‘डाक्टर की पर्ची के बिना’ कफ सिरप की बिक्री पर रोक!

Edited By Updated: 18 Jun, 2026 03:09 AM

ban on sale of cough syrup without prescription

कफ सिरप का नशे के रूप में इस्तेमाल एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्या बन चुका है। कुछ कफ सिरप में ‘ओपियोइड’ (अफीम का अंश) होता है जो सामान्य मात्रा में लेने पर तो खांसी को दबाता है लेकिन अधिक मात्रा में (पूरी शीशी) पी लेने पर यह तेज नशा...

कफ सिरप का नशे के रूप में इस्तेमाल एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्या बन चुका है। कुछ कफ सिरप में ‘ओपियोइड’ (अफीम का अंश) होता है जो सामान्य मात्रा में लेने पर तो खांसी को दबाता है लेकिन अधिक मात्रा में (पूरी शीशी) पी लेने पर यह तेज नशा देता है। कुछ खांसी सिरप में ‘डेक्सट्रोमेथोर्फन’ (डी.एक्स.एम.) नामक तत्व होता है जिसका एक निश्चित मात्रा से अधिक सेवन नशे का एहसास पैदा करता है। नशे के रूप में कफ सिरप के इस्तेमाल से लिवर व किडनी का खराब होना, सांस लेने में तकलीफ, दिल की धड़कन का अनियमित होना, दिल का दौरा, गंभीर डिप्रैशन, याददाश्त कमजोर होना जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। 

खराब गुणवत्ता वाले कफ सिरप में हानिकारक तत्वों की मौजूदगी से रोगियों की मौत तक हो जाती है। गत वर्ष सितम्बर और अक्तूबर के बीच मध्य प्रदेश व राजस्थान में 24 बच्चों की कफ सिरप पीने से मौत हो गई थी। तमिलनाडु की ‘श्रीसन फार्मास्युटिकल्स’ द्वारा निर्मित उक्त कफ सिरप ‘कोल्ड्रिफ’ के एक बैच में  46.28 प्रतिशत से 48.6 प्रतिशत तक जहरीला पदार्थ ‘डायथिलीन ग्लाइकॉल’ मौजूद था जो उक्त मौतों का कारण बना। सरकार ने 2 अक्तूबर, 2025 को इस कफ सिरप पर प्रतिबंध लगा दिया था तथा इस कम्पनी के डायरैक्टर ‘गोविंद रंगनाथन’ को गिरफ्तार कर लिया था। हिमाचल प्रदेश की एक दवा निर्माता कम्पनी द्वारा निर्मित कफ सिरप भी 12 बच्चों की मौत का कारण बन चुका है। यही नहीं, इससे पूर्व ‘गाम्बिया’ को निर्यात किए गए विभिन्न ब्रांड के कफ सिरप से 70  बच्चों,  ‘इंडोनेशिया’ में 200 से अधिक बच्चों, ‘उज्बेकिस्तान’ में 65 बच्चों और ‘कैमरून’ को निर्यात किए गए कुछ ब्रांड के कफ सिरप पीने से 12 बच्चों की मौत हो चुकी है।

भारत निर्मित कफ सिरपों से इतनी बड़ी संख्या में मौतें ‘विश्व की फार्मेसी’ कहलाने वाले भारत के दवा उद्योग की बदनामी का कारण बनीं। इसीलिए सरकार ने कफ सिरप की गुणवत्ता कायम रखने हेतु इनकी सख्त निगरानी के लिए कुछ कदम उठाए हैं। इनके अनुसार 1945 में लागू औषधि नियंत्रण नियमों में बदलाव करने के लिए गत वर्ष दिसम्बर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी करके दवा निर्माताओं से सिरप के रूप में बेची जाने वाली दवाओं, विशेष रूप से खांसी की दवाओं (सिरप) की डाक्टर की पर्ची के बगैर बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के विषय में आपत्तियां और सुझाव मांगे थे। इसके तहत कफ सिरप को अब उस लिस्ट से हटा दिया गया है जिसमें दवाएं सीधे दुकान से खरीदी जा सकती हैं। सरकार का कहना है कि इससे सिरप आधारित दवाओं पर निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत होगा। साथ ही कफ सिरप निर्माता और विक्रेता को लाइसंैसिंग व क्वालिटी कंट्रोल से जुड़े सख्त नियमों का पालन करना होगा। 

यही नहीं, पहले 1,000 से कम जनसंख्या वाले गांवों में कफ सिरप की बिक्री के लिए कुछ रिटेल लाइसैंसिंग प्रावधानों से छूट थी और दुकानदार डाक्टर की पर्ची के बिना कफ सिरप बेच सकते थे, परंतु नए संशोधन के बाद यह छूट भी समाप्त कर दी गई है। अब दवाई की दुकानों पर इन सिरप की खरीद-बिक्री का पूरा रिकार्ड रखना अनिवार्य होगा ताकि इसकी काला बाजारी और नशेडिय़ों तक इसकी सप्लाई रोकी जा सके। 

नए संशोधन के बाद ‘केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन’ कफ सिरप बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले कच्चे माल की खरीद से लेकर कफ सिरप की संबंधित दुकान में बिक्री तक पहुंचने की प्रक्रिया की कड़ी निगरानी सुनिश्चित करेगा। इन कदमों से कफ सिरप के नशे के रूप में इस्तेमाल और घटिया गुणवत्ता वाले कफ सिरप का निर्माण रोकने में कुछ सहायता अवश्य मिलेगी तथा घटिया गुणवत्ता के कफ सिरप से होने वाले नुक्सान से लोग बच सकेंगे। अत: देर से लिए गए इस सही निर्णय के अंतर्गत नियमों को कड़ाई से लागू करने और इसकी सख्त निगरानी करने की जरूरत है।—विजय कुमार 

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