इच्छा मृत्यु : किसी को ये दिन न देखने पड़ें

Edited By Updated: 17 Mar, 2026 05:59 AM

euthanasia may no one ever have to see such a day

हाल ही में हरीश राणा नाम के 31 वर्षीय युवक के माता-पिता की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी। ऐसा देश में पहली बार हुआ। निर्णय देते वक्त अदालत बहुत भावुक भी हो गई। इस युवक के माता-पिता को सैल्यूट भी किया। 13 साल से यह युवक...

हाल ही में हरीश राणा नाम के 31 वर्षीय युवक के माता-पिता की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी। ऐसा देश में पहली बार हुआ। निर्णय देते वक्त अदालत बहुत भावुक भी हो गई। इस युवक के माता-पिता को सैल्यूट भी किया। 13 साल से यह युवक कोमा में था। उसके पूरे शरीर को लकवा भी मार गया था। उसके ठीक होने की कोई उम्मीद भी नहीं थी लेकिन माता-पिता और छोटे भाई ने उसकी बहुत सेवा की। उन माता-पिता की हालत सोचकर कलेजा मुंह को आता है, जिन्हें अपने बेटे की मृत्यु की इजाजत अदालत से लेनी पड़ी। पिता ने कहा कि उनका बेटा टॉपर था। न जाने उसके कितने सपने थे। हॉस्टल में चौथी मंजिल से गिरा, तो फिर कभी उठ नहीं सका। मां सिसकते हुए बोली कि हमारे बाद उसकी देखभाल कौन करता, इसलिए ऐसा निर्णय लेना पड़ा। 

अर्से से अपने यहां इच्छा मृत्यु पर बहस चल रही है। मुम्बई की नर्स अरुणा शानबाग भी दशकों तक कोमा में रहीं। उनके लिए भी इच्छा मृत्यु की मांग अदालत से की गई थी लेकिन अनुमति नहीं मिली थी। बाद में निमोनिया से उनकी मृत्यु हो गई। जिस परिवार पर ऐसी आफत टूटती है, उनके दुखों के बारे में बयान नहीं किया जा सकता। इसीलिए इस मामले में अदालत ने भी कहा कि सरकार को इस बारे में कानून बनाना चाहिए। कुछ साल पहले अंग्रेजी के एक अखबार ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती ऐसे मरीजों के बारे में एक रिपोर्ट छापी थी। इसमें बताया गया था कि कई ब्रेन डैड मरीज वहां सालों से भर्ती हैं। घर वालों से अस्पताल कहता है कि अब उन्हें घर ले जाएं, जिससे कि अन्य मरीजों को उनके बैड मिल सकें। लेकिन घर वाले इसके लिए तैयार नहीं होते। उन्हें लगता है कि घर ले जाकर वे मरीजों की 24 घंटे देखभाल कैसे करेंगे। अस्पतालों की मजबूरी यह होती है कि उनके पास सीमित संसाधन होते हैं, एक बैड खाली हो, तो हो सकता है कि अनेक मरीज उस लाइन में लगे हों। 

यूं भी अपने देश में अस्पतालों की भारी कमी है। प्राइवेट सैक्टर अस्पतालों में जाने के बारे में साधनहीन मरीज तो सोच भी नहीं सकते। शिक्षा की तरह इलाज भी मनुष्य के मौलिक अधिकारों में एक होना चाहिए लेकिन शायद ही कोई इसके बारे में सोचता हो। इसके अलावा ज्यों-ज्यों चिकित्सा प्राइवेट सैक्टर के हाथों में गई है, इलाज महंगे से महंगा होता गया है। लोगों के सारे संसाधन किसी एक व्यक्ति के इलाज में लग जाते हैं। फिर भी बहुत बार मरीज ठीक नहीं होता। हरीश राणा के परिवार को भी उसके घर में रहने पर भी इलाज के लिए अपना तीन मंजिला मकान तक बेचना पड़ा था। उसके माता-पिता ने यह भी कहा कि अदालत के इस फैसले से उन जैसे अनेक परिवारों को राहत मिलेगी, जो इस तरह की विपत्ति से गुजर रहे हैं। वे वर्षों से बेटे को इस असहाय अवस्था में देख रहे हैं और कुछ कर भी नहीं सकते। 

पश्चिम के कई देशों में इच्छा मृत्यृ वैध है। आपको याद होगा कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया के 100 वर्षीय एक वैज्ञानिक इसके लिए स्विट्जरलैंड गए थे। उनका कहना था कि वह बहुत जी लिए, अब और नहीं जीना चाहते। अपनी मृत्यु से एक दिन पहले उन्होंने वहां की खूब सैर की। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें मालूम है कि उनके साथ क्या होगा। तब उन्होंने पूरी प्रक्रिया के बारे में खुद बताया था। अगले दिन अस्पताल में उनकी इच्छा के अनुसार, इंजैक्शन देकर, उन्हें मुक्ति दी गई थी। 

दरअसल अपने बच्चे या परिवार के किसी सदस्य के लिए इस तरह की मृत्यु की मांग करना दिल पर पत्थर रखने जैसा काम है। इसके लिए बहुत साहस चाहिए। लेकिन जब परिस्थितियां अपने हाथ से निकलने लगती हैं, सारे संसाधन सूख जाते हैं, शरीर की हिम्मत जवाब दे जाती है, तो कोई करे भी क्या। किसी गम्भीर बीमारी या दुर्घटना के कारण किसी के साथ ऐसा हो जाए कि उसके जीवन की सम्भावना बिल्कुल न बचे, तो और रास्ता ही क्या है। आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक को तो ऐसी कोई समस्या नहीं थी लेकिन उनका कहना था कि अब जीने से उनका मन भर गया है। यह सोचकर भी दिल भर आता है कि जब अस्पताल में हरीश राणा के सारे मैडीकल सपोर्ट हटाए जाएंगे, तो सामने खड़े माता-पिता, अन्य लोगों पर क्या गुजरेगी। यही प्रार्थना की जा सकती है कि ऐसे दुर्दिन किसी और को न देखने पड़ें। किसी को इतनी यंत्रणा से न गुजरना पड़े।-क्षमा शर्मा

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