मच्छेड़ी-बदनोटा-लोहाई-मल्हार: खोजे जाने की प्रतीक्षा करते पहाड़

Edited By Updated: 03 Oct, 2026 07:07 PM

machhedi badnota lohai malhar mountains waiting to be discovered

कल्पना कीजिए-सुबह जम्मू से निकलें और शाम तक आपको लगे कि आप जम्मू से बहुत दूर किसी अनजाने पहाड़ी इलाके में पहुंच गए हैं। रास्ते में मंदिर हैं, पुराने पहाड़ी रास्ते हैं, झरने हैं, बर्फ से ढकी चोटियां हैं, गांवों की चाय है और ऐसी सड़कें हैं जिन पर हर...

कल्पना कीजिए-सुबह जम्मू से निकलें और शाम तक आपको लगे कि आप जम्मू से बहुत दूर किसी अनजाने पहाड़ी इलाके में पहुंच गए हैं। रास्ते में मंदिर हैं, पुराने पहाड़ी रास्ते हैं, झरने हैं, बर्फ से ढकी चोटियां हैं, गांवों की चाय है और ऐसी सड़कें हैं जिन पर हर मोड़ के बाद सामने का दृश्य बदल जाता है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह कोई दूर का पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि हमारे अपने जम्मू संभाग का वह हिस्सा है जिसे अभी पर्यटन के नक्शे पर वह पहचान नहीं मिली है जिसका वह हकदार है।

बिलावर से शुरू होने वाली यह यात्रा सुकराला, घट और नानगला से गुजरती हुई सच्चाई देवता की पहाड़ी राहों तक पहुंचती है। फिर मच्छेड़ी, बदनोटा और किंडली की ओर बढ़ते हुए रास्ता झरनों, जंगलों और पहाड़ी गांवों के बीच से लोहाई-मल्हार की ओर जाता है। कहीं धार्मिक आस्था रास्ता रोकती है, कहीं कोई झरना कुछ देर ठहरने के लिए मजबूर करता है और कहीं पहाड़ों के बीच बसा कोई गांव अपनी सादगी से मन जीत लेता है।

यहां आने के लिए किसी आलीशान पर्यटन स्थल की तलाश नहीं करनी होगी। यहां खुद सफर ही पर्यटन है। किसी के लिए यह चुनौतीपूर्ण पहाड़ी यात्रा हो सकती है, किसी के लिए शांत सप्ताहांत, किसी के लिए मंदिरों और लोक परंपराओं से जुड़ी यात्रा और किसी के लिए गांव के घर में बैठकर स्थानीय भोजन चखने का अनुभव। सर्दियों में लगभग पूरे क्षेत्र में बर्फबारी इस अनुभव को एक अलग रूप देती है, जबकि गर्मियों की हरियाली और बरसात के झरने इसे दूसरी पहचान देते हैं।

मच्छेड़ी-बदनोटा-लोहाई-मल्हार की असली संभावना इसी विविधता में छिपी है। यहां पर्यटन केवल पहाड़ देखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे स्थानीय संस्कृति, ग्रामीण घरों में ठहरने, स्थानीय भोजन, बागवानी, प्राकृतिक संसाधनों और ग्रामीण रोजगार से जोड़कर एक अलग तरह का पर्वतीय पर्यटन मॉडल बनाया जा सकता है।

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    सवाल केवल यह नहीं है कि इस क्षेत्र में पर्यटक आएंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम इस क्षेत्र की अपनी खूबसूरती को पहचानकर उसे उसी रूप में दुनिया के सामने ला सकते हैं, जैसी वह वास्तव में है?

