बाबरी ढांचे के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उठे नए प्रश्न

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Friday, April 21, 2017-12:41 AM

बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवादास्पद ढांचे के गिराए जाने के 25 साल बाद सर्वोच्च अदालत के ताजा  फैसले ने 6 नए प्रश्नों को जन्म दिया है। अदालत ने कहा कि इस मामले में दायर 2 एफ.आई.आर. (एक कार सेवकों के खिलाफ और दूसरी 21 बड़ेे नेताओं के  खिलाफ ) को  संयुक्त रूप से समयबद्ध तरीके से 2 साल के अन्दर सुन कर फैसला दिया जाए और तब  तक मामले को सुनने वाले जज का तबादला न हो।

फैसले का तात्पर्य यह कि भारतीय जनता  पार्टी के पितामह लालकृष्ण अडवानी (89), पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी (83) के खिलाफ  ढांचा गिराने  की साजिश का मुकद्दमा लखनऊ की अदालत में फिर से शुरू होगा और साथ ही अभियुक्त चाहें  तो सभी 656 गवाहों से फिर से जिरह की जा सकती  है। अदालत के पास मात्र 564 कार्य दिवस हैं।

इस फैसले से उपजे प्रश्न हैं: (1) क्या अडवानी अब राष्ट्रपति पद के  प्रत्याशी बनने के लिए योग्य रहेंगे? (2) धार्मिक, राजनीति, सामाजिक आंदोलनों को लेकर किसी राजनेता के बयानों से उपजे जनांदोलन की परिणति के आधार पर क्या साजिश के अंश देखना या अपराध-शास्त्र के ‘मेंस रिया’  के सिद्धांत के  तहत दोष के अंश (कल्पेबिलिटी)निर्धारित करना आसान होगा। (3) क्या घटना के 25 साल बाद गवाहों को याद होगा कि उन्होंने क्या देखा था और पिछली (15 साल पहले) जिरह  में क्या कहा था।

(4) क्या सुप्रीम कोर्ट  को सन् 2002 और सन् 2007 में  इसी अदालत द्वारा लिए  गए  फैसले को देखने की जरूरत नहीं थी जिसमें इसी अदालत ने दोनों मामलों को संयुक्त रूप से लखनऊ में सुने जाने की याचिका  को खारिज करने वाले हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखा था और वह भी 3 सदस्यीय बैंच द्वारा? (5) (यह प्रश्न न्यायिक प्रक्रिया में नैतिकता का ज्यादा  है कानून का कम) पिछले 25 सालों में अदालतें और अभियोजन संस्थाएं ढिलाई करती रहीं, लिहाजा इन 21 नेताओं  (जिनके खिलाफ  रायबरेली कीअदालत  में मुकद्दमा चल रहा था, में से 8 मर चुके हैं और एक के खिलाफ  इसलिए मुकद्दमा नहीं चल सकता कि वह वर्तमान में राज्यपाल है) में से 13 आज जीवित हैं।

क्या अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घकालीन जीवन होना अभिशाप है और साथ  ही अगर राष्ट्रपति पद का चुनाव इस फैसले  के 2 माह पूर्व होता और अगर अडवानी राष्ट्रपति बन जाते तो क्या यह मुकद्दमा चल सकता था। (6) सर्वोच्च  न्यायालय ने अपने इस फैसले में पैरा 19 में न्याय का एक  सिद्धांत उद्धृत किया है  जिसके तहत कहा गया  है कि चाहे आसमान गिर जाए, न्याय किया जाना चाहिए। ऐसे  में इसी अदालत के बड़े बैंच द्वारा इस फैसले से इतर फैसला दिया जाना (सन् 2002 और सन् 2007) इस सिद्धांत से परे था।

राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी
देश में केवल 2 पद हैं जिन पर बैठने से पहले व्यक्ति संविधान  के अभिरक्षण, परिरक्षण व संरक्षण की शपथ लेता है। ये पद हैं राष्ट्रपति और राज्यपाल के। अन्य  सभी यहां तक कि प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश संविधान में निष्ठा की शपथ लेते हैं। कोई व्यक्ति सविधान के अनुच्छेदों के तहत बनाए गए कानूनों का अगर उल्लंघन  करने का आरोपी  है तो इसका  मतलब होता है  कि उस संविधान  की रक्षा की शपथ वह नहीं  ले सकता। यही कारण है  कि भारतीय जनता पार्टी के 89 वर्षीय पितामह लालकृष्ण अडवानी या पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अब राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी नहीं हो सकते।

