‘सतलुज’ और इतिहास को याद रखने की जिम्मेदारी

Edited By Updated: 13 Jul, 2026 05:27 AM

the satluj and the responsibility to remember history

सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं होता, यह समाज की सांझी याद को भी गढ़ता है। एक प्रभावशाली फिल्म अक्सर इतिहास की किताबों से कहीं अधिक लोगों के मन में बस जाती है। इसलिए जब कोई फिल्म ऐसे दौर को दर्शाती है, जिसने हजारों परिवारों को असहनीय दर्द दिया हो,...

सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं होता, यह समाज की सांझी याद को भी गढ़ता है। एक प्रभावशाली फिल्म अक्सर इतिहास की किताबों से कहीं अधिक लोगों के मन में बस जाती है। इसलिए जब कोई फिल्म ऐसे दौर को दर्शाती है, जिसने हजारों परिवारों को असहनीय दर्द दिया हो, तो कलात्मक आजादी के साथ ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सतलुज’ इसी कारण चर्चा का विषय बनी है। फिल्म की तकनीकी गुणवत्ता, दृश्य प्रस्तुति और अभिनय की प्रशंसा हो सकती है लेकिन यह भी जरूरी है कि हम पूछें कि क्या यह पंजाब के आतंकवाद के दौर की पूरी तस्वीर दर्शाती है या सिर्फ उसका एक हिस्सा?

पंजाब ने 1980 और 1990 के दशकों में ऐसा खूनी दौर देखा, जिसने अनगिनत परिवारों की जिंदगी बदल दी। निर्दोष नागरिक, पुलिस कर्मी, सरकारी अधिकारी, पत्रकार, धार्मिक नेता और आम लोग इस ङ्क्षहसा का शिकार बने। गांवों और शहरों में डर का माहौल था। कई परिवारों ने अपने प्रियजन खो दिए और एक पूरी पीढ़ी ने असुरक्षा के साए में बचपन बिताया। इस हकीकत को किसी भी कलात्मक प्रस्तुति में केंद्रीय स्थान मिलनचाहिए। बेशक, हर फिल्म किसी व्यक्ति की कहानी के जरिए बड़े संघर्ष को दिखाती है। मानवीय पीड़ा, भावनाओं और नैतिक उलझनों को दर्शाना कला का हिस्सा है। लेकिन जब व्यक्तिगत दर्द को ऐतिहासिक संदर्भ से अलग कर दिया जाता है, तो दर्शकों के लिए सच्चाई का संतुलन बिगड़ सकता है। यह खतरा आज और भी बढ़ गया है। सोशल मीडिया के युग में फिल्मों के छोटे-छोटे दृश्य संदर्भ के बिना वायरल हो जाते हैं। एक भावनात्मक दृश्य कई बार पूरे इतिहास की जगह ले लेता है। इस तरह लोगों की धारणा अधूरी जानकारी के आधार पर बनने लगती है।

दुनिया भर में यह देखा गया है कि दृश्य माध्यम जनमत को प्रभावित करने का सबसे शक्तिशाली साधन बन चुका है। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं को पेश करते समय संतुलन और तथ्यों का पूरा पालन करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह नहीं कि राज्य की कार्रवाई या सुरक्षा एजैंसियों के बारे में कोई सवाल नहीं पूछे जाने चाहिएं। एक लोकतंत्र में हर नीति और हर कार्रवाई की समीक्षा होनी ही चाहिए। यदि कहीं गलतियां हुई हैं, तो उन पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आतंकवाद को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी भी समाज में निर्दोष लोगों की हत्या, डर का माहौल बनाना और हिंसा के जरिए राजनीतिक मकसद हासिल करने की कोशिश को इतिहास में रोमांचक या महिमामंडित रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। आज का पंजाब उस अंधेरे दौर से बाहर निकलकर विकास, मेहनत और अमन की राह पर आगे बढ़ रहा है। इस बदलाव का श्रेय पंजाब के उन लाखों लोगों को जाता है, जिन्होंने हिंसा को नकारा और शांति को चुना। उनकी कहानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी संघर्ष की कहानी।

सिनेमा का मकसद सोचने के लिए मजबूर करना है, भ्रम पैदा करना नहीं। एक अच्छी फिल्म मुश्किल सवाल पूछ सकती है लेकिन उसे इतिहास के मूल सच को धुंधला नहीं करना चाहिए। ‘सतलुज’ के बारे में चर्चा सिर्फ एक फिल्म की नहीं है। यह इस बात के बारे में है कि हम अपने इतिहास को कैसे याद रखते हैं और आने वाली पीढिय़ों तक कौन सी याद पहुंचाते हैं। क्योंकि जब याद अधूरी हो, तो इतिहास से सीखने की क्षमता भी अधूरी रह जाती है।-नवीन सूरी
 

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!