    बिलावर से पहाड़ों की ओर :- जम्मू और कठुआ से आने वाले यात्रियों के लिए जम्मू–कठुआ राजमार्ग से दयालाचक होते हुए बिलावर की ओर बढ़ा जा सकता है। छल्ला से यह मार्ग धार सड़क से जुड़ता है। ऊधमपुर की ओर से आने वाले यात्रियों के लिए भी धार सड़क इस क्षेत्र तक पहुंचने का एक रास्ता है। गुजरू नगरोटा से होकर सड़क बिलावर पहुंचती है। बिलावर इस पूरे पहाड़ी क्षेत्र का स्वाभाविक प्रवेश द्वार कहा जा सकता है। यहां बिल्वेश्वर मंदिर और हनुमान शिला जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। बिलावर से लगभग नौ किलोमीटर आगे सुकराला देवी मंदिर स्थित है। सुकराला से आगे मार्ग घट और नानगला की ओर बढ़ता है। नानगला से पहले सच्चाई देवता मंदिर की ओर जाने वाली पैदल राह धार्मिक यात्रा में रोमांच भी जोड़ देती है। मुख्य सड़क पर लौटने के बाद रास्ता मच्छेड़ी की ओर जाता है। मच्छेड़ी से आगे किंडली, बदनोटा और लोहाई का पर्वतीय क्षेत्र आता है। लोहाई से लगभग पांच किलोमीटर आगे मल्हार है। दूसरी ओर नेल्हेऊ, नालोटू, कटली और किशनपुर होते हुए बिलावर तक विकसित हो रहा मार्ग इस पूरे क्षेत्र के लिए संपर्क के नए विकल्प खोल रहा है।

    यदि इन सभी मार्गों और स्थलों को एक व्यवस्थित योजना के तहत जोड़ा जाए तो ऐसा पर्यटन मार्ग तैयार हो सकता है, जिसमें धार्मिक स्थल, पैदल यात्राएं, झरने, पहाड़ी यात्रा, गांवों का जीवन और स्थानीय भोजन-सब एक ही यात्रा का हिस्सा हों।

    यहां मंजिल से ज्यादा रास्ता महत्वपूर्ण है । इस क्षेत्र की सबसे बड़ी पर्यटन संभावना शायद किसी एक प्रसिद्ध स्थल में नहीं, बल्कि पूरे सफर में छिपी हुई है। मोटरसाइकिल से पहाड़ी यात्रा करने वालों के लिए यहां के घुमावदार और चुनौतीपूर्ण रास्ते आकर्षण पैदा करते हैं। जिन लोगों को शांत वातावरण पसंद है, उनके लिए यही सड़कें शहर की भागदौड़ से दूर कुछ घंटे बिताने का अवसर देती हैं। कहीं सड़क किनारे रुककर पहाड़ों को देखना, किसी गांव की छोटी-सी दुकान पर चाय पीना, पगडंडी पकड़कर झरने तक जाना या किसी स्थानीय परिवार के साथ बैठकर भोजन करना-यही छोटे-छोटे अनुभव किसी जगह को यादगार बनाते हैं।

    किंडली और बदनोटा के झरने प्रकृति और पैदल पर्यटन के अच्छे केंद्र बन सकते हैं। स्थानीय लोगों द्वारा वर्षों से इस्तेमाल की जा रही पुरानी पगडंडियों का सर्वेक्षण कर, उनकी सुरक्षा और स्थिति का आकलन करने के बाद उन्हें व्यवस्थित पैदल मार्गों के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस क्षेत्र की एक और विशेषता इसका मौसम है। सर्दियों में लगभग पूरे मच्छेड़ी–बदनोटा–लोहाई-मल्हार क्षेत्र में बर्फबारी होती है। गर्मियों की हरियाली, बरसात में बहते झरने और सर्दियों की बर्फ-तीनों अलग-अलग समय में यहां आने का कारण बन सकते हैं। इसलिए यहां पर्यटन को केवल गर्मियों तक सीमित रखने के बजाय सर्दियों में बर्फ देखने और पहाड़ी जीवन का अनुभव लेने की संभावनाओं पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

