Edited By ,Updated: 03 Jan, 2026 05:59 AM

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के साथ ‘जी राम जी’ या ‘विकसित भारत रोजगार गारंटी आजीविका मिशन ग्रामीण कार्यक्रम’ कानून का रूप लेकर लागू हो चुका है। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। इस तरह...
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के साथ ‘जी राम जी’ या ‘विकसित भारत रोजगार गारंटी आजीविका मिशन ग्रामीण कार्यक्रम’ कानून का रूप लेकर लागू हो चुका है। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगी, तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध भी होगा। सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार में 2005 में नैशनल रूरल एम्प्लॉयमैंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया गया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परम्परा न पहले थी और न आगे स्थापित हो सकती है।
देश, काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होती हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नई आरंभ भी होती हैं। विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यू.पी.ए. सरकार ने भी इसमें महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि यू.पी.ए. सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग से कोई विशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी, इसलिए पहले से जारी योजना में ही उनका नाम जोड़ दिया गया। विपक्ष की ओर भी उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है? क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम का नाम जोडऩे से सरकारी कार्यक्रमों का सैक्युलर चरित्र समाप्त होता है? व्यक्तिगत बातचीत में आपको ऐसा करने वाले भी मिल जाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि के सनातन और ङ्क्षहदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम-आप भली-भांति परिचित हैं।
नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव करने की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूॢत और भ्रष्टाचार के ऐसे कीॢतमान बनाए, जिनको किसी सूरत में रोक पाना मनरेगा के ढांचे में संभव नहीं हो पाया। इसके बाद इसके जारी रखने का कोई अर्थ नहीं था। केंद्र से लेकर राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एन.जी.ओ. के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूॢत हो रही है। किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ, उनमें आज अनेक मायनों में आमूल बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होने के समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आॢथक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023-24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज की गांव की स्थिति वैसी ही नहीं है। आज भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो उसमें गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिएं।
जी राम जी में 4 मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं। जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। इसमें बाढ़ और सुखे के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे भी शामिल हैं। आप देख सकते हैं कि जी राम जी का स्वरूप और संस्कार मनरेगा से बिल्कुल अलग है। इस कानून में ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। जैसा हम जानते हैं मिशन अमृत सरोवर के तहत 68,000 से ज्यादा जल निकाय बनाए गए हैं या पुनर्जीवित हुए हैं। इसमें खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। जाहिर है इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका अपने आप सुरक्षित होगी। इसी तरह सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।
सच कहें तो मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे, गुस्से में आ जाते थे। इस कारण जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी, वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई, कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं रही थी।
अब कम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन-परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप इससे परिवर्तित करने या इसमें संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगा।-अवधेश कुमार