Edited By ,Updated: 28 May, 2026 02:48 AM

ब्रिटिश काल में 1926 से 1929 के बीच बनी नैरोगेज रेल लाइन मूलत: हिमाचल प्रदेश के ‘जोङ्क्षगदर नगर’ में 110 मैगावाट क्षमता वाली शानन पनबिजली परियोजना के लिए बनाए जाने वाले डैम तक लंदन से मंगवाई गई भारी मशीनरी पहुंचाने के उद्देेश्य से बिछाई गई थी।
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ब्रिटिश काल में 1926 से 1929 के बीच बनी नैरोगेज रेल लाइन मूलत: हिमाचल प्रदेश के ‘जोगिंदर नगर’ में 110 मैगावाट क्षमता वाली शानन पनबिजली परियोजना के लिए बनाए जाने वाले डैम तक लंदन से मंगवाई गई भारी मशीनरी पहुंचाने के उद्देेश्य से बिछाई गई थी। इसे मंडी राज्य के शासक ‘जोगिंदर सैन’ ने ‘कर्नल बी.सी. बैटी’ नामक एक अंग्रेज को निर्माण के लिए लीज पर दिया था तथा यहां से लाहौर, दिल्ली एवं अविभाजित पंजाब को बिजली सप्लाई की जाती थी। यह उत्तर भारत की सबसे पुरानी पनबिजली परियोजनाओं तथा भारत की सबसे पुरानी रेल पटरियों में से एक तथा 20वीं शताब्दी के शुरू में पहाड़ी क्षेत्रों में ‘रेलवे इंजीनियरिंग’ का एक शानदार उदाहरण है। इसे भारत की रेलवे विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
इस रूट में कई सुरंगें, पुल और तीखे मोड़ आते हैं। पहले इस रूट पर 7 रेलगाडिय़ां चला करती थीं, परंतु चक्की पुल ढह जाने से पिछले 3 वर्षों से इस मार्ग पर कोई ट्रेन न चलने के कारण क्षेत्र के लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है तथा फिलहाल यह ट्रेन केवल ‘कांगड़ा’ व ‘जोगिंदरनगर’ के बीच ही चलाई जा रही है। ‘कांगड़ा घाटी संघर्ष समिति’ के प्रधान ‘पी.सी. विश्वकर्मा’ व ‘रेलवे उपभोक्ता सलाहकार समिति’ के सदस्य ‘दीपक भारद्वाज’ के अनुसार यह रेल हिमाचल प्रदेश व पंजाब के लोगों की जीवन रेखा रही है तथा इसका हिमाचल प्रदेश के पर्यटन, व्यापार व सामाजिक जीवन में बड़ा योगदान है।
वर्षों से पंजाब का ‘पठानकोट’ स्टेशन ही इस ट्रेन का प्रमुख प्रारंभिक केंद्र रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि ‘पठानकोट’ में फाटक बंद होने से उन्हें असुविधा होती है, लेकिन यह समस्या केवल ‘पठानकोट’ तक सीमित नहीं है। यदि कहीं ट्रैफिक जाम की समस्या है तो उसका समाधान ट्रेन को बंद करना नहीं बल्कि वहां अंडरपास व फ्लाईओवर बनाने चाहिएं। इस रेल सेवा को बंद करने की बजाय इसे आधुनिक रूप देने की जरूरत है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह रेलवे ट्रैक पूर्णत: सुरक्षित है। अत: इसे केवल अतीत की धरोहर न मान कर भविष्य की संभावना के रूप में भी देखा जाए और आधुनिक तकनीक, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा कुशल प्रबंधन द्वारा इसे पुनर्जीवित किया जाए।
इस समय केंद्र सरकार लोगों की सुविधा के लिए नई-नई रेलगाडिय़ां चला रही है और विदेश यात्राएं सीमित करने को कह रही है। दूसरी ओर लोग भीषण गर्मी से बचने के लिए पहाड़ों का रुख कर रहे हैं। ऐसे में रेल मंत्रालय कांगड़ा रेल सेवा को शीघ्र बहाल करे तो लोगों को अपने देश में भी गर्मी से राहत पाने का अच्छा विकल्प मिलेगा और इस क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। अत: इस रेल सेवा को पूर्णत: बहाल करनेे से न केवल इस क्षेत्र की जनता की लम्बे समय से चली आ रही मांग पूरी होने से लोगों में व्याप्त असंतोष दूर होगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन और व्यापार में वृद्धि से प्रदेश तथा यहां के लोगों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
सुनने में आया है कि 2 जून से रेलगाडिय़ां चलनी शुरू हो जाएंगी लेकिन केवल 2 गाडिय़ां ही पठानकोट रेलवे स्टेशन तक जाएंगी और वापस आएंगी जबकि बाकी गाडिय़ां केवल नूरपुर रोड रेलवे स्टेशन व ज्वालामुखी रोड रेलवे स्टेशन तक ही सीमित रहेंगी। इससे लोग बिल्कुल खुश नहीं हैं। ‘कांगड़ा ट्रेन’ आम जनता की आवाज, जरूरत और जनता की धरोहर है। लोगों की मांग है कि जैसे 4 वर्ष पहले तक बैजनाथ-पपरोला रेलवे स्टेशन से पठानकोट रेलवे स्टेशन तक 7 गाडिय़ां नियमित रूप से चलती थीं, उसी तरह पहले वाला ही पूरा टाइम टेबल बहाल किया जाए ताकि क्षेत्र की जनता को फिर से पहले वाली सुविधाएं मिल सकें।-विजय कुमार