इसमें कोई दो राय नहीं  कि सर्वोच्च  अदालत के फैसले से न केवल न्याय के  इस  मंदिर के  प्रति जनता का विश्वास बढ़ा है, बल्कि इस फैसले ने कानून की दुनिया में चर्चित यह ब्रह्म वाक्य भी सत्य साबित किया ‘‘चाहे आप कितने भी ऊपर हों, कानून आप से ऊपर रहेगा।’’ इस फैसले के बाद अब लखनऊ में सी.बी.आई. की अदालत द्वारा एफ.आई.आर. संख्या 197  और 198 (पहली सभी कार सेवकों के खिलाफ और दूसरा 21 विशिष्ट व्यक्तियों-जिनमें से 8 मर चुके हैं) को एक साथ सुना जाएगा। साथ ही दुनिया  में अपराध न्यायशास्त्र के लिए सी.बी.आई. कोर्ट का भावी फैसला एक नया आयाम  होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि 6 दिसम्बर, 1992 की प्रस्तावित कार सेवा से पूर्व देश के हिन्दुओं में राम मंदिर को लेकर एक जबरदस्त उन्माद पैदा किया गया था। यह भी सच है कि अडवानी, जोशी ने देश भर में यात्राएं निकाली थीं।  उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के तत्कालीन भाषणों ने  इस उन्माद को हवा देने का काम किया था। अदालत के सामने ये सारे प्रश्न होंगे पर मूल प्रश्न होगा-क्या विवादास्पद ढांचा गिराए जाने में इन आरोपियों की साजिश के स्तर पर भी कोई संलिप्तता थी? इन नेताओं पर मुकद्दमा आई.पी.सी. की धारा 120 (बी) के तहत है अर्थात आपराधिक साजिश करने का।

यह बात स्पष्ट है (और जिसका जिक्र वर्तमान फैसले में किया भी  गया है) कि हाईकोर्ट ने टैक्नीकल आधार पर दोनों मामलों को एक साथ चलाने की राज्य सरकार की दूसरी अधिसूचना खारिज  की थी क्योंकि सरकार ने इस अधिसूचना के लिए उच्च न्यायालय की सहमति नहीं ली  थी लेकिन फिर अगर अगले 4 से 6 सालों में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका, रिवीजन याचिका ही नहीं, क्यूरेटिव याचिका के दौरान भी हाईकोर्ट के आदेश को बहाल रखा तो आरोपी इसका खमियाजा भुगतें, यह  कहां तक न्यायोचित है?

इस फैसले के तत्काल बाद केन्द्र  में सत्तानशीन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व प्रधानमंत्री के आवास  पर बैठा और यह फैसला लिया गया कि इन वयोवृद्ध नेताओं को मुकद्दमा लडऩा चाहिए और बेदाग निकलने की कोशिश की जानी चाहिए। जाहिर है  कि जब 2 साल में फैसला आएगा तो जो भी फैसला हो पार्टी को 2019 के चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा। यह अलग बात है  कि अगर स्पैशल कोर्ट से सजा होती भी है तो इसकी अपील फिर  हाईकोर्ट में हो सकती है लेकिन भारतीय समाज के एक सम्प्रदाय विशेष में इन नेताओं के प्रति और साथ ही पार्टी के प्रति सहानुभूति रहेगी।

एक प्रश्न और भी अनुत्तरित रहेगा और वह यह कि 2 साल बाद जब कल्याण सिंह राज्यपाल के पद से हटेंगे और उन पर मुकद्दमा चलेगा तो क्या वह भी  यह अपेक्षा नहीं करेंगे कि सभी गवाहों से फिर से जिरह हो, जोकि उनका मौलिक अधिकार है और तब क्या एक ही मामले में 3 बार गवाहों की जिरह और वह भी लगभग 30 साल बाद न्याय की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त होगी? 


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