Edited By ,Updated: 15 Mar, 2026 02:36 AM

ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को अमरीका और इसराईल द्वारा शुरू किए गए इस बिना सोचे-समझे युद्ध के नतीजे दुनिया भर में और बहुत दूर तक जाने वाले हैं। ‘ऑप्रेशन एपिक फ्यूरी’ के दो हफ्तों में, ईरान तबाह तो हो गया है लेकिन हारा नहीं है। युद्ध के पहले ही दिन,...
ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को अमरीका और इसराईल द्वारा शुरू किए गए इस बिना सोचे-समझे युद्ध के नतीजे दुनिया भर में और बहुत दूर तक जाने वाले हैं। ‘ऑप्रेशन एपिक फ्यूरी’ के दो हफ्तों में, ईरान तबाह तो हो गया है लेकिन हारा नहीं है। युद्ध के पहले ही दिन, अयातुल्ला खामेनेई समेत उसके शीर्ष नेतृत्व की पहली कतार खत्म हो गई थी। ईरान ने जल्दबाजी में एक नया नेता चुना है और एक नया सैन्य नेतृत्व तैयार किया है लेकिन अमरीका-इसराईल गठबंधन ने ऐलान कर दिया है कि उन्हें भी खत्म कर दिया जाएगा। तेहरान, सनंदाज, इस्फहान और ईरान के दूसरे बड़े शहरों पर बमबारी की गई है और अब तक लगभग 1300 ईरानी मारे गए हैं और 10,000 से ज्यादा घायल हुए हैं। एक अमरीकी टॉमहॉक मिसाइल एक स्कूल पर गिरी, जिसमें 168 बच्चे और 14 शिक्षक मारे गए। उन्होंने आखिर क्या गुनाह किया था?
जबरदस्त नुकसान : ईरान को हुए भारी नुकसान में ये चीजें शामिल हैं :
-सैन्य ठिकाने, जैसे मिसाइल लॉन्च साइटें, सशस्त्र बलों के अड्डे, नौसेना की संपत्तियां, हवाई सुरक्षा प्रणालियां, और उत्पादन केंद्र;
-घर, स्कूल और अस्पताल;
-बड़े तेल डिपो (जो अभी भी जल रहे हैं);
-ज़रूरी बुनियादी ढांचा, जैसे पानी की सप्लाई, विलवणीकरण संयंत्र, वगैरा;
-जन-स्वास्थ्य के लिए बड़े खतरे; और
-पर्यावरण को भारी नुकसान।
ईरान की शासन-प्रणाली के स्वरूप को, जो कि काफी दमनकारी है, एक तरफ रख दें और लोगों पर ध्यान दें। इस तबाही के हकदार बनने के लिए उन्होंने आखिर क्या किया है? इसराईल के उकसावे पर, अमरीका ने यह आरोप लगाया कि ईरान ने समृद्ध यूरेनियम का जखीरा जमा कर रखा है और परमाणु हथियार बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया है। स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर को कतर की मदद से, अमरीका की तरफ से ईरान के साथ बातचीत करने के लिए भेजा गया था। युद्ध शुरू होने की आशंका को देखते हुए, ओमान के विदेश मंत्री तुरंत वाशिंगटन पहुंचे और अमरीका को यह भरोसा दिलाया कि ईरान ‘समृद्ध यूरेनियम का जखीरा बिल्कुल न रखने’ पर राजी हो गया है और उसने ‘कभी भी परमाणु हथियार न रखने’ की कसम खाई है। इस भरोसे को नजरअंदाज करते हुए, राष्ट्रपति ट्रम्प ने अचानक बातचीत खत्म कर दी और ईरान पर हमला करने का आदेश दे दिया।
हो सकता है कि ईरान इसराईल के विस्तारवाद के लिए एक खतरा हो लेकिन वह अमरीका के लिए किसी भी तरह का खतरा नहीं है। जून 2025 में ऑप्रेशन मिडनाइट हैमर, जो एक गैर-कानूनी हमला था, के बाद, अमरीका ने दावा किया था कि ‘ईरान की यूरेनियम संवर्धन सुविधाएं पूरी तरह से नष्ट कर दी गई हैं’। मिडनाइट हैमर के बावजूद, अगर ईरान ने लगभग परमाणु हथियार बना ही लिए थे, तो वे कहां हैं? क्या अमरीका ने परमाणु निगरानी संस्था, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजैंसी से ईरान का निरीक्षण करने और परमाणु हथियारों के विकास पर रिपोर्ट देने के लिए कहा? किस देश के पास परमाणु हथियार होंगे या नहीं, यह तय करने का अमरीका के पास क्या अधिकार है? क्या अमरीका भारत, पाकिस्तान या उत्तर कोरिया की परमाणु क्षमताओं में दखल देने और उन्हें ‘नष्ट करने’ का फैसला करेगा?
