इच्छा मृत्यु : करुणा, संविधान और कानून की कसौटी पर एक ऐतिहासिक प्रश्न

Edited By Updated: 13 Mar, 2026 05:22 AM

euthanasia a historical question on touchstone of constitution and the law

भारत में जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न केवल भावनात्मक या धार्मिक विमर्श तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संविधान, न्यायपालिका और विधि व्यवस्था की गंभीर परीक्षा भी लेते हैं। हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा एक युवक के मामले में जीवन रक्षक उपकरण...

भारत में जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न केवल भावनात्मक या धार्मिक विमर्श तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संविधान, न्यायपालिका और विधि व्यवस्था की गंभीर परीक्षा भी लेते हैं। हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा एक युवक के मामले में जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दिए जाने के बाद इच्छा मृत्यु का विषय एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। वर्षों से कोमा में पड़े व्यक्ति के संबंध में दिया गया यह निर्णय केवल एक परिवार की पीड़ा से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने खड़े उस जटिल प्रश्न को भी सामने लाता है, कि क्या व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार हो सकता है?

संविधान और जीवन के अधिकार की व्याख्या : भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’ प्रदान करता है। प्रारंभिक वर्षों में इसकी व्याख्या केवल जीवन की रक्षा तक सीमित मानी जाती थी, किंतु समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने इसे व्यापक अर्थ देते हुए यह स्पष्ट किया कि जीवन का अर्थ केवल सांस लेना नहीं, बल्कि ‘गरिमा के साथ जीवन जीना’ भी है। इसी सिद्धांत से यह प्रश्न भी जुड़ता है कि यदि किसी व्यक्ति का जीवन केवल कृत्रिम उपकरणों पर निर्भर हो जाए और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना न हो, तो क्या उसे अनिश्चित काल तक उसी स्थिति में बनाए रखना न्यायसंगत है?

न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय : इच्छा मृत्यु के विषय में भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। 1994 में P. Rathinam v. Union of India में सर्वोच्च अदालत ने आत्महत्या के प्रयास को अपराध मानने वाली धारा 309 पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार भी निहित हो सकता है। हालांकि बाद में 1996 के निर्णयGian Kaur v. State of Punjab में अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान व्यक्ति को आत्महत्या का अधिकार नहीं देता, किंतु यह भी कहा कि ‘गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार’ जीवन के अधिकार की अवधारणा से पूरी तरह अलग नहीं है।

इच्छा मृत्यु के प्रश्न को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय 2011 में Aruna Shanbaug v. Union of India  में आया। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ (Aruna Shanbaug v. Union of India) को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी और यह कहा कि जीवन रक्षक उपकरण हटाने का निर्णय अदालत की अनुमति से ही लिया जा सकता है। इसके बाद 2018 में Common Cause v. Union of India में संविधान पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ‘लिविंग विल’ की अवधारणा को मान्यता दी। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति स्वस्थ अवस्था में ही लिखित रूप से यह निर्देश दे सकता है कि यदि भविष्य में वह असाध्य स्थिति में पहुंच जाए तो उसके लिए कृत्रिम जीवन रक्षक उपचार न किया जाए। हालिया मामले में अदालत द्वारा दी गई अनुमति इसी न्यायिक परंपरा का व्यावहारिक विस्तार मानी जा रही है।

इच्छा मृत्यु के प्रकार और कानूनी स्थिति : कानून की दृष्टि से इच्छा मृत्यु दो प्रकार की मानी जाती है। सक्रिय इच्छा मृत्यु (Common Cause v. Union of India), जिसमें किसी दवा या इंजैक्शन के माध्यम से जानबूझकर जीवन समाप्त किया जाता है। भारत में यह अभी भी अवैध है और इसे दंडनीय अपराध माना जाता है।

निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Common Cause v. Union of India) : जिसमें जीवन रक्षक उपकरण या उपचार हटा लिया जाता है ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। सर्वोच्च न्यायालय ने कड़े दिशा-निर्देशों के साथ इसे सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी है।

सामाजिक और नैतिक आशंकाएं : कानून के इस मानवीय पक्ष के साथ कुछ गंभीर आशंकाएं भी जुड़ी हुई हैं। यदि इस व्यवस्था पर पर्याप्त निगरानी न हो तो इसके दुरुपयोग की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक बोझ, संपत्ति विवाद या पारिवारिक दबाव के कारण किसी रोगी को जीवन से वंचित करने का खतरा भी उठ सकता है। यही कारण है कि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के मामलों में चिकित्सकीय बोर्ड, न्यायिक अनुमति और विस्तृत प्रक्रिया अनिवार्य होगी।

भविष्य की दिशा : सर्वोच्च अदालत के हालिया निर्णय के बाद यह स्पष्ट है कि भारत में इच्छा मृत्यु का विषय आने वाले वर्षों में और अधिक गंभीर बहस का विषय बनेगा। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ ऐसे मामलों की संख्या भी बढ़ सकती है, इसलिए यह आवश्यक है कि संसद और न्यायपालिका मिलकर इस विषय पर एक स्पष्ट और संतुलित विधिक ढांचा तैयार करें। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि समाज में इस विषय पर परिपक्व और संवेदनशील चर्चा हो। इच्छा मृत्यु को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया या धार्मिक विवाद के रूप में देखने की बजाय इसे मानवीय पीड़ा, चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं और संवैधानिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में समझना होगा।

निष्कर्ष : एक अधिवक्ता के रूप में यह कहना उचित होगा कि कानून का उद्देश्य 
केवल जीवन को किसी भी कीमत पर बनाए रखना नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और संवेदनशीलता की रक्षा करना भी है। इच्छा मृत्यु का प्रश्न जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी उस जटिल रेखा को छूता है, जहां न्याय, करुणा और सावधानी, तीनों का संतुलन आवश्यक है। सर्वोच्च अदालत का हालिया निर्णय इसी संतुलन की तलाश का एक महत्वपूर्ण कदम है। समाज, कानून और चिकित्सा व्यवस्था को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ा से मुक्ति का अधिकार करुणा के साथ लागू हो, परंतु जीवन के मूल्य और मानवीय गरिमा की रक्षा भी उतनी ही दृढ़ता से बनी रहे।-रजत थरेजा (अधिवक्ता चंडीगढ़ हाई कोर्ट) 

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