जी.एस.टी. ‘दोहरी बदलाखोरी’ का साकार रूप लगता है

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Friday, October 13, 2017-12:31 AM

6 अक्तूबर को जी.एस.टी. परिषद की मीटिंग हुई और छोटे व मझोले उद्यमों (एस.एम.ईका) के लिए कुछ राहतों की घोषणा की गई। 26 सितम्बर को भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम महासंघ के प्रवक्ता अनिल भारद्वाज का एक साक्षात्कार छपा था जिसमें उन्होंने कम से कम 4 ऐसे मुद्दे गिनाए थे जिन पर जी.एस.टी. महत्वपूर्ण परेशानियों का कारण बन सकता है। 

पहली परेशानी थी कि जी.एस.टी. के दायरे से टैक्स मुक्त एम.एस.एम.ई. के लिए अंतर्राज्यीय बिक्री के मामले में रिटर्न दायर करना अनिवार्य बनाया गया था। दूसरी परेशानी थी कि बेशक वस्तुएं या सेवाओं की बिक्री की प्रक्रिया सम्पूर्ण न भी हुई हो तो भी अग्रिम में हासिल हुए आर्डरों पर जी.एस.टी. का भुगतान अनिवार्य किया गया था। तीसरी परेशानी थी ‘रिवर्स चार्ज’ प्रणाली और चौथी थी ई-वे बिल प्रणाली की शुरूआत जिसका अक्तूबर माह में श्रीगणेश होना था। अब जी.एस.टी. परिषद ने छोटे (यानी 20 लाख तक का टर्नओवर करने वाले) कारोबारों को पंजीकरण से छूट दे दी है बेशक वे अंतर्राज्यीय बिक्री ही क्यों न कर रहे हों। 

परिषद ने 1.5 करोड़ रुपए तक के टर्नओवर वाले कारोबारों को अग्रिम जी.एस.टी. जमा करवाने की शर्त से भी छूट प्रदान कर दी है। तीसरे नम्बर पर रिवर्स चार्ज प्रणाली (जिसके अंतर्गत जी.एस.टी. का अनुपालन न करने वाली फर्मों से माल खरीदने पर खरीदार को अपना चालान तैयार करके टैक्स अदा करना होता है और फिर एक अन्य दस्तावेज दायर करके इसके वापसी भुगतान का दावा करना होता है) को 31 मार्च 2018 तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

जहां तक ई-वे बिल का सवाल है यह पड़ाववार ढंग से लागू किया जाएगा और राष्ट्रीय स्तर पर केवल अगले वित्त वर्ष से ही क्रियाशील होगा। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है कि ‘कम्पोजिशन स्कीमों’ के अंतर्गत टैक्स की शुरूआती दहलीज मामूली-सी ऊंची उठा दी गई है। बेशक जी.एस.टी. परिषद सामने आ रही नई समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाने के लिए प्रशंसा की हकदार है तो भी जी.एस.टी. के शुरूआती डिजाइन में रह गई गलतियों से बचा जा सकता था क्योंकि वे इसकी अटल जटिलता में से पैदा नहीं हुई थीं बल्कि इनके पैदा होने के पीछे शुद्धतावादी तथा जोखिम से टलने वाली मानसिकता जिम्मेदार थी।

9 नवम्बर 2016 को मैंने अपने ब्लॉग में लिखा था: ‘‘नकदी की अल्पकालिक तंगी बहुत प्रचंड रूप में सामने आ सकती है और इससे आर्थिक गतिविधि प्रभावित होगी। इससे भी बड़ी बात यह होगी कि जी.एस.टी. का सभी प्रकार के चिंतन-मनन के बाद बनने वाला डिजाइन उसकी मूल परिकल्पना से कहीं अधिक जटिल दिखाई दे रहा है तथा इसको लागू करने की समयसीमा लगातार कम होती जा रही है जिसके चलते कई प्रकार की अनिश्चितताओं में वृद्धि हो जाएगी। यह ऐसा जोखिम है जिसे छोटा-मोटा नहीं कहा जा सकता है। यही कारण है कि जी.एस.टी. को इतना जोर राजस्व वसूली पर नहीं देना चाहिए था जितना सरलता, सुगमता तथा कार्यान्वयन पर। दिलेरी भरे कदमों की तो हमेशा ही जरूरत रहती है लेकिन जी.एस.टी. परिषद की रियायतों की घोषणा की रोशनी में इसकी कुछ अधिक जरूरत महसूस हो रही है।’’ 

वैश्विक वृद्धि के मामले में भी कई पंगे सामने आ रहे हैं। बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने भारी-भरकम कर्ज ले लिए और अब इनकी अदायगी उनके गले की फांस बन गई है। राज्यसभा का बहुमत इन वास्तविकताओं से लगातार दामन बचा रहा था। चूंकि राजनीति विभाजनकारी रूप ग्रहण चुकी है इसलिए भूमि अधिग्रहण कानून के इरादों से छेड़छाड़ करना तो दूर, इसके निष्पादन के मामले में बीच का रास्ता तलाश करने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई। अदालतें कार्यकारिणी के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप कर रही थीं। इसलिए आॢथक विकास में सुस्ती नोटबंदी और जी.एस.टी. लागू होने से बहुत पहले ही शुरू हो चुकी थी। 

