पंथक वोटरों के लिए तय करना मुश्किल कि असैंबली चुनावों में वोट दें या नहीं

Edited By Updated: 06 Feb, 2026 04:43 AM

it is difficult for sikh voters to decide whether or not to vote in the assembly

2027 के पंजाब असैंबली के लिए पंथक मामले एक केंद्रीय मुद्दा बन गए हैं। सभी राजनीतिक दल पंथक एजैंडे को आगे रखकर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं। सभी पाॢटयां खुद को पंथक सपोर्टर और दूसरी पाॢटयों को पंथ विरोधी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहीं। लेकिन इस...

2027 के पंजाब असैंबली के लिए पंथक मामले एक केंद्रीय मुद्दा बन गए हैं। सभी राजनीतिक दल पंथक एजैंडे को आगे रखकर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं। सभी पार्टियां खुद को पंथक सपोर्टर और दूसरी पाॢटयों को पंथ विरोधी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहीं। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में, लगभग सभी पाॢटयों की हालत ‘हमाम में सब नंगे’ जैसी हो गई है क्योंकि इस समय सभी मुख्य पाॢटयों पर पंथक हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लग रहा है। अगर हम मौजूदा राजनीतिक दलों का विश्लेषण करें, तो सभी पार्टियों पर पंथक मुद्दों पर किसी पर कुछ कम और किसी पर कुछ ज्यादा आरोप लग रहे हैं। यह सब समझने के लिए, आइए सभी प्रमुख पाॢटयों कांग्रेस, भाजपा, ‘आप’ और अकाली दल बादल के पंथक मुद्दों के प्रति पिछले बर्ताव का विश्लेषण करते हैं।

देश की सबसे पुरानी पार्टी और सबसे लंबे समय तक देश और राज्यों पर राज करने वाली कांग्रेस की बात करें, तो सबसे ज्यादा आरोप इसी पार्टी पर लगते हैं। देश आजाद होने के बाद, जब कांग्रेस सत्ता में आई, तो सिखों यानी पंथ के साथ भेदभाव का दौर शुरू हो गया। अगर इतिहास देखें, तो देश आजाद होने के बाद, सिखों से किए गए वादों को भूलकर, कांग्रेस ने सिखों के साथ भेदभाव करना शुरू कर दिया, जिसमें पंजाब के गवर्नर द्वारा सिखों को क्रिमिनल कम्युनिटी घोषित करना, भाषा के आधार पर पंजाबी राज्य बनाने से मना करना, पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ को केंद्र शासित बनाना, पानी के बंटवारे में पंजाब के साथ भेदभाव करना, पंजाब की चुनी हुई सरकारों को बार-बार तोड़कर राष्ट्रपति शासन लागू करना, श्री अमृतसर के दरबार साहिब में श्री अकाल तख्त पर हमला करना और उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के अलग-अलग हिस्सों में सिखों का कत्लेआम करना और सिखों के कातिलों को सजा देने की बजाय उन्हें ऊंचे पद देना शामिल था। लेकिन कांग्रेस पार्टी इन आरोपों के जवाब में ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति, स. बूटा सिंह को गृहमंत्री, स. मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय लेकर खुद को पंथक हितैषी होने का दावा करती है।

शिरोमणि अकाली दल, जिसे अब अकाली दल बादल के नाम से जाना जाता है, खुद को पंथ का सबसे बड़ा हमदर्द बताता है और उस पर कई पंथ विरोधी काम करने के कई आरोप हैं। इनमें खासकर 1978 में हुई निरंकारी घटना, मोगा कॉन्फ्रैंस के दौरान अकाली दल को पंथक पार्टी की जगह पंजाबी पार्टी घोषित करना, बाबा राम रहीम की बेअदबी के लिए उनके खिलाफ एक्शन न लेना, सरकारी मदद से बाबा राम रहीम की फिल्म चलाना, बाबा राम रहीम को माफ करना, शांति से प्रोटैस्ट करने वाले सिखों पर गोली चलाना और श्री अकाल तख्त साहिब के हुक्मनामे को पूरी तरह लागू न करना तथा सिख मसलों को पूरी तरह हल न करना शामिल है। अकाली दल बादल ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है और सिख पंथ के लिए किए गए अपने कामों का हवाला देकर खुद को सिख पंथ का प्रवक्ता बताया है। इन कामों में पंजाबी सूबा बनाना, सिख गुरुओं के दिनों को बड़े पैमाने पर मनाना, सिख शहीदों की यादगारें बनाना, सिख इतिहास को दुनिया के सामने लाना, विरासत-ए-खालसा जैसी यादगारें बनाना, सिख धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश में प्रचार केंद्र खोलना और कई दूसरे काम शामिल हैं। 