खामोशी से मिलीभगत : पश्चिम एशियाई क्षेत्र में इसराईल के दुश्मन हैं। इसकी जड़ें उस समय से जुड़ी हैं, जब इसराईल का गठन उस जमीन पर हुआ था, जो मूल रूप से फिलिस्तीनियों की थी। फिर भी, पिछले कुछ सालों में, इस्लामी देशों सहित पूरी दुनिया ने इसराईल की वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है। हालांकि भारत ने फिलिस्तीन के विभाजन प्रस्ताव (1947) के खिलाफ वोट दिया था, लेकिन बाद में, सितम्बर 1950 में भारत ने इसराईल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी और 1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हो गए। व्यापार, सैन्य सहयोग और खुफिया जानकारी सांझी करने के क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध काफी फले-फूले हैं। पश्चिम एशिया के संघर्षों में भारत हमेशा से ही एक संतुलित और संयमित आवाज रहा है, कम से कम अब तक तो यही स्थिति थी।
लेकिन हाल के दिनों में, भारत का रुख कुछ हद तक पक्षपातपूर्ण हो गया है। इसका प्रमाण 12 मार्च, 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पारित उस प्रस्ताव के प्रति भारत का समर्थन है, जिसमें केवल ईरान की ङ्क्षनदा की गई थी। जब इसराईल के प्रधानमंत्री ने भारत, ग्रीस, साइप्रस, अरब देशों, अफ्रीकी देशों और भूमध्यसागरीय देशों को मिलाकर बने एक ‘षट्कोणीय गठबंधन’ का जिक्र किया, जिसका उद्देश्य ‘कट्टरपंथी शिया गठबंधन और उभरते हुए कट्टरपंथी सुन्नी गठबंधन’ का मुकाबला करना था, तब भारत ने इस पर विरोध का एक भी शब्द नहीं कहा।
ट्रम्प की मनमानी की वजह से, तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई हैं। अमरीका में महंगाई और ट्रम्प प्रशासन के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही, जो ईरान के नियंत्रण में है, लगभग पूरी तरह से रुक गई है। भारत में, एल.पी.जी. सिलैंडर की कमी हो गई है और उनकी कीमतें तेजी से बढ़ाई गई हैं। दुनिया भर के शेयर बाजार धड़ाम से गिर गए हैं। अनुमान है कि इस युद्ध पर हर दिन 2 अरब डॉलर खर्च हो रहे हैं। इस युद्ध की मानवीय कीमत का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
युद्ध हर किसी को बेनकाब कर देता है : मशहूर सैनिक, जनरल ड्वाइट आइजनहावर ने कहा था कि युद्ध क्रूर, बेकार और बेवकूफी भरा होता है। रूस ने 4 साल पहले यूक्रेन पर हमला किया था, लेकिन वह यह युद्ध जीत नहीं पा रहा। इस बीच, रूस पर कर्ज का बोझ बहुत बढ़ गया है, तेल से होने वाली कमाई घट गई है और रूसी सेना को अब भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। ईरान के मामले में, ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा कि अमरीका इस युद्ध को रोकने वाला है। चूंकि यह युद्ध मशीनों के जरिए लड़ा जा रहा है, इसलिए जब तक मशीनों की सप्लाई जारी रहेगी, अमरीका इस युद्ध को जारी रख सकता है। जब कोई देश युद्ध शुरू करता है, तो उसे यह भी पता होना चाहिए कि उसे कब रोकना है। युद्ध हर देश और हर इंसान का असली चेहरा सामने ला देता है। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो भारत ने उसकी ङ्क्षनदा नहीं की, बल्कि यह कहा कि ‘यह युद्ध का दौर नहीं है।’ जब अमरीका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण किया था, तब इस तरह की नसीहतें नदारद थीं। पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा युद्ध में भी ये बातें साफ तौर पर गायब हैं।-पी. चिदम्बरम