Edited By ,Updated: 16 Feb, 2026 04:07 AM

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले धर्म ध्वजा फहराने की कवायद तेज हो गई है। आर.एस.एस. के सौ साल पूरा होने के अवसर पर राज्य भर में होने वाले ङ्क्षहदू सम्मेलन को भाजपा ङ्क्षहदू मतदाताओं को एकजुट करने के विशेष अवसर और चुनाव अभियान की तरह...
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले धर्म ध्वजा फहराने की कवायद तेज हो गई है। आर.एस.एस. के सौ साल पूरा होने के अवसर पर राज्य भर में होने वाले ङ्क्षहदू सम्मेलन को भाजपा हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के विशेष अवसर और चुनाव अभियान की तरह इस्तेमाल कर रही है। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदुत्व के मोर्चे को भाजपा के लिए खुला नहीं छोड़ा है। पिछले दिसम्बर में कोलकाता के न्यू टाऊन में विशाल ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास करके उन्होंने हिंदू मतदाताओं को भाजपा के खेमे में खिसकने से रोकने की जो बड़ी पहल शुरू की थी, उसे बंगाली अस्मिता से जोडऩे के अभियान पर लगातार आगे बढ़ा रही हैं।
तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ का शिलान्यास करके ममता के सामने एक नई चुनौती जरूर खड़ी कर दी है और भाजपा इसे भी भुनाने की कोशिश में जुट गई है। बंगाल की राजनीति में इस समय कई सवाल गूंज रहे हैं। क्या हिंदू सम्मेलन और हुमायूं कबीर के बहाने भाजपा राज्य के 70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं को ममता के खिलाफ खड़ा कर पाएगी? क्या हुमायूं कबीर और अन्य मुस्लिम पाॢटयां मुस्लिम मतदाताओं को बांटने में सफल हो पाएंगी? या फिर अल्पसंख्यकों की रक्षा और दुर्गा आंगन की मशाल लेकर ममता एक बार फिर से जीत का झंडा फहराने में सफल होंगी?
ममता को चुनौती : ममता इस समय कई मोर्चों पर जूझ रही हैं। एस.आई.आर. यानी विशेष मतदाता सूची सर्वेक्षण में मुसलमानों और अत्यंत गरीब लोगों का नाम कटने के मुद्दे पर उनके कार्यकत्र्ता बूथ स्तर पर लड़ रहे हैं और वह खुद सुप्रीम कोर्ट तक हाजिरी लगा चुकी हैं। बिहार, जहां एस.आई.आर. की शुरुआत हुई या फिर अन्य राज्य, जहां यह प्रक्रिया अभी चल रही है, वहां बंगाल जैसी जुझारू लड़ाई दिखाई नहीं दे रही। भाजपा का अभियान चार मुद्दों पर केंद्रित है। ‘बंगाल में हिंदू खतरे में है’, भाजपा का मुख्य अभियान इसी नारे पर केंद्रित है। बंगाली हिंदुओं को बताया जा रहा है कि मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है।
बंगलादेश की सीमा से लगे कुछ जिलों, जहां मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या ज्यादा है, का उदाहरण देकर बताया जा रहा है कि बंगाली हिंदू जल्दी ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे। बंगलादेश से अवैध घुसपैठ का शोर मचाकर हिंदुओं की चिंता बढ़ाने की कोशिश हो रही है। आर.जी. कार मैडीकल कालेज में एक डॉक्टर से बलात्कार का उदाहरण देकर बताया जा रहा है कि बंगाल में महिलाएं असुरक्षित हैं। चौथा मुद्दा भ्रष्टाचार का है। शिक्षक भर्ती घोटाला जैसे मामले इसके उदाहरण के रूप में पेश किए जा रहे हैं। ममता सी.बी.आई. और ई.डी. जैसी केंद्र सरकार की एजैंसियों से सीधे टक्कर ले रही हैं।
क्या मुस्लिम वोट बंटेगा : चुनाव में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बन जाए तो भाजपा फायदे में रह सकती है। लेकिन ममता आसानी से ऐसा होने देने के मूड में नहीं हैं। लेकिन उनके सामने मुस्लिम वोटों का बंटवारा एक बड़ी चुनौती है। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की पहल से मुस्लिम मतदाताओं के बीच हुमायूं कबीर की लोकप्रियता बढ़ी है। वैसे हुमायूं मुसलमानों के कोई प्रतिष्ठित नेता नहीं रहे हैं। पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने तृणमूल के टिकट पर जीता था। 2019 में वह भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ कर तीसरे नंबर पर रहे थे। टी.एम.सी. से निकाले जाने के बाद उन्होंने अलग जनता उन्नयन पार्टी (जे.यू.पी.) बना ली है और 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं।
