मैं अपने हिंदुइज्म के साथ खुश हूं

Edited By Updated: 21 Nov, 2021 03:46 AM

i am happy with my hinduism

मैंने तमिलनाडु के एक गांव में जन्म लिया था जिसका नाम तब रामनाथपुरम जिला था और अब उसका नाम शिवगंगाई जिला है। मुझे गर्व है कि कानियान पुंगुनरानार का जन्म भी इसी जिले

मैंने तमिलनाडु के एक गांव में जन्म लिया था जिसका नाम तब रामनाथपुरम जिला था और अब उसका नाम शिवगंगाई जिला है। मुझे गर्व है कि कानियान पुंगुनरानार का जन्म भी इसी जिले में कुछ किलोमीटर दूर एक गांव में हुआ था जिसका नाम पुंगुनराम (अब महिबालनपट्टी)था। वह एक कवि थे जो छठी शताब्दी बी.सी.ई. तथा पहली शताब्दी सी.ई. के बीच संगम काल में रहते थे। 

उन्हें उनकी 13 पंक्तियों की कविता के लिए बेहतर जाना जाता है जिसकी शुरूआत यादुम ऊरे यावारुम कीलीर शब्दों से होती थी। इसका साधारण अनुवाद है कि ‘प्रत्येक स्थान मेरा गांव है, हर कोई मेरा संबंधी है।’ उनकी कविता में अन्य भी कई नगीने हैं। पहली पंक्ति संयुक्त राष्ट्र की दीवारों पर उकेरी गई है। ऐसा माना जाता है कि कविता 2000 वर्ष पूर्व तथा उससे पहले के तमिलों की जीवन पद्धति को प्रतिबिंबित करती है। 

शब्द ‘हिंदू’
तमिल साहित्य में उस समय के धर्मों के सैवम तथा वैष्णवम के तौर पर दर्ज किया गया है। सामानाम (जैनिज्म) तथा बौद्धम (बुद्धिज्म) बाद के धर्म थे। प्राचीन तमिल साहित्य में ङ्क्षहदू तथा हिंदूवाद शब्द नहीं मिलते। शशि थरूर के अनुसार ‘किसी भी भारतीय भाषा में शब्द ‘हिंदू’ का अस्तित्व नहीं था जब तक कि विदेशियों ने इसे आत्म परिभाषित करने के लिए भारतीयों को एक परिभाषा के तौर पर नहीं दिया।’ 

अधिकतर तमिलों का जन्म ऐसे परिवारों में हुआ है जो हिंदूवाद का अनुसरण करते हैं। वे कई देवताओं की पूजा करते हैं (ग्रामीण देवताओं सहित), पोंगल तथा दीपावली जैसे उत्सव मनाते हैं तथा पोंगल, पल कुदम तथा कावड़ी जैसी रस्मों का पालन करते हैं। तमिल हिंदू शताब्दियों तक ऐसे लोगों के साथ रहते आए हैं जो अन्य धर्मों का पालन करते हैं, विशेषकर 2000 से अधिक वर्षों से ईसाई तथा 800 से अधिक वर्षों से इस्लाम का पालन करने वालों के साथ। मुस्लिम तथा ईसाई विद्वानों तथा लेखकों ने तमिल साहित्य तथा भाषा के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है। जहां तक मेरी जानकारी है किसी भी तमिल हिंदू राजा ने अन्य धर्मों पर हिंदू धर्म की सर्वोच्चता कायम करने के लिए युद्ध नहीं छेड़ा। 

एक श्रद्धेय धर्म के नाम के अतिरिक्त हिंदुइज्म क्या है? यद्यपि मैंने डा. एस. राधाकृष्णन तथा स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखी पुस्तकें पढ़ी हैं, मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि यह जानना आवश्यक था। जो कुछ भी मैंने पढ़ा, सुना उससे मुझे ऐसा लगा कि हिंदूवाद क्या है, इसका उत्तर कुछ साधारण पैराग्राफ्स में दिया जा सकता है। 

साधारण सच
-हिंदूवाद एकमात्र सच्चा धर्म होने का दावा नहीं करता। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि ‘मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म के साथ संबंध रखता हूं जिसने सहिष्णुता तथा सार्वभौमिक स्वीकार्यता जैसे शब्द सिखाए हैं। हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं बल्कि हम सभी धर्मों को सच के तौर पर स्वीकार करते हैं।’
-हिंदुइज्म का कोई एक गिरजाघर, एक पोप, एक पैगम्बर, एक पवित्र पुस्तक अथवा एक अनुष्ठान नहीं है। ऐसे बहुत से हैं तथा हिंदू कइयों में से किसी एक को चुनने अथवा सभी को खारिज करने के लिए स्वतंत्र हैं। कुछ विद्वानों का तर्क है कि कोई भी व्यक्ति हिंदू होने के साथ-साथ एक आस्तिक या अनीश्वरवादी हो सकता है। 

