घृणित अपराध मामले में लुका-छिपी क्यों खेल रहे हैं? मुस्लिम व्यक्ति पर हमले की जांच में...पर यूपी पुलिस को SC की फटकार

Edited By Updated: 21 Apr, 2026 07:25 PM

why are hate crime cases playing hide and seek the supreme court reprimanded

उच्चतम न्यायालय ने नोएडा में 2021 में हुए कथित घृणा अपराध के मामले में पुलिस द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे को लेकर नाराजगी जताते हुए मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि आपका जांच अधिकारी (आईओ) इस अदालत के साथ 'लुका-छिपी' का खेल क्यों खेल...

नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने नोएडा में 2021 में हुए कथित घृणा अपराध के मामले में पुलिस द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे को लेकर नाराजगी जताते हुए मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि आपका जांच अधिकारी (आईओ) इस अदालत के साथ ''लुका-छिपी'' का खेल क्यों खेल रहा है? न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से पूछा कि पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153-बी क्यों नहीं जोड़ी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि विधि अधिकारी ने 16 फरवरी को उसके समक्ष कहा था कि शिकायत में लगाये गए आरोपों से आईपीसी की धारा 153-बी और 295-ए के तहत दंडनीय अपराधों के आवश्यक तत्व सिद्ध होते हैं और उक्त अपराधों के लिए प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी। धारा 295-ए समाज के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मकसद से जानबूझकर किये गए और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है, जिसमें उनके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना शामिल है। न्यायालय चार जुलाई 2021 को नोएडा में व्यक्तियों के एक समूह द्वारा किये गए कथित घृणा अपराध में दुर्व्यवहार और यातना के पीड़ित एक वरिष्ठ नागरिक की शिकायत पर निष्पक्ष जांच और सुनवाई का अनुरोध करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान नटराज ने पीठ को सूचित किया कि निचली अदालत ने पुलिस को मामले में आगे की जांच करने की अनुमति दे दी है और पुलिस आवश्यक धाराएं जोड़ेगी। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने पहले कहा था कि प्राथमिकी में आईपीसी की धारा 153-बी और 295-ए के तहत आरोप जोड़े जाने चाहिए थे।

 वकील ने कहा, ''धारा 153-बी को फिर से हटा दिया गया है।'' पीठ ने राज्य सरकार से पूछा, ''आपका जांच अधिकारी इस अदालत के साथ लुका-छिपी का खेल क्यों खेल रहा है?'' न्यायालय ने राज्य सरकार से यह भी सवाल किया कि धारा 153-बी को क्यों नहीं जोड़ा गया? नटराज ने पीठ को आश्वासन दिया कि पुलिस धारा 153-बी जोड़ देगी। पीठ ने कहा, ''हम प्रतिवादी द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे से संतुष्ट नहीं हैं।'' 

शीर्ष अदालत ने जांच अधिकारी को तलब करने की इच्छा जताई, लेकिन नटराज के अनुरोध पर पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया। मामले की अगली सुनवाई 19 मई को निर्धारित की गई है। न्यायालय ने विधि अधिकारी से कहा, ''कृपया अपने अधिकारियों को सूचित करें अन्यथा वे मुसीबत में पड़ जाएंगे। उन्हें बुलाकर फटकार लगाने में हमें कोई आनंद नहीं आता।''

 उत्तर प्रदेश सरकार ने 16 फरवरी को न्यायालय को बताया था कि इस मामले में धारा 153-बी के तहत और अपराधों को लेकर प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी। तीन फरवरी को न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा कि 2021 में कथित घृणा अपराध के मामले में दर्ज प्राथमिकी में आईपीसी की उपयुक्त धाराएं क्यों नहीं लगाई गई थीं। नटराज ने पूर्व में कहा था कि मामले में आरोपपत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है और पुलिस आगे की जांच के लिए संबंधित अदालत में अर्जी दायर करेगी।

 याचिकाकर्ता के वकील ने पूर्व में दलील दी थी कि आईपीसी की धारा 153-बी और 295-ए के तहत दंडनीय कथित अपराधों के लिए प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए थी। याचिका में दावा किया गया कि याचिकाकर्ता पर ''उसकी दाढ़ी और उसके मुस्लिम होने'' के कारण हमला किया गया था। 


 

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