Edited By Pardeep,Updated: 02 Apr, 2026 10:07 PM

राजस्थान के भरतपुर जिले के पेंघोरे गांव के किसान अमर सिंह आज आंवले की खेती और उसकी सही प्रोसेसिंग के जरिए करोड़ों का सालाना टर्नओवर खड़ा कर चुके हैं। उनकी कहानी साबित करती है कि अगर खेती को बिजनेस की नजर से देखा जाए, तो मिट्टी से भी बड़ी कमाई संभव...
नेशनल डेस्कः राजस्थान के भरतपुर जिले के पेंघोरे गांव के किसान अमर सिंह आज आंवले की खेती और उसकी सही प्रोसेसिंग के जरिए करोड़ों का सालाना टर्नओवर खड़ा कर चुके हैं। उनकी कहानी साबित करती है कि अगर खेती को बिजनेस की नजर से देखा जाए, तो मिट्टी से भी बड़ी कमाई संभव है।
आम की खेती से ऑटो चलाने तक का संघर्ष
शुरुआत में अमर सिंह आम की खेती से घर चला रहे थे, लेकिन कम आय के कारण उन्हें ऑटो भी चलाना पड़ा। 1997 में एक कृषि प्रदर्शनी में आंवले की खेती से अच्छी कमाई की संभावना देखकर उन्होंने 2.2 एकड़ जमीन पर इसकी खेती शुरू की। उन्होंने बागवानी विभाग से सिर्फ 1200 रुपये में 60 आंवले के पौधे खरीदे और धीरे-धीरे इन्हें बढ़ाकर 70–80 पेड़ों तक पहुंचाया।
पहली फसल से ही लाखों की कमाई
करीब पांच साल के इंतजार के बाद जब आंवले के पेड़ों में फल आया, तो पहली ही फसल से अमर सिंह ने लगभग 7 लाख रुपये की कमाई कर ली। इस सफलता ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि फल बागवानी लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न देती है। इसके बाद उन्होंने इसे अपनी मुख्य आय का जरिया बना लिया और उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया।
कच्चा नहीं, प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स पर फोकस
शुरुआत में आंवला मंडी में 2–3 रुपये प्रति किलो बिकता था, जबकि उससे बने मुरब्बा, कैंडी और जूस कई गुना महंगे बिकते थे। इसी समझ के साथ अमर सिंह ने कच्चा आंवला बेचने के बजाय वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनाने पर ध्यान दिया। उन्होंने 2007 के आसपास मुरब्बा बनाने की तकनीक सीखी और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का फैसला किया।
अपनी फैक्ट्री और ‘अमृता’ ब्रांड की शुरुआत
करीब 2005 में लगभग 5 लाख रुपये निवेश कर उन्होंने अपनी मुरब्बा फैक्ट्री शुरू की। उन्होंने ‘अमृता’ ब्रांड नाम से आंवले का मुरब्बा, कैंडी और अन्य उत्पाद बाजार में उतारे। अच्छी पैकेजिंग और क्वालिटी के कारण उनके प्रोडक्ट्स ने ग्राहकों का भरोसा जीता और स्थानीय से लेकर दूर-दराज के बाजारों तक पहुंच बना ली।
करोड़ों का कारोबार और गांव में रोजगार
समय के साथ उनका बिजनेस इतना बढ़ा कि सालाना बिक्री 25–26 लाख से बढ़कर करोड़ों में पहुंच गई। उनकी प्रोसेसिंग यूनिट ने गांव के दर्जनों लोगों को रोजगार दिया, जिसमें कई महिलाएं और युवा भी शामिल हैं। इस तरह अमर सिंह न सिर्फ सफल किसान बने, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले सोशल एंटरप्रेन्योर भी बन गए।
मॉडर्न तकनीक और बिजनेस सोच का कमाल
अमर सिंह ने पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाया—बेहतर किस्में, समय पर देखभाल और गुणवत्ता पर खास ध्यान। साथ ही, उन्होंने बाजार की मांग को समझकर अपने प्रोडक्ट्स में बदलाव किया। खेती और बिजनेस की इस दोहरी सोच ने उन्हें एग्री-बिजनेस में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
किसानों के लिए बने प्रेरणा
भरतपुर और आसपास के इलाकों में अमर सिंह आज एक रोल मॉडल बन चुके हैं। उनकी कहानी यह दिखाती है कि खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सही योजना और सोच के साथ बड़ा बिजनेस बन सकती है। राजस्थान के कई किसान अब आंवला और अन्य फलों की बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं। अमर सिंह की जर्नी यह साबित करती है कि थोड़ी समझ, नई तकनीक और लंबी सोच के साथ खेती में मुनाफे की कोई सीमा नहीं है।