इस प्रकार की परिस्थितियों में सरकार के लिए यह अपरिहार्य बन जाता है कि वह दिलेरी भरी नीतिगत कार्रवाई करने के छोटे से छोटे अवसर भी तलाश करती रहे और उन्हें प्रयुक्त करे। इसी को नीतिगत उद्यमिता का नाम दिया जाता है और इसके मामले में नीति तथा राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में जोखिम उठाना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर जी.एस.टी. के डिजाइन की ही बात करें- यदि इसे बहुत सरल रखा जाता और टैक्स की स्लैब्स की संख्या कम रखने के साथ-साथ टैक्स दरें भी कम रखी जातीं तो इसके परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार के लिए राजस्व वसूली के लक्ष्य पूरे करने मुश्किल हो जाते। फिर भी यदि जी.एस.टी. का डिजाइन सरल रखा जाता तो इससे निश्चित तौर पर आर्थिक गतिविधियों में नई जान भर जाती। नेतृत्व का अर्थ ही यह होता कि वह बहुत सोच-समझ कर व माप-तोल कर जोखिम उठाता है।

बेशक इस मामले में भी भाग्य की अपनी भूमिका होती है लेकिन अन्य हर प्रकार के कामों में भी तो हमेशा भाग्य कोई न कोई भूमिका अदा करता ही है। चलो हम किसी बिक्री आर्डर पर अग्रिम जी.एस.टी. अदा करने के मामले में कारोबारों की दी गई रियायत का ही उदाहरण लें। यह रियायत केवल 1.5 करोड़ रुपए के अधिकतम टर्नओवर तक ही सीमित है लेकिन भारत की जी.डी.पी. का आकार 15 हजार अरब रुपए है। ऐसे में दो सवाल खड़े होते हैं। क्या ऐसी बिक्री पर जी.एस.टी. वसूल करना सही है जो अभी साकार ही नहीं हो सकी? और दूसरा यदि यह बात सही है तो क्या इसकी न्यूनतम दहलीज 1.5 करोड़ से कुछ ऊंची नहीं उठाई जानी चाहिए थी? आखिर राजस्व चाहे किसी पूर्वाग्रह पर आधारित हो या इससे मुक्त हो, दोनों ही परिस्थितियों में इसका स्रोत तो आर्थिक गतिविधियां ही बनती हैं और यही वित्तीय नीति-निर्धारण का आधारभूत सबक है। 

जहां नोटबंदी कानूनों का अनुपालन न करने वाले लोगों के विरुद्ध एक प्रकार की बदले की भावना का आभास देती है, वहीं जी.एस.टी. दोहरी बदलाखोरी का साकार रूप है- यानी कि कानून का उल्लंघन करने वालों के साथ कानून का अनुपालन करने वालों से भी ऐसा व्यवहार किया गया है जैसे वे अपराधी हों। इस दृष्टि से देखा जाए तो 6 अक्तूबर को प्रकाशित इंदिरा राजारमण का अखबारी आलेख बहुत ही कमाल की चीज है क्योंकि इसमें दिखाया गया है कि भरोसे और सत्यापन (समय-समय पर की जाने वाली पड़ताल) की बजाय किसी भी कीमत पर राजस्व वसूली करने के लिए विश्वासहीनता का रवैया अपनाया जा रहा है। इसी रवैये में से यह जिद पैदा हुई है कि मासिक रिपोर्टों में चालान आपस में मेल खाने चाहिएं। 

इसी मानसिकता ने जी.एस.टी. के घटिया डिजाइन को जन्म दिया है और इसी के कारण कालांतर में टैक्स राहतों के प्रति अशोभनीय प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। इस प्रकार की बदलेखोरी भरी नीतियों ने पहले ही आर्थिक गतिविधियों को लहूलुहान किया है और अभी भी यह प्रक्रिया थमी नहीं है। ऐसी नीतियों के कारण हो चुके नुक्सान की क्षतिपूर्ति करने की बजाय सरकार हड़बड़ी में कभी कोई कदम उठा रही है तो कभी कोई- जैसे ब्याज दरें घटना, मुद्रा अवमूल्यन और वित्तीय प्रोत्साहन आदि। नीतियों के मामले में जितनी अफरा-तफरी बढ़ेगी, आॢथक मोर्चे पर भी अनिश्चितता में उतनी ही बढ़ौतरी होगी। 

सफल नीति-निर्धारण जितना उद्यमशीलता तथा जोखिम उठाने से संबंधित है उतना ही गहरा संबंध इसका व्यावसायिक गतिविधियों से है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि नीति-निर्धारण और इसके अनुपालन में सही संतुलन बनाए रखना जरूरी है। मैं एक बार फिर यह रेखांकित करना चाहूंगा कि आर्थिक नीति-निर्धारण का उद्देश्य ही आर्थिक गतिविधियों तथा कानूनी व्यवस्थाओं में संतुलन बनाए रखना और इन गतिविधियों का रास्ता आसान करना है। सरकार की मानसिकता का अधिक झुकाव केवल नीति-निर्धारण की ओर है।     

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