चाणक्य नीति: कार्य आरंभ करने से पूर्व रखें कुछ बातों का ध्यान, नहीं होंगे असफल

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Thursday, September 29, 2016-8:42 AM

आचार्य चाणक्य को भारतीय इतिहास के महान नायकों में से एक माना जाता है। चाणक्य बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने अपने ज्ञान को स्वयं तक सीमित नहीं रखा बल्कि ज्ञान को चाणक्य नीति में लिखकर अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी दिया। इन नीतियों पर अमल करके खुशहाल जीवन यापन किया जा सकता है। इसके साथ ही जीवन को सफल बना सकते हैं। 

 

को कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ।
कोवाहं का च मे शक्तिः इति चिन्त्यं मुहुर्मुहः।।

 

चाणक्य के अनसार कोई भी कार्य शुरु करने से पूर्व अच्छे से सोच लेना चाहिए कि समय व स्थान कैसा है, मदद करने वाले कौन हैं, आय-व्यय का क्या हिसाब है। अपनी योग्यता के बारे में विचार कर लेना चाहिए। इन बातों पर विचार किए बिना कार्य आरंभ करने से असफलता मिलती है। 

 

जिव्हायत्तौ वृद्धि विनाशौ, विषामृतकारो जिव्हा।
प्रियवादिनो न शत्रुः।।

 

व्यक्ति की उन्नति अौर अवनति का राज उसकी जीभ पर होता है। व्यक्ति अपनी जीभ द्वारा जैसे चाहे बोल निकाल कर सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदल सकता है। अर्थात कोई भी व्यक्ति मीठा बोलकर सभी को अपना मित्र बना सकता है अौर कड़वा बोल कर सभी से शत्रुता मोल ले सकता है इसलिए सोच-विचार कर बोलना चाहिए।

 

पुनर्वित्त पुनर्मित्त पुनर्भार्या पुनर्मही।
एतत्सर्व पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः।।

 

व्यक्ति को जीवन में धन, मित्र, स्त्री, जमीन आदि सारे पदार्थ दोबारा मिल सकते हैं परंतु मानव शरीर नहीं मिल सकता है। इसलिए इस मानव शरीर को स्वस्थ रखकर धर्म कार्यों में लगाना चाहिए।

 

यथा शिखा मयूराणां नागाणां मणयो तथा।
तद्वत् वेदांग शास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम्।।

 

चाणक्य अनुसार जिस प्रकार मोर के सिर पर शिखा अौर नाग के सिर पर मणि होती है उसी प्रकार वेदांग शास्त्रों मे ज्योतिष सबसे ऊपर स्थित है। प्रत्येक कार्यों में ज्योतिष को प्रधान मान कर चलना चाहिए।

 

अलोहमयं निगडं कलत्रम्। दुष्कलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम्।।
अप्रमत्तो दारान् निरीक्षते। स्त्रीषु किंचिदपि न विश्वसेत्।।

 

पत्नी बिना लोहे की बेड़ी होती है। बुरे चरित्र वाली पत्नी बुद्धिमान के शरीर को जलाती है। पत्नी का निरीक्षण करना चाहिए। किसी भी स्त्री पर सोच-विचार किए बिना विश्वास नहीं करना चाहिए।

 

यस्य मन्त्र न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः
स कृत्स्नां पृथिवीं भुंक्ते कोशहीनोपि पार्थिवः।।

 

जिस राजा की गुप्त बातों को दूसरे लोग इकट्ठे होकर भी न जान पाएं वह राजा निर्धन होने पर भी पृथ्वी पर राज करता है। कार्य की सफलता के लिए व्यक्ति को उस कार्य से संबंधित बातों को गुप्त रखना चाहिए। 

 

आश्रितैरप्यवमन्यते मृदु स्वभावः।
तीक्ष्णदंडः सर्वैरूद्वेजतीयो भवति।
यथार्हण्डकारी स्यात।

 

भोले इंसान का कहना उसके अधिकारी भी नहीं मानते इसलिए व्यक्ति को कार्य करवाने से लिए दंड का सहारा लेना चाहिए तभी कार्य लिया जा सकता है।

 

अति रूपेण वै सीता अति गर्वेण रावणः।
अति दानाद् बलिर्बद्धोः अति सर्वत्र वर्जयेत्।।

 

अति रूपवती होने के कारण देवी सीता का अपहरण हुआ था। अति गर्व के कारण रावण मारा गया। अति दानशील होने के कारण राजा बलि को अपना राजपाट त्यागना पड़ा था। इन सबसे शिक्षा लेकर अति का त्याग करना चाहिए।

 

ऋण शत्रु व्याधिष्यशेषः कर्त्तव्यः।

 

कर्ज, दुश्मन अौर बीमारी को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता उसका जीवन सदैव के लिए नर्क बन जाता है।
 


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