    आस्था और विरासत की अपनी कहानी :- धार्मिक पर्यटन इस पूरे क्षेत्र की मजबूत नींव बन सकता है। बिल्वेश्वर मंदिर, हनुमान शिला और सुकराला देवी मंदिर पहले से ही लोगों की आस्था से जुड़े हुए हैं। इनके साथ सच्चाई देवता तक की पैदल यात्रा और बदनोटा के 14 मंदिर धार्मिक यात्रा को प्रकृति और पहाड़ी अनुभव से जोड़ सकते हैं। जरूरत है तो केवल इन्हें एक-दूसरे से जोड़कर देखने की। जहां आवश्यक हो वहां जानकारी पट्ट, मार्ग-संकेतक, पैदल रास्तों की पहचान, छोटे विश्राम स्थल और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे धार्मिक स्थलों की यात्रा अपने आप में एक व्यवस्थित आस्था एवं विरासत मार्ग का रूप ले सकती है। यहां तीर्थ और रोमांच अलग-अलग चीजें नहीं हैं। एक ही यात्रा में मंदिर के दर्शन भी हो सकते हैं और उसके बाद पहाड़ी पगडंडी पर पैदल चलने का अनुभव भी।

    स्थानीय जीवन ही सबसे बड़ी पहचान बन सकता है

    आज का पर्यटक केवल किसी स्थान को देखकर वापस लौटना नहीं चाहता। वह यह भी जानना चाहता है कि वहां के लोग कैसे रहते हैं, क्या खाते हैं, उनकी परंपराएं क्या हैं और गांव का वास्तविक जीवन कैसा है। मच्छेड़ी–बदनोटा–लोहाई-मल्हार इस दृष्टि से काफी समृद्ध क्षेत्र है। यहां के पहाड़ी समुदायों की भाषा, परंपराएं, रहन-सहन और सादगी इस क्षेत्र को अपनी अलग पहचान देती हैं। रास्ते में दिखाई देने वाले अलग-अलग धार्मिक स्थल यहां के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की विविधता को भी सामने लाते हैं। पारंपरिक छिंज इसका एक अच्छा उदाहरण है। गर्मियों और सर्दियों से पहले होने वाली इन कुश्ती प्रतियोगिताओं में स्थानीय पहलवान हिस्सा लेते हैं और आसपास के गांवों से लोग इन्हें देखने पहुंचते हैं।

    बाहर से आने वाले व्यक्ति के लिए छिंज केवल कुश्ती प्रतियोगिता नहीं होगी। वह स्थानीय समाज को करीब से देखने, लोगों से मिलने और पहाड़ी जीवन की उस परंपरा को समझने का अवसर भी हो सकती है जो आज भी गांवों में जीवित है।

    घरों में ठहरना, घर का खाना खाना :- इस क्षेत्र में स्थानीय परिवारों के घरों में ठहरने की व्यवस्था को पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सकता है। किसी स्थानीय परिवार के घर में ठहरना पर्यटक के लिए सिर्फ रात गुजारने की व्यवस्था नहीं होगी। उसे गांव का वातावरण, परिवार का आतिथ्य, स्थानीय भोजन और आसपास के जीवन को करीब से देखने का मौका मिलेगा। स्थानीय अनाज, मौसमी सब्जियां, पहाड़ी फल और पीढ़ियों से बनते आ रहे पारंपरिक व्यंजन इस अनुभव की खास पहचान बन सकते हैं। इसका लाभ केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा। स्थानीय परिवारों को अतिरिक्त आय मिलेगी, किसानों के उत्पादों के लिए स्थानीय बाजार तैयार होगा और युवाओं के लिए मार्गदर्शक, वाहन चालक तथा अन्य छोटी सेवाओं के अवसर पैदा होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे पर्यटन की कमाई गांव के भीतर रह सकती है।
    यहां बड़े होटल बनाने की बजाय स्थानीय परिवारों को पर्यटन से जोड़ना अधिक स्वाभाविक और क्षेत्र की संस्कृति के अनुकूल मॉडल हो सकता है।

