अमरीका में पढ़ने का सपना

Edited By Updated: 12 May, 2026 06:15 AM

dream of studying in america

हाल ही में एक खबर आई थी कि 45 प्रतिशत भारतीय अब अमरीका में नहीं रहना चाहते। उन्हें लगता है कि अमरीका में न अब उनका रोजगार सुरक्षित है, न ही जीवन। इसका कारण भी है। जब सरकार के बड़े-बड़े नेताओं और अधिकारियों द्वारा प्रवासियों के खिलाफ रोज नफरत भरे...

हाल ही में एक खबर आई थी कि 45 प्रतिशत भारतीय अब अमरीका में नहीं रहना चाहते। उन्हें लगता है कि अमरीका में न अब उनका रोजगार सुरक्षित है, न ही जीवन। इसका कारण भी है। जब सरकार के बड़े-बड़े नेताओं और अधिकारियों द्वारा प्रवासियों के खिलाफ रोज नफरत भरे बयान दिए जाएं, उन्हें अमरीकी लोगों के रोजगार का चोर बताया जाए, उन्हें नर्क से आने वाला कहा जाए, यही नहीं, नौकरी देने वालों पर यह शर्त लगाई जाए कि यदि किसी बाहरी को नौकरी दे रहे हो, तो पहले यह बताओ कि उस नौकरी के लिए क्या कोई अमरीकी उपलब्ध नहीं था? 

एच1बी वीजा, जिसे लेकर प्रवासी वहां नौकरी करने जाते हैं, उसे अब एच1बी एब्यूज (गाली) कहा जा रहा है। वहां कई रिपब्लिकन सांसदों ने इस पर 3 साल के लिए पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की है। नौकरियां तो छोडि़ए, वहां पढऩे वाले विद्याॢथयों पर भी खतरा मंडरा रहा है। अमरीका में बहुत-सी मशहूर यूनिवर्सिटीज हैं। इनमें से कई, जैसे कि येल, प्रिंसटन, हारवर्ड, कोर्नेल आदि को आई.वी. लीग यूनिवर्सिटी कहा जाता है। यहां पढऩा दुनिया भर के युवाओं का सपना होता है लेकिन ट्रम्प के आने के बाद अब जैसे यह सपना भी धूल-धूसरित होने के कगार पर है। अब वहां ऐसा कानून बनने वाला है, जो छात्रों को मिलने वाले वीजा के नियमों को पूरी तरह से बदल देगा। इसके अनुसार, जो छात्र 4 साल के लिए पढऩे आया है, उसे वापस जाना होगा। अभी तक छात्र पढऩे के लिए जितना समय चाहिए, तब तक वहां रह सकते थे। यदि उन्हें ज्यादा दिन रुकना है, तो विश्वविद्यालय इसकी अनुमति देते थे और उनका स्टेटस अपडेट कर देते थे। लेकिन अब यदि पढ़ाई में 4 साल से अधिक वक्त लग रहा है, तो  छात्रों को अमरीकी नागरिकता और आव्रजन सेवा में आवेदन करना होगा। इसमें वे कारण भी बताने होंगे कि छात्र को पढ़ाई या कोर्स पूरा करने में क्या दिक्कत हुई? क्या उसके शोध में अधिक वक्त लग रहा है? अथवा कोई बीमारी इसका कारण है? 

इस आवेदन के साथ जिस विश्वविद्यालय या कालेज  में कोई छात्र या छात्रा पढ़ाई कर रही है, वहां  के अधिकारियों को भी बताना होगा कि छात्र को पढ़ाई पूरी करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता क्यों है? इसके लिए विद्याॢथयों को अलग से फीस भी भरनी होगी। उंगलियों के निशान भी देने पड़ सकते हैं। यदि सरकारी अधिकारियों को यह पता चलता है कि किसी विद्यार्थी ने जान-बूझकर पढ़ाई में देरी की है और उसने जो कारण बताए हैं, वे ठीक नहीं हैं तो उसका वीजा समाप्त भी किया जा सकता है। विद्यार्थियों को बस 4 साल का वीजा ही मिलेगा। 
यदि पीएच.डी. कर रहे हैं या मैडीकल की पढ़ाई कर रहे हैं, इनमें अधिक समय लगता है, तो अवधि बढ़ाने के लिए  बार-बार अप्लाई करना होगा। फीस के रूप में अतिरिक्त धन तो लगेगा  ही। यदि कोई अपना कालेज या विषय बदलना चाहता है, उसमें भी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।  पहले के नियमों में वीजा खत्म होने के बाद कोई छात्र 60 दिन तक रह सकता था लेकिन अब यह अवधि मात्र एक महीना ही होगी। बताया जा रहा है कि इन नियमों का सबसे अधिक असर भारतीय छात्रों पर पड़ेगा। इसके बाद चीन का नम्बर है। क्योंकि इस समय अमरीका में भारतीय छात्रों की संख्या 3 लाख, 30 हजार है। चीन के छात्र 2 लाख, 65 हजार से अधिक हैं। शायद यही कारण है कि पिछले दिनों ट्रम्प ने भारत और चीन को नर्क का द्वार कहा था। 

इस बात का दूसरा पक्ष भी देखने लायक है। अमरीका में पढऩे के लिए प्रवासी छात्र भारी-भरकम रकम खर्च करते हैं। इसके लिए वे या उनके माता-पिता बड़ी राशि का कर्ज भी लेते हैं। पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी कि अब अमरीका जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या लगातार कम हो रही है। जितनी भी मशहूर अमरीकी यूनिवॢसटीज हैं, वे इन्हीं छात्रों के पैसों के बल पर फलती-फूलती हैं। अब मान लीजिए ये छात्र वहां न जाएं, तो इन विश्वविद्यालयों की आय में भारी कमी आएगी। तब ये क्या करेंगे। इसीलिए शुरुआती दौर में कई यूनिवर्सिटीज ने ऐसे नियमों का विरोध किया था लेकिन ट्रम्प ने तब उनको दी जाने वाली सरकारी सहायता पर रोक लगाने की धमकी दी थी। 

भारत के या अन्य देशों के छात्र अमरीका में पढऩे इसीलिए जाते थे कि वहां पढ़ेंगे, फिर वहीं नौकरी मिल जाएगी। डालर में कमाएंगे और रुपए में यहां जो कर्ज लिया है, उसे आसानी से चुका देंगे। मगर अब जब उनके पास समय ही नहीं होगा, तो वे नौकरी ढूंढेंगे कैसे। यदि नौकरी मिल भी जाए, तो एच1बी वीजा मिलना आसान नहीं, जिसे वर्क वीजा भी कहते हैं। फिर कम्पनी को यह भी बताना है कि क्या इस पद के लिए उन्हें कोई योग्य अमरीकी नहीं मिला, जो किसी बाहरी को नौकरी दी। हालांकि बहुत से विद्यार्थी इन नीतियों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन जब पूरी की पूरी सरकार ही प्रवासियों के खिलाफ रोज जहर उगलने में लगी हो, उन्हें मिलने वाले वर्क वीजा को एब्यूज कहा जा रहा हो, तो ऐसे में कौन है जो वहां जाना चाहेगा।-क्षमा शर्मा

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