सनातन विरोध की राजनीति पर जनता का लोकतांत्रिक प्रहार

Edited By Updated: 19 May, 2026 05:13 AM

people s democratic attack on the politics of anti sanatan

सोचिए उस माली की मूर्खता को, जो उस वृक्ष की जड़ें काटने निकलता है, जिसकी छांव में वह स्वयं पला-बढ़ा हो। भारत की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। एक तरफ वह सनातन, जो हजारों वर्षों की तपस्या, त्याग और ज्ञान की नींव पर...

सोचिए उस माली की मूर्खता को, जो उस वृक्ष की जड़ें काटने निकलता है, जिसकी छांव में वह स्वयं पला-बढ़ा हो। भारत की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। एक तरफ वह सनातन, जो हजारों वर्षों की तपस्या, त्याग और ज्ञान की नींव पर खड़ा है, जो इस देश की सांसों में रचा-बसा है और दूसरी तरफ कुछ ऐसे राजनेता, जिन्होंने वोट की भूख में अंधे होकर इसी सनातन को अपशब्द कहना, हिंदू आस्था को कोसना और भारत की आत्मा को ललकारना अपनी राजनीति का हथियार बना लिया। उन्हें लगा, हिंदू समाज बिखरा हुआ है, आस्था को रौंदते रहो, कोई प्रतिकार नहीं होगा। लेकिन यह देश गीता की भूमि है। यहां लिखा है-‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥’ जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब एक शक्ति जागती है। इस बार वह शक्ति किसी रणक्षेत्र में नहीं, मतपेटी में जागी और जनता ने वह जवाब दिया, जिसकी इन नेताओं ने कल्पना भी नहीं की थी।

सबसे बड़ा उदाहरण तमिलनाडु की राजनीति से सामने आया, जहां द्रमुक नेताओं ने खुले मंचों से सनातन धर्म को ‘डेंगू और मलेरिया’ जैसी बीमारी तक कह दिया। द्रमुक के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता ए. राजा ने इससे भी आगे बढ़कर सनातन की तुलना ‘एच.आई.वी.’ और ‘कुष्ठ रोग’ जैसी बीमारियों से कर दी। द्रमुक के प्रवक्ता कॉन्स्टेंटाइन रवींद्रन ने सनातन धर्म को उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की ‘बुद्धि की कमी’ का कारण बता दिया और अब इस सनातन-विरोधी राजनीति में एक नया और चिंताजनक अध्याय जुड़ गया है। तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टी.वी.के. ने हाल ही में सरकार बनाई लेकिन सत्ता की कुर्सी गर्म होने से पहले ही इस दल के नेताओं ने सनातन के विरुद्ध अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया। 

टी.वी.के. के विधायक और तमिलनाडु मुस्लिम लीग के संस्थापक अध्यक्ष वी.एम.एस. मुस्तफा ने खुले मंच से घोषणा की, ‘सनातन को समाप्त करने के लिए ही हम रणक्षेत्र में उतरे हैं।’ जो पार्टी अभी-अभी जनता का विश्वास लेकर सत्ता में आई, उसके नेता पहले ही दिन से सनातन को मिटाने की भाषा बोलने लगें, यह तमिलनाडु की जनता के साथ विश्वासघात है और पूरे देश के लिए एक कड़ी चेतावनी। देश ने यह सब देखा और समझ लिया कि यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने की सुनियोजित मानसिकता है।

कम्युनिस्ट पार्टियों ने दशकों तक नास्तिकता के नाम पर सनातन परंपराओं का वैचारिक विरोध किया। इनके नेताओं और समर्थक बुद्धिजीवियों ने हिंदू रीति-रिवाजों, मंदिर परंपराओं और आध्यात्मिक आस्थाओं को बार-बार पिछड़ेपन, असमानता और सामाजिक उत्पीडऩ से जोडऩे का प्रयास किया। बिहार में रामचरितमानस जैसे पूजनीय ग्रंथ पर आर.जे.डी. से जुड़े नेताओं द्वारा अमर्यादित टिप्पणियां की गईं। यह केवल एक पुस्तक पर टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना पर हमला था, जो भारत को जोड़ती है। सत्ता के नशे में चूर नेताओं को लगा कि हिंदू समाज चुप रहेगा, लेकिन लोकतंत्र में जनता सब देखती है और समय आने पर जवाब भी देती है। समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी दलों से जुड़े कई नेताओं ने भी समय-समय पर हिंदू प्रतीकों और धार्मिक नारों पर सवाल उठाए। 

इस हिंदू-विरोधी नैरेटिव में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी पीछे नहीं रहा। राहुल गांधी ने विदेशी धरती पर जाकर भगवान राम को मात्र एक ‘पौराणिक पात्र’ बता दिया और करोड़ों हिंदुओं के 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को ‘नाच-गाना’ कहकर उसका भद्दा मजाक उड़ाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र ‘महाकुंभ’ में गंगा स्नान का उपहास उड़ाया और चुनावी रैलियों में भगवा वस्त्र धारण करने वाले संतों को राजनीति से बाहर निकलने की धमकी दी। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने भी सनातन को बीमारी बताया था। उत्तराखंड में कांग्रेस के एक नेता ने तो यहां तक कह दिया कि ‘कोरोना’ भगवान कृष्ण ने भेजा था। वहीं महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन के सहयोगी एन.सी.पी. नेता जितेंद्र आव्हाड ने रामनवमी और हनुमान जन्मोत्सव को ‘दंगे भड़काने वाले’ त्यौहार बताकर हिंदू पर्वों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

पश्चिम बंगाल में स्थिति और भी चिंताजनक रही। वहां रामभक्तों पर हमले हुए, धार्मिक जलूसों को रोका गया और हिंदू आस्था को बार-बार अपमानित करने की घटनाएं सामने आईं। टी.एम.सी. की सांसद महुआ मोइत्रा ने सार्वजनिक मंच से मां काली के स्वरूप को लेकर बेहद अपमानजनक और अमर्यादित टिप्पणियां कीं। रामचरितमानस की प्रतियां जलाने जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। इंडिया गठबंधन के घटक दलों का यह दु:स्साहस केरल तक भी पहुंचा, जहां कांग्रेस की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के यूथ विंग ने एक रैली में खुलेआम नारे लगाए कि ‘हिंदुओं को मंदिरों में फांसी पर लटका दिया जाएगा और जिंदा जला दिया जाएगा।’

पिछले 10 वर्षों में देश ने एक बड़ा बदलाव देखा है। जनता अब केवल जाति, क्षेत्र और तुष्टिकरण की राजनीति से प्रभावित नहीं होती, बल्कि यह भी देखती है कि कौन उसकी आस्था और संस्कृति का सम्मान करता है और कौन अपमान। इसिलिए जिन दलों और नेताओं ने सनातन के खिलाफ जहर उगला, उन्हें जनता ने लगातार लोकतांत्रिक रूप से सबक सिखाया और अपनी वोट की ताकत से सत्ता से बाहर कर दिया।-प्रेम शुक्ल(राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा) 

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