बिहार : नए मुख्यमंत्री के सामने नीतीश से अधिक करके दिखाने की चुनौती

Edited By Updated: 07 Mar, 2026 04:01 AM

bihar the new chief minister faces the challenge of outperforming nitish kumar

बिहार की राजनीति में सस्पैंस चरम पर है। राज्यसभा के लिए नामांकन के बाद  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी 2 दशक से पुरानी मुख्यमंत्री की कुर्सी से मोह त्यागने का फैसला कर लिया है। यह बिहार में नीतीश युग के समापन का शंखनाद है। 1 मार्च को ही नीतीश ने...

बिहार की राजनीति में सस्पैंस चरम पर है। राज्यसभा के लिए नामांकन के बाद  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी 2 दशक से पुरानी मुख्यमंत्री की कुर्सी से मोह त्यागने का फैसला कर लिया है। यह बिहार में नीतीश युग के समापन का शंखनाद है। 1 मार्च को ही नीतीश ने उम्र का 75 साल का पड़ाव पार किया।

भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक से नेताओं के लिए 75वां वर्ष वानप्रस्थ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रदेश की राजनीति से अलग होने की इच्छा जताते समय अपनी उम्र का कोई उल्लेख नहीं किया, मगर उम्र का पड़ाव एक ऐसा सच है, जो किसी से छुपा भी नहीं है। वैसे भी नीतीश कुमार राज्यसभा में तो रहेंगे ही और उन्होंने अपने राज्यसभा जाने के फैसले में जो संदेश ‘एक्स’ पर जारी किया था, उसमें भी उल्लेख है कि उनकी सहयोगी की भूमिका बनी रहेगी। उधर भाजपा नेता और गृहमंत्री अमित शाह पिछले दिनों यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पार्टी संविधान में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। बिहार में विधानसभा चुनाव बीते अभी ठीक से 3 महीने से कुछ ज्यादा ही समय हुआ है।  बिहार का विधानसभा चुनाव भाजपा-जद (यू) गठबंधन ने नीतीश के चेहरे पर ही जीता था। हालांकि चुनाव के दौरान कुछ लोग अटकलें लगा रहे थे कि बड़ी जीत के बाद भाजपा मुख्यमंत्री पद का दावा कर सकती थी लेकिन नीतीश के नेतृत्व में चुनाव जीता गया था, इसीलिए वह रिकार्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री भी बने। 

नीतीश कुमार 2 दशक से ज्यादा समय से बिहार की राजनीति की धुरी माने जा रहे हैं। सीटें कम आईं, ज्यादा आईं, कुर्सी पर वही रहे (अपवादस्वरूप एक बार खुद उन्होंने ही जीतन राम मांझी को कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री बनाया था)। इसी से उनकी यह छवि मजबूत हुई है कि वह बिहार के धुरी हैं। दलितों में महादलित बनाने के बड़े काम के अलावा कुर्मी-कुशवाहा पिछड़े और महा पिछड़े का संतुलन बनाकर उन्होंने पिछड़ों का मसीहा बनने की कोशिश कर रहे लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी को बिहार की राजनीति के उस कोने में बैठा दिया है, जो विपक्ष का कोना कहलाता है। नीतीश कुमार ने कभी मूल्यों की राजनीति से अपनी पहचान बनाई थी। अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार में उन्हें रेलमंत्री बनाया गया था, 1 अगस्त, 1999 को गैसल रेल हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था। मार्च 2000 में वाजपेयी सरकार के समर्थन पर समता पार्टी के सदस्य के रूप में वह पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनका पहला कार्यकाल सिर्फ 7 दिन का था। सदन में बहुमत साबित करने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद 2005 में उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर बहुमत से सरकार बनाई। उनका यही कार्यकाल बिहार और बिहार की राजनीति को बदलने वाला कहा जाता है। 

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने एक लाख से अधिक स्कूल शिक्षकों की नियुक्ति की। कई गांवों में बिजली पहुंचाई, सड़कों का निर्माण किया, महिला निरक्षरता दर आधी कर दी, अपराध पर नकेल कसी, बिहार के लोगों की औसत आय भी तेजी से बढ़ी। अपने पहले पूर्ण कार्यकाल में उन्होंने कई बड़े काम किए। उन्होंने छात्राओं को साइकिल देने और स्कूल में भोजन कार्यक्रम शुरू किया। इससे बड़ी संख्या में लड़कियों ने स्कूलों में दाखिला लेना शुरू किया और स्कूल छोडऩे की दर में भी कमी आई। 2010 के चुनाव में पहली बार बिहार में महिला और युवा मतदाताओं की उच्च भागीदारी देखने को भी मिली। यह नीतीश की बढ़ती लोकप्रियता का प्रतीक था। नीतीश कुमार को बिहार में सुशासन बाबू नाम मिला तो इसके पीछे उनके द्वारा किए गए कार्य ही थे। शराबबंदी ने महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। नीतीश कुमार ने बिहार में जो किया है, उसके बाद अब उनकी जगह लेने वाले मुख्यमंत्री के लिए उससे आगे बढ़कर करने की चुनौती होगी। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, ढांचागत विकास और गरीबी अब भी बिहार की सबसे बड़ी समस्याएं हैं। झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है और कृषि आधारित व्यवस्था मौजूदा समय में लाभ का बड़ा सौदा नहीं है। 

माना जा रहा है कि नया मुख्यमंत्री भाजपा से होगा। यह मानने के पीछे ठोस वजह है कि भाजपा सबसे बड़ा दल है और इसलिए मुख्यमंत्री उसका होना चाहिए। मगर बिहार में मुख्यमंत्री का पद कांटों का ताज भी है। इसके साथ चुनौतियां भी हैं। वहां सिर्फ दलीय समीकरण ही मायने नहीं रखते, सामाजिक या कहें जातीय समीकरण भी साधने पड़ते हैं। नीतीश ने जातीय समीकरण बड़े सलीके से साधे थे और जो वर्ग या जाति उनके साथ नहीं थी, वह भाजपा के साथ थी। अल्पसंख्यकों का एक वर्ग भी उनके साथ था। सीमैंट मजबूत था। लेकिन अब भाजपा के नेतृत्व में चीजें आने से समीकरणों की रिसैटिंग होगी ही। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जो दिख रही है, वह है पिछड़ों के अलावा अति पिछड़े और दलितों को साधे रखना। यूं तो ये वर्ग या तो जद (यू) के साथ हैं या फिर भाजपा के साथ लेकिन भाजपा के नेतृत्व में आते ही इन समीकरणों को पुख्ता करना नए मुख्यमंत्री की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

बिहार की राजनीति के मद्देनजर यह तय है कि मुख्यमंत्री पिछड़े/अति पिछड़े  वर्ग का ही होगा। लेकिन सबको साधना आसान काम नहीं होगा। यह जरूर है कि भाजपा की सरकार बनने के बाद बहुत दिन बाद उसका मूल वोटर, जिसमें पिछड़ों का एक वर्ग और सवर्ण वोट है, उसकी बांछें खिल सकती हैं। लेकिन सबको लेकर चलना आसान नहीं होगा, खास तौर से जब जातीय हित भी टकराते हैं। वैसे नए मुख्यमंत्री के सामने शासन में कायाकल्प की चुनौती भी होगी, क्योंकि उसे कुछ नया कर दिखाना होगा, नीति के तौर पर भी और सामने दिखने के तौर पर भी। उम्मीद है कि नई सरकार कुछ नए रास्ते बनाने वाली होगी।-अकु श्रीवास्तव
 

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