सरकार को जंतर-मंतर छात्र आंदोलन से सबक लेना चाहिए

Edited By Updated: 20 Aug, 2026 04:15 AM

the govt should learn a lesson from jantar mantar student protest

दिल्ली पुलिस ने इस बात से इंकार किया है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) के नेतृत्व वाले मार्च के दौरान अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया था। पुलिस का कहना है कि उसके अधिकारियों ने बल का...

दिल्ली पुलिस ने इस बात से इंकार किया है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) के नेतृत्व वाले मार्च के दौरान अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया था। पुलिस का कहना है कि उसके अधिकारियों ने बल का प्रयोग केवल तभी किया, जब प्रदर्शनकारियों ने ‘हिंसा का सहारा लेना शुरू कर दिया’। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में, दिल्ली पुलिस ने यह भी दावा किया है कि 20 जुलाई को संसद तक मार्च के दौरान सादे कपड़ों में पुलिस कर्मियों को ‘भीड़-नियंत्रण उपाय’ के रूप में और ‘विरोध प्रदर्शन में परेशान किए जा रहे किसी भी व्यक्ति की मदद करने’ के लिए तैनात किया गया था।

दुर्भाग्य से पुलिस के लिए, विरोध स्थल की परिस्थितियां अतीत के ऐसे विरोध प्रदर्शनों से बिल्कुल अलग थीं, जिसका एक महत्वपूर्ण कारण था। जहां अतीत में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों में बमुश्किल एक दर्जन कैमरे होते थे, जिनमें से अधिकांश समाचार फोटोग्राफरों के होते थे, जो ‘कार्रवाई’ का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही कैद कर पाते थे और वह भी पुलिस कर्मियों के पीछे से, वहीं इस बार के विरोध प्रदर्शन को हजारों (मोबाइल) कैमरों द्वारा कैद किया गया और वह भी ‘रणक्षेत्र’ के अंदर से। इसने कार्रवाई को लगभग सभी कोणों से कवर करने में मदद की। इंटरनैट पर उपलब्ध सैंकड़ों वीडियो और तस्वीरें पुलिस की ज्यादतियों को दर्शाती हैं, जिनमें महिलाओं का यौन उत्पीडऩ और उन छात्रों का पीछा करना और पीटना शामिल है, जो या तो भाग रहे थे या ङ्क्षहसा की किसी भी कार्रवाई में शामिल नहीं थे। यह भी एक तथ्य है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने भी पुलिस कर्मियों को मारा, जिससे उनमें से 200 से अधिक को मामूली चोटें आईं, जो समान रूप से निंदनीय है।

पुलिस अब इस दावे के साथ भी सामने आई है कि कोई पैलेट गन नहीं चलाई गई थी, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने उनके दावों का समर्थन किया है, हालांकि इसके विपरीत साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। यह दलील भी अब सामने आई है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले छात्र विरोध स्थल पर घुस गए थे और पुलिस ने आग्रह किया है कि ऐसे तत्वों के खिलाफ दर्ज 2500 से अधिक प्राथमिकियां (एफ.आई.आर.) वापस नहीं ली जानी चाहिएं।

विडंबना यह है कि जिस दिन अखबारों में इस दलील की खबर छपी, उसी दिन एक और रिपोर्ट आई, जिसमें बताया गया कि सरकार ने एक अन्य मामले के जवाब में सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि 28 राज्यों में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर वर्तमान में आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी शामिल हैं, अकेले जिन पर ऐसे 29 मामले चल रहे हैं। कुल मिलाकर देश भर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4192 आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 514 मामले एक दशक से लंबित हैं। विरोध प्रदर्शन को संभालने में अक्षमता स्पष्ट रूप से सरकार और पुलिस द्वारा निर्णय लेने में हुई एक चूक थी। सरकार ने, जैसा कि उसकी आदत है, प्रदर्शन स्थल पर छात्रों की संख्या बढऩे के बावजूद उनसे संपर्क नहीं किया। उन्हें थका देने की उसकी रणनीति विफल रही। बढ़ता असंतोष हताशा पैदा कर रहा था, जो किसी भी समय भड़क सकता था। किसी भी सक्षम खुफिया एजैंसी को इसका अंदाजा होना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की ज्यादतियों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन करके अच्छा काम किया है और सरकार से उन एफ.आई.आर. की सूची सौंपने को कहा है, जिनमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल हैं। हालांकि, सरकार इस मुद्दे पर टालमटोल कर रही है। इसके परिणामस्वरूप छात्र नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई है, जिन्होंने दावा किया है कि सरकार अपने आश्वासन से पीछे हट रही है और उन्होंने आंदोलन फिर से शुरू करने की चेतावनी दी है।

सरकार को इन घटनाक्रमों पर बहुत बारीकी से ध्यान देना और अपने आश्वासनों को पूरा करना चाहिए। साथ ही, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इंटरनैट पर महिला प्रदर्शनकारियों की डॉकिं्सग या ट्रोङ्क्षलग से सख्ती से निपटा जाए। उसे सबक लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि युवा अपना आंदोलन फिर से शुरू करने के लिए मजबूर न हों। हताशा और गुस्सा अब जेन अल्फा, या 2010 के बाद पैदा हुए लोगों तक पहुंच गया है। यह देश भर के विभिन्न राज्यों में स्कूली छात्रों द्वारा बुनियादी सुविधाओं की कमी के खिलाफ किए जा रहे असंख्य और तात्कालिक विरोध प्रदर्शनों से स्पष्ट है।-विपिन पब्बी
 

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