Edited By ,Updated: 20 Mar, 2026 06:17 AM

भारत की उपभोक्ता शिकायत निवारण प्रणाली एक संरचनात्मक संकट का सामना कर रही है, जिसकी शुरुआत कानून या योजना से नहीं, बल्कि खाली कुर्सियों से होती है।
भारत की उपभोक्ता शिकायत निवारण प्रणाली एक संरचनात्मक संकट का सामना कर रही है, जिसकी शुरुआत कानून या योजना से नहीं, बल्कि खाली कुर्सियों से होती है। उपभोक्ता न्याय रिपोर्ट 2026 एक ऐसी व्यवस्था को उजागर करती है, जिसमें राज्य और जिला दोनों स्तरों पर रिक्तियों और महिलाओं के घटते प्रतिनिधित्व ने संस्थागत क्षमता को खोखला कर दिया है, जिससे न्याय वितरण धीमा हो गया है और उपभोक्ता विश्वास कम। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (आई.जे.आर.) द्वारा जारी की गई यह रिपोर्ट, सूचना के अधिकार से संबंधित आंकड़ों और संसदीय प्रश्नों के आधार पर राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (एस.सी.डी.आर.सी.एस.) की स्थिति का आकलन करती है।
राज्य आयोगों में, प्रत्येक 5 में से 1 पद रिक्त है, कुछ राज्यों में तो 40 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं। आधे से अधिक एस.सी.डी.आर.सी.एस. में अध्यक्षों और सदस्यों की पूरी संख्या नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिला और राज्य आयोगों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2021 में 35 प्रतिशत से घटकर 2024 में 23.2 प्रतिशत हो गया, जो बाद में 2025 में बढ़कर 29 प्रतिशत हो गया। 2024 में केवल दिल्ली और सिक्किम राज्य आयोगों में महिला अध्यक्ष होने की जानकारी मिली। कई मामलों में, आयोग बैंच गठित करने में भी असमर्थ रहे। जिला स्तर पर संकट और भी गहरा जाता है। भारत में 775 जिलों के लिए केवल 685 जिला आयोग हैं, जिससे उपभोक्ता न्याय तक बुनियादी पहुंच में कमी रह जाती है।
संस्थागत कमियों के कारण लंबित मामले : उपभोक्ता मामलों में से लगभग 33 प्रतिशत मामले अभी भी 3 साल से अधिक समय से लंबित हैं, जो कि 3 से 5 महीने की वैधानिक समय सीमा से कहीं अधिक है। झारखंड में कर्मचारियों के लगभग 64 प्रतिशत पद रिक्त हैं, जो रिपोर्ट करने वाले राज्यों में सबसे अधिक है। इसी तरह, पुड्डुचेरी और दिल्ली में भी 40 प्रतिशत या उससे अधिक पद रिक्त हैं।
केरल और हिमाचल प्रदेश भी अपनी वैधानिक बैंचों का गठन करने की आवश्यकताओं को पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत, कुछ राज्य अपेक्षाकृत कम रिक्तियों और बेहतर संस्थागत निरंतरता के साथ अधिक स्थिर स्थिति प्रस्तुत करते हैं, जैसे बिहार और हरियाणा अपवाद के रूप में सामने आए हैं, जिन्होंने विशेष रूप से बड़े और मध्यम आकार के राज्यों में अध्यक्ष और सदस्य दोनों पदों को भरा है। महानगरीय संदर्भ में, बेंगलुरु के जिला आयोगों ने 2021 से 2025 के बीच सदस्यों और अध्यक्षों की पूरी संख्या होने की रिपोर्ट दी, जबकि कोलकाता ने भी अधिकांश वर्षों में लगातार कर्मचारियों की संख्या बनाए रखी। राज्य और जिला स्तर पर लगभग 89 प्रतिशत मामलों का निपटारा हो चुका है लेकिन यह आंकड़ा एक गहरी अक्षमता को छिपाता है। निपटारे की गति दर्ज मामलों की संख्या के बराबर नहीं है और न्याय निर्णय में देरी लगातार बढ़ती जा रही है।
बढ़ते मामले, घटती कार्यकुशलता : रिपोर्ट में 2010 से 2024 के बीच दर्ज किए गए लगभग 28 लाख मामलों का विश्लेषण किया गया है, जो महामारी के बाद दर्ज किए गए और निपटाए गए दोनों मामलों में स्पष्ट वृद्धि दर्शाते हैं। हालांकि, कार्यकुशलता में गिरावट आ रही है। वार्षिक मामले निपटान दर, जो हाल के वर्षों में 100 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई थी, 2024 में घटकर 98 प्रतिशत हो गई, जो इस बात का संकेत है कि नए मामले निपटाए गए मामलों से अधिक होने लगे हैं।
न्याय की दहलीज पर बाधा : मामलों की संख्या बढऩे के बावजूद, बड़ी संख्या में उपभोक्ता ऐसे आयोगों से संपर्क नहीं करना पसंद करते। रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक अंतर्दृष्टि को उजागर करती है-लोग अक्सर मुकद्दमेबाजी से इसलिए नहीं बचते क्योंकि नुकसान नगण्य होता है, बल्कि इसलिए कि प्रणाली दूरस्थ, जटिल और धीमी लगती है। यह ‘न्याय की सीमा’ समय पर और सुलभ निवारण में विश्वास के क्षरण को दर्शाती है।
राज्यों में असमान प्रदर्शन : तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में अपेक्षाकृत अच्छी मंजूरी दर देखी जा रही है, जबकि अन्य राज्य लगातार लंबित मामलों से जूझ रहे हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में आवेदन तो अधिक आते हैं लेकिन कार्यकुशलता कम है, जिसके परिणामस्वरूप काफी संख्या में आवेदन लंबित रहते हैं।
बड़े राज्यों में आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान का प्रदर्शन अपेक्षाकृत अच्छा है, जबकि तेलंगाना और झारखंड पीछे रह गए हैं। छोटे राज्यों में मेघालय और सिक्किम अग्रणी हैं, जबकि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों को क्षमता संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
क्षेत्रीय दबाव और संरचनात्मक सीमाएं : कुछ क्षेत्र मुकद्दमेबाजी के परिदृश्य में हावी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आवास क्षेत्र सबसे ऊपर है, उसके बाद बीमा और बैंकिंग का स्थान आता है। जिला स्तर पर, ‘अन्य’ श्रेणी का हिस्सा सबसे अधिक है, उसके बाद बीमा क्षेत्र का स्थान आता है, जो अकेले ही मामलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।-भाविनी मिश्रा