एक अन्य मुस्लिम नेता नौशाद सिद्दीकी अपनी पार्टी इंडियन सैक्युलर फ्रंट (आई.एस.एफ.) को वाम दलों से समझौता करके चुनाव मैदान में उतारने की कोशिश में हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ए.आई.एम.आई.एम. इस बार सौ से ज्यादा सीटों पर दाव खेलने की तैयारी में है। इसके अलावा भी 5-6 मुस्लिम नेता छोटी-छोटी पाॢटयां बनाकर चुनाव मैदान में उतरने के लिए तैयार हैं। राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30 प्रतिशत है। पिछले चुनावों में ममता को मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा समर्थन मिला था। इसके बूते पर ही उनके पास आज 223 सीटें हैं।
भाजपा की 65 सीटों पर जीत भी एक बड़ी बात थी क्योंकि बंगाल में भाजपा कभी भी मजबूत पार्टी नहीं थी। 2021 में सी.पी.एम. और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया था। भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में 2, 2019 में 18 और 2024 में 12 सीटें मिली थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टी.एम.सी. को करीब 48 प्रतिशत और भाजपा को 38 प्रतिशत वोट मिला था। जाहिर है कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होने पर टी.एम.सी. की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए ममता अपना हिंदू कार्ड बहुत सावधानी से खेल रही हैं।
विकास पीछे छूटा : कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान, चौरंगी से वी.आई.पी. रोड होकर एयरपोर्ट की तरफ जाने वाले रास्ते में कई जगहों पर मैट्रो रेल का अधूरा काम दिखाई देता है। यह प्रोजैक्ट कई वर्षों से घिसट-घिसट कर चल रहा है। काम थोड़ा आगे बढ़ता है, फिर महीनों तक रुक जाता है। बंगाल में अधूरे विकास की कहानी लगभग हर जिले में दिखाई देती है। टाटा के नैनो कार प्रोजैक्ट को राज्य से बाहर खदेड़ कर 2011 में सत्ता में आईं ममता बनर्जी 15 सालों में राज्य के विकास को पटरी पर नहीं ला पाई हैं। रोजगार के लिए पलायन करने वाले राज्यों में बंगाल शीर्ष पर है। कई राज्यों में उन्हें बंगलादेशी बताकर लगातार अपमानित और उत्पीड़ित किया जाता है। राज्य में रोजगार बढ़ नहीं रहा क्योंकि विकास के लिए राज्य के पास पैसा नहीं है। ममता इसके लिए भी केंद्र को दोषी ठहराती हैं। उनका आरोप है कि केंद्र उन्हें विकास के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दे रहा।
पिछले साल 15 सालों में बंगाल की राजनीति में बहुत कुछ बदल गया है। करीब तीस वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद सी.पी.एम. और वामपंथी दल इस तरह हाशिए पर पहुंचे कि 2021 के चुनावों में उनका खाता भी नहीं खुला। वाम दलों से पहले करीब 25 सालों तक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस भी सिर्फ नाम के लिए बची है। भाजपा का उदय ममता के सत्ता में आने के बाद ही हुआ और सी.पी.एम. तथा कांग्रेस को पीछे धकेल कर राज्य में दूसरी बड़ी पार्टी बन गई। भाजपा इस बार बंगाल में राम का नाम नहीं ले रही। 2021 के चुनाव में ममता ने राम के मुकाबले में दुर्गा शक्ति को खड़ा कर दिया था। इस बार भाजपा का मुद्दा है बंगलादेशी घुसपैठिए और हिंदू के अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा। ममता, दुर्गा की मशाल थाम कर भी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, बंगाली अस्मिता और स्वाभिमान के सहारे आगे बढऩे की कोशिश में हैं।-शैलेश कुमार