Edited By Niyati Bhandari,Updated: 20 Aug, 2026 01:01 PM

Rakhi Muhurat, Sutak Kaal: रक्षाबंधन 2026 पर चंद्र ग्रहण का साया होने से क्या राखी बांधने का समय बदल जाएगा? जानें भारत में सूतक काल की मान्यता और ग्रहण के बाद शुद्धि के जरूरी नियम।
Chandra Grahan on Raksha Bandhan: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर इस बार चंद्र ग्रहण का साया मंडरा रहा है। ऐसे में भाई-बहन के इस अटूट प्रेम के त्योहार पर राखी बांधने की विधि और समय को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के समय नकारात्मक ऊर्जा बढ़ने के कारण शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। आइए जानते हैं कि इस ग्रहण का रक्षाबंधन पर क्या प्रभाव पड़ेगा और राखी बांधने का सही नियम क्या है।

वर्ष 2026 में 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व है। जो हर साल सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस साल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व शुभता नहीं बल्कि अपने साथ लेकर आ रहा है ग्रहण का काला साया। इस रोज वर्ष 2026 का अंतिम चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। जब भी कोई कार्य शुभ समय में किया जाता है, तो उस कार्य की शुभता में बढ़ौतरी होती है। भाई-बहन के रिश्ते को अटूट बनाने के लिए राखी बांधने का कार्य शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। ग्रहण के कारण क्या राखी बांधने के शुभ मुहूर्त में आएगी कोई बाधा? सूतक काल मान्य होगा या नहीं?
चंद्र ग्रहण की तारीख और समय
2026 का दूसरा चंद्र ग्रहण 27 और 28 अगस्त की रात को लगेगा। वैश्विक समय के अनुसार ग्रहण 01:23 पर शुरू होगा। इसका सबसे शानदार दृश्य 04:41 पर दिखेगा। ग्रहण की समाप्ति 07:02 पर होगी। भारत में समयानुसार ग्रहण सुबह 06:53 से दोपहर 12:32 बजे तक रहेगा।
भारत में नहीं दिखाई देगा
हालांकि यह चंद्र ग्रहण आकाश में एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करेगा, लेकिन भारत में इसे देखा नहीं जा सकेगा। इसका कारण यह है कि ग्रहण के समय भारत में दिन होगा और सूरज की रोशनी चांद को ढक देगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देता, तो उसका सूतक काल भी लागू नहीं होता।

सूतक काल और राखी का मुहूर्त
धार्मिक नियमों के अनुसार, सूतक काल केवल वहीं प्रभावी होता है जहां ग्रहण दिखाई देता है। चूंकि यह ग्रहण प्रशांत महासागर, अटलांटिक, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के कुछ हिस्सों में ही नजर आएगा, इसलिए भारत में सूतक काल मान्य नहीं होगा।
इसका अर्थ यह है कि 28 अगस्त को रक्षाबंधन के पर्व पर ग्रहण का कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। बहनें हमेशा की तरह शुभ मुहूर्त देखकर अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकेंगी।
ग्रहण के बाद शुद्धि और स्नान-दान
ग्रहण समाप्त होने के बाद सबसे पहले पूरे घर और मंदिर की शुद्धि की जाती है। पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव किया जाता है और देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्नान कराया जाता है। इसके बाद स्वयं स्नान करके और दान-पुण्य करने के बाद ही शुभ मुहूर्त में भाई को रक्षासूत्र बांधा जाता है।
शास्त्रों के इन नियमों का सही तरीके से पालन करने से पूजन का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भाई-बहन दोनों के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

राखी बांधने के नियम
जिस जगह आप राखी बांधते हैं, वहां स्वच्छता और सात्विकता होना आवश्यक है। लकड़ी के पाट या चौकी पर पीला या सफेद कपड़ा बिछाएं। इसके ऊपर भाई को बिठाएं। अगर घर में तुलसी का पौधा या पूजा स्थान हो तो उसके समीप राखी बांधना बहुत शुभ होता है।
वास्तु के अनुसार रक्षा सूत्र बांधने से पहले बहन को उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। भाई को बहन के ठीक सामने यानी दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। उत्तर-पूर्व दिशा को दैवीय ऊर्जा का स्थान माना गया है। यहां से सकारात्मक तरंगें आती हैं, जो पूजा-पाठ और शुभ संस्कारों के लिए सर्वोत्तम मानी जाती हैं। भाई का मुख पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम की ओर होने से उसे संरक्षण और स्थिरता प्राप्त होती है। जो रक्षा बंधन के भावार्थ से मेल खाता है।