‘आप’, जो कुछ साल पहले ही बनी है, अब तक खुद को सैक्युलर पार्टी के तौर पर पेश करती रही है लेकिन उसने सिखों से किए वादे, जैसे बेअदबी और बहबल कलां और कोटकपूरा गोली कांड में इंसाफ का वादा पूरा नहीं किया है। इसके अलावा, सुल्तानपुर में गुरुद्वारा साहिब पर पुलिस की फायरिंग, ‘आप’ के मुख्यमंत्री द्वारा सिख मर्यादाओं का उल्लंघन, अकाल तख्त साहिब और गुरु की गोलक के बारे में कहे गए अपशब्द, हर दिन हो रही बेअदबी की घटनाएं और गायब पवित्र स्वरूपों की बरामदगी पर यू-टर्न। लेकिन आम आदमी पार्टी ने भी दूसरों की तरह खुद को पंथक हितों के रखवाले के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है। ‘आप’ का दावा है कि उसने बेअदबी करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाए हैं, गायब पवित्र स्वरूपों के मुद्दे पर एफ.आई.आर. दर्ज की है और एस.आई.टी. बनाई है तथा गुरु तेग बहादुर साहिब के 350वें शहीदी दिवस को आधिकारिक तौर पर मनाया है।

चौथी मुख्य पार्टी, भाजपा को भी कई तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें सिखों को एक अलग समुदाय न मानना, कुछ नेताओं द्वारा सिख विरोधी बयान, तीन कृषि कानून और जेल में बंद सिखों की रिहाई शामिल है, जिससे आम सिख भाजपा से दूर हो रहे हैं। लेकिन भाजपा सिखों के लिए किए गए कामों की लंबी लिस्ट पेश करती है, जिसमें भाजपा ने कांग्रेस के समय में ब्लैक लिस्ट किए गए करीब 350 सिखों के नाम हटाने, करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोलने, अफगानिस्तान से गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप श्रद्धा के साथ भारत लाने, हेमकुंट साहिब में रोप-वे बनाने, गुरु साहिबान की शताब्दियां सरकारी स्तर पर मनाने, छोटे साहिबजादों का शहीदी दिवस विश्व स्तर पर मनाने, 84 के सिखों के कातिलों को सजा दिलाने, पीड़ितों को मुआवजा देने और पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी देने, पार्टी संगठन और सरकार में सिखों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने जैसे कामों का खास तौर पर जिक्र किया है।

चुनाव सिर्फ 1 साल दूर हैं, मगर ज्यादातर सिख मुद्दे अभी अनसुलझे हैं। फिलहाल आम सिखों को भी उम्मीद नहीं है कि ये सुलझेंगे। इसलिए, पंथक सोच वाले सिख वोटरों को फैसला लेने में बहुत मुश्किल हो रही है। बड़ी संख्या में सिख सोच रहे हैं कि आने वाले चुनावों में सिर्फ उसी पार्टी का साथ देना चाहिए, जो सिख हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता दिखाए और जो भविष्य के लिए भरोसा दे। इसलिए, पंथक वोटर अभी से सभी राजनीतिक पार्टियों के सिख मुद्दों के प्रति कारगुजारी पर नजर रखे हुए हैं।-इकबाल सिंह चन्नीइकबाल सिंह चन्नी

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