-अपने धर्म निरपेक्ष पहलुओं में हिंदुइज्म ने विवाह की एक प्रणाली अथवा उत्तराधिकार/विरासत की एक प्रणाली का उल्लेख नहीं किया है। हिंदू कानून सुधारों (1955-1956) ने एकरूपता लाने का प्रयास किया लेकिन आज भी कई तरह की विभिन्नताएं अस्तित्व में हैं। 
-हिंदूवाद किसी हिंदू को अन्य देवताओं तथा संतों की पूजा करने की इजाजत देता है। हजारों की संख्या में हिंदू वेलानकन्नी स्थित धर्मस्थल अथवा अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर या अजमेर में दरगाह शरीफ पर अपनी अकीदत पेश करने जाते हैं। इतिहासकार इस बात को लेकर एकमत नहीं हैं कि शिरडी के साईं बाबा मुसलमान थे या हिंदू, वह संभवत: दोनों ही थे क्योंकि वह दोनों धर्मों में कोई अंतर नहीं देखते थे। उनकी एक प्रसिद्ध सूक्ति थी अल्लाह मालिक यानी परमात्मा  राजा है। 

-शिकागो विश्वविद्यालय में हिस्ट्री ऑफ रिलीजन्स की प्रोफैसर डा. वेंडी डोनिगर, जिन्होंने 50 से अधिक वर्षों तक संस्कृत तथा प्राचीन भारतीय धर्म का अध्ययन किया है, ने पाया कि ‘विद्वानों को शताब्दियों से पता है कि प्राचीन भारतीय बीफ खाते थे।’ उन्होंने ऋग्वेद जैसे ग्रंथों तथा ब्राह्मणों के साथ-साथ यज्ञवलक्य तथा एम.एन. श्रीनिवास के लेखों का हवाला दिया है। वर्तमान में अधिकांश हिंदू मांस, मछली तथा अंडे खाते हैं लेकिन बीफ नहीं, बहुत से हिंदू शाकाहारी हैं। 

-डा. डोनिगर ने यह भी कहा कि गांधी जी ने कभी भी गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने को नहीं कहा और उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया कि ‘मैं कैसे किसी को गायों का वध करने के लिए मजबूर कर सकता हूं जब तक कि वह खुद ऐसा न करे? ऐसा नहीं है कि भारतीय संघ में केवल हिंदू हैं। यहां पर मुसलमान, पारसी, ईसाई तथा अन्य धार्मिक समूह हैं।  यद्यपि बहुत से मुसलमान तथा ईसाई बीफ नहीं खाते तथा कई गैर-शाकाहारी लाल मांस कतई नहीं खाते। 

मुझे हिंदुत्व की जरूरत नहीं
इंडियन नैशनल कांग्रेस (1885 में गठित) तथा इंडियन नैशनल सोशल कांफ्रैंस (1887 में गठित) के बीच झगड़े को देखते हुए उन्होंने अफसोस के साथ अपने प्रसिद्ध अनकहे भाषण ‘जाति का नाश’ (1936) में कहा था कि राजनीतिक सुधारों ने सामाजिक सुधारों की जगह ले ली है जिसने राजनीतिक मानसिकता वाले हिंदुओं के लिए कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनमें ‘क्या आप राजनीतिक ताकत के लिए फिट हैं, इसके बावजूद कि आप उन्हें उनकी पसंद के कपड़े अथवा आभूषण नहीं पहनने देते? क्या आप राजनीतिक शक्ति के लिए फिट हैं, इसके बावजूद कि आप उन्हें उनकी पसंद का कोई भोजन खाने की इजाजत नहीं देते?’ ये प्रश्न आज भी सच है लेकिन इनके संदर्भ बदल गए हैं। 

थरूर की तरह ‘मेरा जन्म एक हिंदू के तौर पर हुआ था, मेरा पालन-पोषण भी वैसे ही हुआ और मैं जीवन भर खुद को हिंदू मानता रहा।’ मैं उन 81.6 प्रतिशत हिंदुओं में से हूं जिन्होंने पी.ई.डब्ल्यू. के एक सर्वेक्षण में कहा कि उनका पालन-पोषण एक हिंदू के तौर पर हुआ और वर्तमान में वे खुद को एक हिंदू के तौर पर पहचानते हैं। मैं अपने हिंदुइज्म तथा कानियान पुंगुनरानार के एक साधारण सबक के साथ खुश हूं कि,‘हर कोई मेरा संबंधी है।’ तो मुझे हिंदुत्व की जरूरत क्यों?-पी. चिदम्बरम

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