गंभीर भूजल संकट की आहट और बेफिक्री का आलम

Edited By Updated: 23 May, 2026 05:13 AM

the sound of a serious groundwater crisis and a state of carelessness

देश में जल भंडारों की स्थिति दिनों-दिन ङ्क्षचताजनक होने के साथ जबरदस्त दबाव में है। ऐसे अनगिनत क्षेत्र बढ़ते ही जा रहे हैं, जहां गर्मियों के दस्तक देते ही जबरदस्त जल संकट दिखने लगता है। केन्द्रीय जल आयोग की बीते महीने 30 अप्रैल को जारी रिपोर्ट और...

देश में जल भंडारों की स्थिति दिनों-दिन चिंताजनक होने के साथ जबरदस्त दबाव में है। ऐसे अनगिनत क्षेत्र बढ़ते ही जा रहे हैं, जहां गर्मियों के दस्तक देते ही जबरदस्त जल संकट दिखने लगता है। केन्द्रीय जल आयोग की बीते महीने 30 अप्रैल को जारी रिपोर्ट और चिंता बढ़ाती है।

166 प्रमुख जलाशयों में वर्तमान क्षमता घटकर महज 38.72 प्रतिशत रह गई है, जबकि इसी 9 अप्रैल को यह 44.71 प्रतिशत थी। इसी से भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर राज्यवार बात करें तो असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश और गोवा में जलाशयों का स्तर न केवल बीते वर्ष से, बल्कि सामान्य औसत से भी नीचे जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत में 36 जलाशय 40 प्रतिशत से कम भरे हैं। महज आंकड़ों से ही चिंता बहुत ज्यादा बढ़ती है क्योंकि असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में रिपोर्ट सामान्य से 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्शाती है। वहीं खांडोंग, चंदन, पेरियार, वैगई और कांगसबाती जैसे बड़े जलाशय अपनी क्षमता से 50 प्रतिशत से भी नीचे हैं। निश्चित रूप से इसका असर पेयजल पर तो पड़ेगा ही, साथ ही सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन परियोजनाएं भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं जो और होंगी।

इतना ही नहीं, देश की प्रमुख नदियों के बेसिन में भी अप्रैल की तुलना में पानी का स्तर घटना दूसरी बड़ी चिंता का सबब बना हुआ है। बेसिन वास्तव में पृथ्वी की सतह का वह भू-भाग होता है, जहां बारिश का पानी और पिघली हुई बर्फ बहकर एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों में मिल जाती है। सरल शब्दों में, यह एक बड़े कटोरे के समान वह पूरा क्षेत्र होता है, जिसका पानी एक ही जल प्रणाली से होकर गुजरता है। गंगा बेसिन 53.8 प्रतिशत से गिरकर लगभग 50.01 प्रतिशत, गोदावरी 47.58 प्रतिशत से घटकर 40.69 प्रतिशत और नर्मदा 46.09 प्रतिशत से 38.82 प्रतिशत की गिरावट पर पहुंच गया है। 

इस सारी स्थिति को एक ही नक्शे पर देखें तो समझ आता है कि भारत भर में मुख्य जलाशयों की कुल क्षमता 40 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। यह स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए काफी है। वहीं यदि जल आयोग की साप्ताहिक विज्ञप्तियां देखें तो स्थिति की नजाकत और समझ आती है। देश में 166 जलाशयों की मौजूदा भंडारण क्षमता 183.565 घन मीटर है, जिनमें हालिया रिपोर्ट के अनुसार 71.082 घन मीटर ही पानी रह गया है। इनमें 20 वे जलाशय भी हैं, जो जलविद्युत परियोजनाओं से संबद्ध हैं और इनकी कुल मिलाकर क्षमता 35.299 घन मीटर है। यदि दीर्घकालीन स्थिति में देखें, सन् 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी के समक्ष गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अभी देश में कोई संकट नहीं है। इस संकट की प्रमुख वजहों में सबसे बड़ा कारण भूजल का अंधाधुंध दोहन है। यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत विश्व में भूजल का सबसे ज्यादा उपयोग करने वाला देश है और जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है। इसमें चिंताजनक यह कि 70 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित हैं। नीति आयोग खुद मानता है कि शहरी जल संकट तेजी से बढ़ रहा है। 21 प्रमुख भारतीय शहर भूजल समाप्ति की कगार पर हैं। देश में 75 प्रतिशत से अधिक जल सिंचाई के लिए कृषि क्षेत्र में कहीं सही, कहीं गलत ढंग से उपयोग होता है। 

भारत में दुनिया की आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि उपलब्ध पीने लायक पानी केवल 4 प्रतिशत ही है। इसी से स्थिति समझ आती है। अक्सर जलाशयों या जल संग्रह स्थलों पर पानी दिखता तो है लेकिन ऐसे स्तर पर पहुंच चुका होता है, जहां से सामान्यत: निकालना संभव नहीं होता। यह इतना नीचे चला जाता है कि गुरुत्वाकर्षण आधारित सामान्य निकासी संभव नहीं होती। विशेष पंपिंग की जरूरत पड़ती है, जो महंगी और सीमित होती है। इसलिए, जलाशयों का बड़ा हिस्सा डैड स्टोरेज में चला जाता है। समय के साथ यही हिस्सा गाद और तलछट की वजह बनता है। अक्सर दिखते हुए भी पानी उपयोग योग्य नहीं रहता। इन्हीं हालातों से 30 से 40 प्रतिशत दिख रहे पानी का उपयोग नहीं हो पाता।

समय के साथ भूजल स्तर बढ़ाने और दोहन सीमित करने की दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। अनियमित रेत खनन, नदी तल का क्षरण, रियल एस्टेट के आक्रामक यांत्रिक उत्खनन के चलते प्राकृतिक तटीय अवरोध और नदी जल संरचनाएं छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इससे व्यवस्थित और प्राकृतिक जल प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र प्रणाली अत्यंत गंभीर रूप से प्रभावित होती है। नदियों की आधुनिक चक्रीय उपयोगिता व्यवस्था में अपशिष्ट जल पुन: उपयोगी बनाने की बजाय खुले अपशिष्ट निस्तारण माध्यम के रूप में उपयोग करना देश के उपलब्ध सतही जल संसाधनों को स्वयं नष्ट करने के समान है, जो बेखौफ करते हैं। निश्चित रूप से समय रहते जल की उपयोगिता और भूतल जल बढ़ाने के लिए तरह-तरह की और पूरे देश में वाटर रिचार्ज प्रणालियों पर गंभीरता से सोचना होगा। अभी इसका खामियाजा पानी की कमी के रूप में है। भविष्य में निदान में तत्परता नहीं दिखाई तो आने वाला कल बिना पेयजल का भी हो सकता है। तब क्या हालात होंगे सोचकर ही सिहरन होती है। काश, जन और तंत्र दोनों इस दिशा में गंभीरता से सोचते!-ऋतुपर्ण दवे
  

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