क्या ‘इंडिया’ गठबंधन के सामने अस्तित्व का संकट है?

Edited By Updated: 13 May, 2026 05:06 AM

is the  india  alliance facing an existential crisis

विघटन में एकता या एकता में विघटन? चकरा गए? निश्चित रूप से, क्योंकि भाजपा की जीत के बाद विपक्षी दरारें चौड़ी हो गईं और हाल के राज्य चुनावों में टी.एम.सी., द्रमुक, माकपा, की हार के साथ हताशा घुल-मिल गई। क्या इंडिया ब्लॉक ने अपनी जीवंतता खो दी है? क्या...

विघटन में एकता या एकता में विघटन? चकरा गए? निश्चित रूप से, क्योंकि भाजपा की जीत के बाद विपक्षी दरारें चौड़ी हो गईं और हाल के राज्य चुनावों में टी.एम.सी., द्रमुक, माकपा, की हार के साथ हताशा घुल-मिल गई। क्या इंडिया ब्लॉक ने अपनी जीवंतता खो दी है? क्या इसने अपना ‘आत्म-विनाश’ बटन दबा दिया है? क्या इसके दिन गिनती के रह गए हैं?  आज पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में हार के बाद ब्लॉक बिखरा हुआ लग रहा है, जो और भी बढ़ सकता है। इस तूफान के केंद्र में, जो ब्लॉक को छिन्न-भिन्न करने की धमकी दे रहा है, इसका सबसे बड़ा घटक कांग्रेस है। पहले से ही, द्रमुक ने अपना अविश्वास स्पष्ट कर दिया है, इसे ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला’ कहा है क्योंकि पुरानी पार्टी (कांग्रेस) नवागंतुक टी.वी.के. के पाले में चली गई। 

हालांकि 22 सांसदों वाली द्रमुक ने औपचारिक रूप से ‘इंडिया’ ब्लॉक से अलग होने की घोषणा नहीं की लेकिन यदि यह अब दूरी बनाने का फैसला करती है, तो यह इस मंच के बिखरने और व्यापक विपक्षी अंतरिक्ष के भीतर कांग्रेस के अलगाव की शुरुआत हो सकती है। आज, केरल अपनी झोली में होने के साथ, कांग्रेस 5 में से 3 दक्षिणी राज्यों में सत्ता में है लेकिन अब वह राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य स्थिति में नहीं है। इसलिए, उसे राज्यों के लिए अधिक अधिकारों की मांग करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन क्या वह संघवाद के लिए उसी तरह ठोस तर्क दे सकती है और देगी, जैसा द्रमुक ने दिया था?

प्रासंगिक रूप से, इंडिया ब्लॉक के भीतर अंतॢवरोध इसके 2023 में गठन के समय से ही हैं। गैर-भाजपा दलों के इस बड़े मंच की कल्पना एक राष्ट्रीय मंच के रूप में की गई थी और इसकी शुरुआत से ही यह स्वीकार किया गया था कि दल राज्य स्तर पर प्रतिस्पर्धा करेंगे, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ आएंगे। निश्चित तौर पर, इसने सामूहिक रूप से 2024 के चुनावों में भाजपा को 240 सांसदों पर रोक दिया था लेकिन इस ढीली व्यवस्था की अव्यवहारिकता तब उजागर हुई, जब क्षेत्रीय विचारों ने जद (यू) के नीतीश को ब्लॉक छोडऩे और एन.डी.ए. के प्रति वफादारी बदलने के लिए मजबूर किया। पश्चिम बंगाल में ब्लॉक के सदस्यों ने प्रतिस्पर्धा की और एक-दूसरे को काटा। ऐसे पुख्ता संकेत हैं कि ब्लॉक अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है और 2 या अधिक स्वरूपों में टूट सकता है, जिससे मोदी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. को 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए स्पष्ट लाभ और पैंतरेबाजी की गुंजाइश मिल जाएगी। तमिलनाडु की घटनाओं ने ब्लॉक के भीतर विश्वास और भरोसे का ऐसा संकट पैदा कर दिया है, जिसे संबोधित करना और उससे उबरना आसान नहीं होगा। अगले साल 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में विपक्षी एकता का भविष्य धुंधला दिख रहा है।

बंगाल में, कांग्रेस को लगता है कि उसके पास पुनरुत्थान का एक काल्पनिक अवसर है और वह उम्मीद कर रही है कि टी.एम.सी. का एक वर्ग ‘घर वापस’ आ जाएगा। दरअसल, राज्य के नेताओं के बीच अपनी हार के लिए ममता की मंडली को दोषी ठहराते हुए तलवारें ङ्क्षखच गई हैं। साथ ही ममता और भतीजे-वारिस अभिषेक बनर्जी के बीच भी चीजें खराब हो गई हैं। कांग्रेस को लगता है कि टी.एम.सी. में भारी पलायन शुरू होने में कुछ महीनों नहीं तो कुछ हफ्तों की ही बात है। एक कांग्रेस-विरोधी मोर्चे के खुलने की संभावना समाजवादी अखिलेश पर टिकी है। यदि सपा सुप्रीमो ममता और द्रमुक का साथ देने का फैसला करते हैं, तो कांग्रेस को बड़ा झटका लगना तय है। अगले साल यू.पी. विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में सपा प्रमुख के पास एक कठिन विकल्प है-कांग्रेस के साथ जाएं या अकेले। मायावती की बसपा के सपा से हाथ मिलाने के कोई संकेत नहीं होने के कारण, अखिलेश को ममता, केजरीवाल, स्टालिन एंड कंपनी का साथ देने की बजाय कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से ज्यादा फायदा होगा। फिर भी, पुरानी पार्टी द्वारा द्रमुक को छोडऩे के बाद, अखिलेश सतर्क हैं। ऐसा ही हाल राजद के तेजस्वी यादव का भी है।

फिर भी सब कुछ खोया नहीं है। गठबंधन अक्सर एक राज्य में टूट जाते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ जारी रहते हैं। एक सांझी रणनीति वाले चुनावी गठबंधन के रूप में मजबूत होने के बावजूद, ब्लॉक आज बुरी तरह कमजोर हो गया है। एक संसदीय भाजपा-विरोधी मंच के तौर पर यह तकनीकी रूप से अब भी जीवित है। विपक्ष को वह भाषा और शैली ढूंढनी होगी जो भाजपा की निपुणता, बहुआयामी स्वर, चुनाव लडऩे वाली मशीनरी और उन संसाधनों का मुकाबला कर सके, जिनसे वह अपने संचार प्रभुत्व और कथित छवि को मजबूत करती है। मोदी ने पहले ही ङ्क्षहदुत्व को ताजा करके, राष्ट्रवाद और देश के स्वाभिमान को परिभाषित और प्रक्षेपित करके चुनौती पेश कर दी है।

बड़ा सवाल : रैली के नारों से परे भाजपा के खिलाफ मोर्चा कौन संभालेगा? स्पष्ट रूप से, अंतॢवरोधों की इस बारूदी सुरंग में, जहां चुनावी लाभ को ध्यान में रखकर रणनीतियां तैयार की जाती हैं, विपक्ष के लिए आगे की राह बनाने के लिए दूरदॢशता, चपलता और लचीलेपन की जरूरत होगी। अब तक विपक्ष ने एकता के सद्भाव के बीच केवल एक बिखरा हुआ मोर्चा ही पेश किया है। इससे ज्यादा कुछ नहीं।-पूनम आई. कौशिश
 

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