स्कूलों की थाली में संकट : मिड-डे मील व्यवस्था पर पुर्नविचार की जरूरत

Edited By Updated: 13 May, 2026 05:17 AM

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भारत की मिड-डे मील योजना, जिसे अब प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना कहा जाता है, दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल पोषण योजनाओं में से एक है। हर दिन यह योजना करोड़ों बच्चों तक इस उम्मीद के साथ भोजन पहुंचाती है कि देश का कोई भी बच्चा भूखे पेट पढ़ाई न...

भारत की मिड-डे मील योजना, जिसे अब प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना कहा जाता है, दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल पोषण योजनाओं में से एक है। हर दिन यह योजना करोड़ों बच्चों तक इस उम्मीद के साथ भोजन पहुंचाती है कि देश का कोई भी बच्चा भूखे पेट पढ़ाई न करे। लेकिन अपनी महत्वाकांक्षी सोच और बड़े दावों के बावजूद, यह योजना आज भी बदइंतजामी, भ्रष्टाचार, कमजोर निगरानी और पोषण की कमी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। आए दिन सामने आने वाली घटनाएं, जैसे भोजन विषाक्तता, सड़ी-गली सामग्री, गंदे रसोईघर और दूषित भोजन, यह दिखाती हैं कि भारत अब भी अपने बच्चों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। यह केवल प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा गंभीर संकट है।

जब कल्याणकारी योजना ही खतरा बन जाए : पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों से ऐसी भयावह खबरें सामने आई हैं, जहां मिड-डे मील खाने के बाद बच्चे बीमार पड़ गए। कहीं खाने में कीड़े मिले, कहीं सड़ी सब्जियां परोसी गईं, कहीं खाने में मरा हुआ सांप तो कहीं खराब अंडे और अस्वच्छ रसोईघरों ने बच्चों की जान तक जोखिम में डाल दी। इन घटनाओं को केवल ‘दुर्घटना’ कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये उस व्यवस्था की पोल खोलती हैं, जहां जवाबदेही कमजोर और निगरानी लगभग प्रतीकात्मक बनकर रह गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि गरीब परिवारों के लाखों बच्चों के लिए यही दिन का सबसे पौष्टिक भोजन होता है। ऐसे में यदि वही भोजन असुरक्षित हो जाए, तो यह सीधे बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य पर हमला है।

भारत के बच्चों में पोषण संकट-आंकड़े बेहद चिंताजनक : भारत आज भी दुनिया में बाल कुपोषण के सबसे बड़े बोझ वाले देशों में शामिल है।

यूनिसेफ और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार : भारत में लगभग 35 प्रतिशत बच्चे ‘स्टंटिंग’ का शिकार हैं, यानी लगातार कुपोषण के कारण उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हुआ है। बच्चों में ‘वेसिं्टग’ और कम वजन की समस्या भी वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। 
सबसे गंभीर स्थिति एनीमिया को लेकर है। एन.एफ.एच.एस. के आंकड़ों के अनुसार : भारत में 6 महीने से 5 साल तक के लगभग 67 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं, जबकि वैश्विक औसत लगभग 40 प्रतिशत के आसपास है। एनीमिया केवल कमजोरी नहीं लाता, बल्कि बच्चों की याद्दाश्त, एकाग्रता, सीखने की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक विकास को भी प्रभावित करता है। कुपोषित बच्चा केवल शारीरिक रूप से कमजोर नहीं होता, बल्कि उसका बौद्धिक विकास भी बाधित हो जाता है।
दूसरे देश भारत से बेहतर कैसे कर पाए : कई ऐसे देश, जिनकी अर्थव्यवस्था भारत से छोटी है, स्कूल पोषण कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन के कारण बच्चों के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार कर चुके हैं।

ब्राजील : ब्राजील ने स्थानीय किसानों को स्कूल भोजन प्रणाली से जोड़ा। वहां भोजन की गुणवत्ता, ताजा सामग्री और सामुदायिक निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
जापान : जापान में स्कूल भोजन शिक्षा का हिस्सा माना जाता है। बच्चों को भोजन के साथ अनुशासन, स्वच्छता और पोषण का महत्व भी सिखाया जाता है।
फिनलैंड : फिनलैंड हर बच्चे को वैज्ञानिक तरीके से तैयार पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराता है, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
भारत क्यों पिछड़ रहा है?
भारत में समस्या नीतियों की कमी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की कमजोरी है। मुख्य कारण हैं-घटिया सामग्री की खरीद, कमजोर निगरानी, खराब बुनियादी ढांचा, पोषण संबंधी समझ की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।
योजना को कमजोर करने वाली बड़ी समस्याएं :

1. भ्रष्टाचार और रिसाव : कई जगहों पर निम्न गुणवत्ता का राशन खरीदा जाता है और फर्जी बिलिंग के जरिए धन की हेराफेरी होती है।
2. खराब रसोई व्यवस्था : आज भी हजारों सरकारी स्कूलों में साफ रसोईघर, शुद्ध पानी, सुरक्षित भंडारण और स्वच्छता सुविधाओं की कमी है।
3. जवाबदेही का अभाव : अक्सर कार्रवाई किसी हादसे के बाद ही होती है। नियमित निरीक्षण और सख्त दंड व्यवस्था कमजोर है।
4. पोषण की अनदेखी : कई राज्यों में भोजन केवल पेट भरने तक सीमित है। बच्चों को प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और विटामिन की पर्याप्त मात्रा नहीं मिलती।
5. कम वेतन वाले कर्मचारी : मिड-डे मील बनाने वाली सहायिकाओं को बेहद कम मानदेय दिया जाता है, जबकि उन पर भारी जिम्मेदारी होती है।
भारत को क्या करना चाहिए?

1. पोषण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए : कुपोषित पीढ़ी देश की आॢथक और सामाजिक प्रगति को कमजोर करती है।
2. आधुनिक रसोई व्यवस्था विकसित हो : सरकार को स्वच्छ और तकनीकी रूप से सुरक्षित रसोईघरों में निवेश करना होगा।
3. तकनीक आधारित निगरानी लागू हो : जी.पी.एस. ट्रैकिंग, डिजिटल मॉनिटरिंग और शिकायत प्रणाली से भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है।
4. प्रोटीन और पोषण बढ़ाया जाए : अंडे, दालें, दूध, फल और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
5. स्थानीय समुदायों को जोड़ा जाए : अभिभावकों, एन.जी.ओज और स्थानीय समितियों को निगरानी प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है।

सही तरीके से लागू हो तो : यदि मिड-डे मील योजना को गंभीरता और ईमानदारी से लागू किया जाए, तो यह भारत की सबसे प्रभावशाली सामाजिक योजनाओं में बदल सकती है। एक स्वस्थ बच्चा बेहतर सीखता है, स्कूल में टिकता है, आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है। बेहतर पोषण ड्रॉपआऊट कम करेगा, बाल मजदूरी घटाएगा, शिक्षा स्तर सुधारेगा और भारत की युवा शक्ति को मजबूत बनाएगा।
भारत वैश्विक महाशक्ति बनने का सपना देखता है। लेकिन कोई भी देश तब तक वास्तविक महाशक्ति नहीं बन सकता, जब तक उसके करोड़ों बच्चे कुपोषण से जूझते रहें। देश का भविष्य केवल संसद या कॉर्पोरेट दफ्तरों में तय नहीं होता, वह देश के सरकारी स्कूलों की रसोई में भी तय होता है। अगर वे रसोइयां असफल होती हैं, तो भारत का भविष्य भी कमजोर पड़ जाएगा।-आदिल आजमी

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