    डल बजोहई से प्राकृतिक दृश्य-बिंदुओं तक नानगला से संपर्क मार्ग डल बजोहई पंचायत की ओर जाता है। यहां स्थित डल झील क्षेत्र के संभावित प्राकृतिक आकर्षणों में शामिल है। शांत वातावरण और आसपास का ग्रामीण-पहाड़ी दृश्य इसे प्रकृति और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ने का अवसर देता है। मच्छेड़ी स्वयं भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है। यहां भोजन और जलपान की सुविधाएं हैं, कुछ समतल क्षेत्र हैं और ऐतिहासिक मच्छेड़ी दंगल मैदान स्थानीय पहचान का हिस्सा है। रास्ते में मिलने वाली पारंपरिक बावलियां भी इस क्षेत्र की पुरानी जीवनशैली और जल-संस्कृति की याद दिलाती हैं। क्षेत्र में पर्यटन की बुनियादी संभावनाओं पर काम पहले से शुरू हो चुका है। ग्रामीण विकास विभाग ने कुछ स्थानों पर प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए दृश्य-बिंदु विकसित किए हैं। इन्हें बैठने की व्यवस्था, स्वच्छता, जानकारी पट्ट, सुरक्षित पहुंच और उचित मार्ग-संकेतकों से जोड़कर उपयोगी पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जा सकता है।

    रासोंत से स्थानीय उद्योग तक :- पर्यटन के साथ-साथ क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार बनाने की भी संभावना है। रासोंत, जिसे दारू हल्दी भी कहा जाता है, इस क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है और इसका पारंपरिक तथा औषधीय महत्व माना जाता है। इसकी वैज्ञानिक पहचान, टिकाऊ संग्रहण अथवा खेती, गुणवत्ता नियंत्रण और उपयोगिता पर व्यवस्थित काम किया जा सकता है। यदि इसकी संग्रहण प्रक्रिया के साथ प्राथमिक प्रसंस्करण, निष्कर्षण और पैकेजिंग जैसी गतिविधियां भी स्थानीय स्तर पर विकसित हों तो कच्चे माल को बाहर भेजने के बजाय उसी क्षेत्र में अधिक मूल्य पैदा किया जा सकता है। यह काम स्थानीय युवाओं और छोटे उद्यमों के लिए भी अवसर पैदा कर सकता है।

    बागवानी: पहाड़ों की दूसरी बड़ी संभावना :- पर्यटन के बाद इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी आर्थिक संभावना बागवानी हो सकती है।
    लोहाई-मल्हार के ऊंचे और ठंडे क्षेत्रों में उच्च घनत्व वाली सेब की बागवानी, गुणवत्तापूर्ण अखरोट, बादाम और लैवेंडर की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है। इसके लिए मिट्टी, ऊंचाई, पानी की उपलब्धता और स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखकर उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान जरूरी होगी। वृहद बनी क्षेत्र में किसानों द्वारा उच्च घनत्व वाली सेब की बागवानी के प्रयोग इस दिशा में उम्मीद पैदा करते हैं। सीमित भूमि में अधिक उत्पादन और बेहतर बाजार मूल्य की संभावना पहाड़ी किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन केवल पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। अच्छी पौध सामग्री, तकनीकी मार्गदर्शन, सिंचाई जहां संभव हो, बाग प्रबंधन, रोग नियंत्रण, फल की ग्रेडिंग, भंडारण, पैकेजिंग और बाजार से सीधा जुड़ाव भी उतना ही जरूरी है। अखरोट के मामले में भी केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा। बेहतर फसल उपरांत प्रबंधन, सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और स्थानीय पहचान से इसके मूल्य में वृद्धि की जा सकती है। होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (HADP) जैसी पहलें किसानों को आधुनिक और विविधतापूर्ण बागवानी की दिशा में आगे बढ़ने का आधार दे सकती हैं।

