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कर्तव्य के प्रति निष्ठा ही व्यक्ति के चरित्र को प्रदान करती है दृढ़ता

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Wednesday, November 08, 2017-10:35 AM

संधि का प्रस्ताव असफल होने पर जब श्री कृष्ण हस्तिनापुर लौट चले, तब महारथी कर्ण उन्हें सीमा तक विदा करने आए। मार्ग में कर्ण को समझाते हुए श्री कृष्ण ने कहा, "कर्ण तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम तो महाराजा पांडु और देवी कुंती के सबसे बड़े पुत्र हो। यदि दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों के पक्ष में आ जाओ तो तत्काल तुम्हारा राज्याभिषेक कर दिया जाएगा।" 


यह सुनकर कर्ण ने उत्तर दिया, "वासुदेव, मैं जानता हूं कि मैं माता कुंती का पुत्र हूं, किंतु जब सभी लोग सूतपुत्र कहकर मेरा तिरस्कार कर रहे थे, तब केवल दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया। मेरे भरोसे ही उसने पांडवों को चुनौती दी है। क्या अब उसके उपकारों को भूलकर मैं उसके साथ विश्वासघात करूं? ऐसा करके क्या मैं अधर्म का भागी नहीं बनूंगा? मैं यह जानता हूं कि युद्ध में विजय पांडवों की होगी लेकिन आप मुझे अपने कर्तव्य से क्यों विमुख करना चाहते हैं? कर्तव्य के प्रति कर्ण की निष्ठा ने श्री कृष्ण को निरुत्तर कर दिया।"


इस प्रसंग में कर्तव्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है और उस दृढ़ता को बड़े से बड़ा प्रलोभन भी शिथिल नहीं कर पाता, यानी वह चरित्रवान व्यक्ति ‘सेलेबिल’ नहीं बन पाता। इसके अतिरिक्त इसमें धर्म के प्रति आस्था और निर्भीकता तथा आत्म सम्मान का परिचय मिलता है, जो चरित्र की विशेषताएं मानी जाती हैं।

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