Edited By ,Updated: 02 Oct, 2026 04:14 AM

पंथक राजनीति में जब किसी गंभीर मामले को लेकर सवाल उठते हैं, तो असली कसौटी सिर्फ यह नहीं होती कि आरोप सही हैं या गलत, बल्कि सवाल यह भी होता है कि संस्थान उन सवालों का सामना कैसे करते हैं। अमरजीत सिंह चावला से जुड़े मामले में रूप कौर संधू की भूमिका ने...
पंथक राजनीति में जब किसी गंभीर मामले को लेकर सवाल उठते हैं, तो असली कसौटी सिर्फ यह नहीं होती कि आरोप सही हैं या गलत, बल्कि सवाल यह भी होता है कि संस्थान उन सवालों का सामना कैसे करते हैं। अमरजीत सिंह चावला से जुड़े मामले में रूप कौर संधू की भूमिका ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। रूप कौर संधू चावला मामले से जुड़ी महिला को मीडिया के सामने लाईं और दावा किया कि अन्य महिलाओं ने भी उनसे संपर्क करके पंथक और राजनीतिक हलकों से जुड़े कुछ व्यक्तियों के बारे में अपनी शिकायतें बताई हैं। उनका कहना था कि वे सबूतों के साथ ये मामले अकाल तख्त साहिब के समक्ष रखेंगी। इन दावों की सच्चाई का फैसला बिना जांच के नहीं किया जा सकता लेकिन इन्हें जांच के योग्य समझना और जांच करना दो अलग बातें नहीं हैं, यह संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा हैं।
इसके बाद शिरोमणि अकाली दल ने रूप कौर संधू की पार्टी की प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दी। पार्टी की ओर से इस कार्रवाई के लिए अनुशासनहीनता और दुव्र्यवहार को कारण बताया गया। रूप कौर ने दावा किया कि उन्हें अनुशासन समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और बाद में उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। ये दोनों पक्षों के दावे हैं और इनके बारे में अंतिम निर्णय तथ्यों की जांच के बिना नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा होता है। यदि कोई पार्टी सदस्य किसी गंभीर आरोप के बारे में सवाल उठाता है, तो क्या उसकी बात की जांच होनी चाहिए या पहले उसके सवालों को ही अनुशासन का मामला बना दिया जाना चाहिए? अनुशासन पार्टी के लिए जरूरी है लेकिन अनुशासन और सच की जांच को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
यह सवाल सिर्फ रूप कौर का नहीं, यह पूरे पंथक राजनीतिक ढांचे की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। यदि किसी के द्वारा गंभीर आरोप लगाया जाता है, तो उसे अपने आप सच नहीं माना जा सकता। लेकिन सिर्फ इसलिए कि आरोप किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर लगा है, उसे अपने आप झूठा भी नहीं माना जा सकता। दोनों स्थितियों में एक ही रास्ता है-निष्पक्ष और पारदर्शी जांच।
चावला मामले में एक और सवाल भी महत्वपूर्ण है कि एफ.आई.आर. में दर्ज अन्य नामों और घटना से संबंधित अन्य व्यक्तियों के बारे में क्या कार्रवाई हुई? यदि जांच कुछ खास व्यक्तियों तक सीमित रहती है और अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट नहीं की जाती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कानून में हर व्यक्ति की भूमिका सबूतों के आधार पर तय होनी चाहिए लेकिन पंथक संस्थानों के लिए यह और भी जरूरी है कि वे लोगों को यह भरोसा दें कि जांच किसी व्यक्ति के पद या प्रभाव के आधार पर नहीं हो रही। पिछले मामले इस संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुच्चा सिंह लंगाह के खिलाफ 2017 में बलात्कार का मामला दर्ज हुआ था लेकिन 2018 में गुरदासपुर की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इसलिए उन्हें उस मामले के आधार पर आज कानूनी तौर पर दोषी कहना ठीक नहीं है। लेकिन इस मामले ने पंथक राजनीति में यह सवाल जरूर छोड़ा कि गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों को राजनीतिक और धार्मिक संस्थान किन मानदंडों से देखें।
यही सवाल आज अकाली दल बादल के सामने बड़े रूप में खड़ा है। पार्टी के लिए मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप सही हैं या गलत। मुद्दा यह भी है कि पार्टी अपनी आंतरिक जवाबदेही का मानदंड क्या बनाती है। यदि एक मामले में तुरंत कार्रवाई हो और दूसरे मामले में लंबे समय तक चुप्पी रहे, तो पार्टी की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह स्थिति अकाली दल की बड़ी पंथक चुनौती से भी जुड़ती है। अकाली दल की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा आधार उसकी पंथक पहचान रही है। इसलिए आम राजनीतिक पार्टी की तुलना में उसके नेताओं से आचरण और नैतिक जवाबदेही की उम्मीद भी अलग रहती है। जब पार्टी के नेताओं या पंथक संस्थानों से जुड़े व्यक्तियों के नाम गंभीर विवादों में आते हैं, तो इसका प्रभाव व्यक्ति से आगे बढ़कर पार्टी की साख पर पड़ता है।
आगामी 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके चुनावी नतीजे पहले से बताना संभव नहीं लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि विपक्षी पार्टियां ऐसे मामलों को अकाली दल की पंथक और नैतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। पंथक मतदाताओं के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है कि पार्टी अपने नेताओं के लिए कौन से मानदंड तय करती है और उन्हें कितनी निरंतरता के साथ लागू करती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। यदि अकाली दल ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच, प्राकृतिक न्याय और बिना पक्षपात के जवाबदेही की प्रक्रिया को मजबूत करता है, तो वह अपनी संस्थागत विश्वसनीयता के बारे में एक अलग संदेश दे सकता है। पार्टी के लिए चुनौती यह नहीं होनी चाहिए कि वह हर आरोप को सच मान ले या हर आरोप को साजिश कहकर खारिज कर दे। चुनौती यह होनी चाहिए कि सच और झूठ में फर्क करने के लिए एक विश्वसनीय प्रक्रिया बनाई जाए। इसीलिए रूप कौर संधू का मामला सिर्फ एक व्यक्ति के पार्टी में रहने या न रहने का मामला नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि पंथक राजनीति में सवाल पूछने वाले के लिए और सवालों के घेरे में आने वालों के लिए एक जैसे संस्थागत मानदंड हैं या नहीं।
अंत में बात किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विरोध की नहीं है। बात उस प्रणाली की है जिसमें आरोप लगाने वाले को भी न्याय मिले, आरोपों के घेरे में आने वाले को भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले और सच सामने लाने के लिए निष्पक्ष जांच हो। यदि पंथक राजनीति इस मानदंड को कायम रख सके, तो विवाद संस्थान को कमजोर करने की बजाय उसे और अधिक जवाबदेह बना सकते हैं। लेकिन यदि सवालों के जवाब देने के स्थान पर सवाल पूछने वाले ही कटघरे में खड़े किए जाते रहे, तो भरोसे का संकट और गहरा होने का खतरा रहेगा।
यही आज अकाली दल बादल और पूरी पंथक राजनीति के लिए सबसे बड़ी कसौटी है-व्यक्ति नहीं, मानदंड बचने चाहिएं, पद नहीं, संस्थान की विश्वसनीयता सबसे ऊपर होनी चाहिए।-इकबाल सिंह चन्नी