    लैवेंडर और बैंगनी क्रांति :-  लैवेंडर इस क्षेत्र के लिए एक और संभावित विकल्प है। लोहाई-मल्हार के उपयुक्त ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले वैज्ञानिक परीक्षण और प्रदर्शन खेत विकसित किए जा सकते हैं। सफलता मिलने पर इसका विस्तार किया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर में बैंगनी क्रांति और मिशन अरोमा, विशेषकर डोडा क्षेत्र में, इस दिशा में एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। हिमाचल प्रदेश के कई पहाड़ी क्षेत्रों ने भी दिखाया है कि स्थानीय जलवायु के अनुकूल फसलों का चयन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए रास्ते खोल सकता है। लैवेंडर को केवल खेती तक सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। यदि उत्पादन सफल होता है तो फूलों के मौसम में खेतों को पर्यटकों के लिए खोलना, स्थानीय सुगंधित उत्पाद तैयार करना और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकता है।

    एक अलग तरह का पर्यटन मॉडल :- मच्छेड़ी–बदनोटा–लोहाई-मल्हार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे किसी एक आकर्षण पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। बिलावर और सुकराला की धार्मिक विरासत, सच्चाई देवता की पैदल यात्रा, मच्छेड़ी का स्थानीय जीवन, बदनोटा के मंदिर और झरने, डल बजोहई और डल झील, लोहाई की शांत पहाड़ियां, मल्हार और कटली की ओर बढ़ता संपर्क मार्ग, सर्दियों की बर्फबारी और गांवों की संस्कृति—ये सभी मिलकर एक ऐसा पर्यटन मार्ग बना सकते हैं जो दूसरे लोकप्रिय पहाड़ी स्थलों से अलग हो। सरकार, जनप्रतिनिधि और प्रशासन क्षेत्र में संपर्क मार्गों तथा बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के प्रयास कर रहे हैं। बिलावर–किशनपुर–कटली–नालोटू–नेल्हेऊ–मल्हार मार्ग और क्षेत्र में बनाए जा रहे पर्यटक विश्राम गृह इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

    अब आवश्यकता इन प्रयासों को एक स्पष्ट और समन्वित पर्यटन योजना से जोड़ने की है। पैदल मार्गों की पहचान, मार्ग-संकेतक, प्राकृतिक दृश्य-बिंदु, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, स्थानीय मार्गदर्शक, ग्रामीण घरों में ठहरने की व्यवस्था, सुरक्षित पार्किंग और उचित प्रचार—इन सबको एक साथ विकसित करने की जरूरत होगी। लेकिन इस क्षेत्र को किसी दूसरे भीड़भाड़ वाले पहाड़ी पर्यटन स्थल की नकल बनने की जरूरत नहीं है। इसकी असली ताकत इसकी शांति, स्थानीयता और प्राकृतिक विविधता में है। सुबह पहाड़ी सड़क पर मोटरसाइकिल यात्रा, दिन में किसी मंदिर या झरने तक पैदल जाना, दोपहर में स्थानीय भोजन, शाम को किसी गांव के घर में ठहरना और अगले दिन बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच एक नई यात्रा—यही वह अनुभव है जो मच्छेड़ी–बदनोटा–लोहाई-मल्हार को अपनी अलग पहचान दे सकता है।

    और इसी पर्यटन के साथ सेब, अखरोट, लैवेंडर और अन्य उपयुक्त बागवानी फसलों तथा रासोंत जैसे स्थानीय संसाधनों पर आधारित छोटे उद्यम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। कुछ स्थान दशकों से प्रसिद्ध होते हैं। कुछ स्थान तब प्रसिद्ध होते हैं जब उनकी संभावनाओं को पहचानकर उन पर काम शुरू किया जाता है। मच्छेड़ी–बदनोटा–लोहाई-मल्हार शायद उन्हीं जगहों में से एक है। यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर को केवल एक और पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा मॉडल दे सकता है जहां पर्यटन, बागवानी, स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण उद्यम एक साथ आगे बढ़ें।

    शायद जम्मू को अपने अगले सप्ताहांत के गंतव्य की तलाश में हमेशा जम्मू-कश्मीर से बाहर देखने की जरूरत नहीं है। -संजीव कुमार शर्मा
     

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