अधिकतर छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च खुद या परिवार की मदद से उठाते हैं, ऐसे में बजट बिगड़ने का खतरा और बढ़ गया है।

विकल्पों की तलाश में मां-बाप, टाल रहे बच्चों को विदेश भेजने का फैसला 
आमतौर पर छात्र और उनके अभिभावक 5 से 7 प्रतिशत तक खर्च बढ़ने की तैयारी रखते हैं, लेकिन मौजूदा हालात उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन गए हैं। कई परिवार अब बच्चों को विदेश भेजने का फैसला टाल रहे हैं या दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

अगले एडमिशन सीजन के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन छात्रों के सवाल अब सिर्फ कॉलेज और कोर्स तक सीमित नहीं हैं। वे लगातार यह जानना चाहते हैं कि पढ़ाई के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं और कुल खर्च कितना बढ़ सकता है।

ब्रिटेन और कनाडा में हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण
भारत से विदेश जाने वाले छात्रों का बड़ा हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को चुनता है। लेकिन इन देशों में एंट्री-लेवल नौकरियों के मौके कम होते जा रहे हैं। इसकी एक वजह कंपनियों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से इस्तेमाल और खर्चों में कटौती भी है। खासतौर पर ब्रिटेन और कनाडा में हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताए जा रहे हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया में स्थिति थोड़ी बेहतर है।

मध्यम वर्ग भी कर सकता है पार्टिसिपेट
रिपोर्ट्स के अनुसार, ज्यादातर छात्र 20 लाख रुपये तक का बजट तय करते हैं, जबकि कुछ 20 से 30 लाख या उससे ज्यादा खर्च करने को तैयार होते हैं। इससे साफ है कि अब यह क्षेत्र सिर्फ अमीर वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एजुकेशन लोन और प्लानिंग के जरिए मध्यम वर्ग भी इसमें शामिल हो रहा है। हालांकि, लोन लेकर पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है। यदि रुपए की गिरावट जारी रहती है, तो उन्हें ज्यादा कर्ज उठाना पड़ेगा, क्योंकि खर्च डॉलर में और कमाई रुपये में होती है।

वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर रहे हैं। कई छात्र अब “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपना रहे हैं। कुछ हाइब्रिड मॉडल चुन रहे हैं, जिसमें शुरुआत अपने देश से पढ़ाई कर बाद में विदेश जाने का विकल्प होता है। वहीं, कई छात्र एडमिशन टाल रहे हैं या जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे अपेक्षाकृत सस्ते और स्थिर विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, विदेश में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना आसान नहीं रहा। बदलते आर्थिक हालात और अनिश्चित करियर संभावनाएं इसे एक बड़ा और सोच-समझकर लिया जाने वाला फैसला बना रही हैं।

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