बंगाल में वैचारिक विष से मुक्ति का युद्ध

Edited By Updated: 14 May, 2026 04:28 AM

the war for liberation from ideological poison in bengal

शुभेंदु अधिकारी उन गिने-चुने राजनेताओं में से हैं, जिन्होंने विनम्रता, वैचारिक प्रतिबद्धता, हिंदू गौरव के प्रति निडर रुख और विकास  की एक स्पष्ट दृष्टि दिखाई है। हालांकि मैं उनसे कभी मिला नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि वह डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी...

शुभेंदु अधिकारी उन गिने-चुने राजनेताओं में से हैं, जिन्होंने विनम्रता, वैचारिक प्रतिबद्धता, हिंदू गौरव के प्रति निडर रुख और विकास  की एक स्पष्ट दृष्टि दिखाई है। हालांकि मैं उनसे कभी मिला नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि वह डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी हैं। शायद बहुत से लोगों को याद न हो कि  बंगाल में 1941 में पहली बार ‘केसरिया गठबंधन’ वाली सरकार बनी थी, जिसे ‘श्यामा-हक सरकार’ कहा जाता था।

डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ‘हिंदू महासभा’  ने ए.के. फजलुल हक की ‘कृषक प्रजा पार्टी’ (के.पी.पी.) के साथ गठबंधन किया था। उस सरकार में हिंदू महासभा के चार और के पी  पी के पांच मंत्री थे, जिसमें मुखर्जी वित्त मंत्री और हक मुख्यमंत्री थे। उस गठबंधन के 85 साल बाद, आज पहली बार किसी हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी पार्टी ने बंगाल में बिना किसी सहयोगी के, अपने दम पर सरकार बनाई है। अब शासन की कमान पूरी तरह से श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अनुयायियों के हाथ में है। इन आठ दशकों में बंगाल ने कई भारी उतार-चढ़ाव देखे हैं कलकत्ता का ‘डायरैक्ट एक्शन डे’ का मुस्लिम लीगी  जिन्ना वाला हिन्दू नरसंहार, बंगाल का विभाजन, पूर्वी पाकिस्तान का बनना (जो बाद में बांग्लादेश बना), नक्सली हिंसा, मरीचझापी नरसंहार और अवैध घुसपैठियों का भारी जनसांख्यकीय आक्रमण।

इस पूरे दौर में, कांग्रेस से लेकर वामपंथ (माकपा) और फिर तृणमूल  के शासन तक, राजनीतिक नेतृत्व, शासन व्यवस्था , सत्ता का रूप हमेशा हिंदुत्व की विचारधारा का कड़ा विरोधी रहा। इस पृष्ठभूमि में बंगाल में ङ्क्षहदुत्ववादी विचारधारा वाली पार्टी को मिले पूर्ण बहुमत के महत्व को  आंका जाना चाहिए। आजादी के बाद 79 वर्षों तक वहां के प्रशासन, सत्ताधारी वर्ग, ‘भद्रलोक’ और पुलिस-कानून एजैंसियों को केवल एक ही बात सिखाई गई हिंदुत्व को खुद से दूर रखो। उन्हें सिखाया गया कि यह ‘जहर’ है और इसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए। आग्रही हिन्दुओं पर हमले, उनको वैचारिक अस्पृश्यता का शिकार बनाना, यहां तक कि विश्व के महान हिन्दू संन्यासी संगठन श्री रामकृष्ण मिशन को न्यायालय में यह शपथ पत्र तक देना पड़ा कि वे हिन्दू नहीं हैं ताकि उनको मिलने वाली बंगाल सरकार के शैक्षिक वित्तीय सहायता मिलती रहे-यह सब बंगाल में आम बात थी। हिन्दुओं को लगता था वे अरब इस्लामिक शासन में हैं।

बंगलादेशीयों की घुसपैठ रोकने के लिए सीमा सुरक्षा बल को बंगाल की सैक्युलर सरकार ने जमीन तक नहीं उपलब्ध कराई जिसका आदेश शुभेंदु सरकार ने पहले दिन ही दिया। जब अंग्रेजों ने बंगाल पर राज किया और कलकत्ता को अपनी पहली राजधानी बनाया, तो उन्होंने हिंदू समाज के भद्रलोक वर्ग को चापलूस ‘बाबू’ बनाने की कोशिश की। उन्होंने समाज को हिंदू-मुस्लिम के चरम विभाजन में  बांट दिया, हिंदू भद्रलोक की आजादी की जद्दोजहद  से नफरत की, और ‘श्री राम पुर’ का नाम बिगाड़कर उसे ‘सेरामपुर’ कर  उसे ईसाई धर्म परिवर्तन का बड़ा केंद्र बनाया। बंगाल ने वह दौर भी देखा जब ब्रिटिश मिशनरियों ने हिंदुओं के खिलाफ झूठ फैलाया, उन्हें ‘जंगली’ और ‘सपेरा’ कहा। इससे स्वामी विवेकानंद इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने मिशनरियों  को फटकारते हुए कहा था ‘तुम ईसाई नहीं हो; ईसा मसीह के पास वापस जाओ।’ 

लेकिन बंगाल कभी नहीं झुका : इसी धरती से सबसे विद्रोही आवाजें उठीं क्रांतिकारी, आध्यात्मिक गुरु और सनातन धर्म के अडिग विचारक। बंकिम चंद्र के आनंदमठ और वंदे मातरम से लेकर विवेकानंद की ‘तूफानी हिंदू’ पुकार तक; सिस्टर निवेदिता, टैगोर और सुभाष चंद्र बोस से लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और काजी नजरुल इस्लाम तक हजारों क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम गाते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। बंगाल ने विदेशी विचारधाराओं से कभी समझौता नहीं किया। हिंदू महासभा के कमजोर होने से बहुत पहले ही, 1940 के दशक में  स्व संघ  के प्रचारकों ने बंगाल में हिन्दू संगठन का अपना काम शुरू कर दिया था। केशव राव दीक्षित और श्रीकृष्ण मोतलग शुरूआती संघ ऋषि  थे, और बाद में के.एस. सुदर्शन और मोहन भागवत जैसे दिग्गजों ने संघ की सादगी भरी शैली में हिंदू एकजुटता के लिए काम किया। उन्होंने हजारों स्वयंसेवकों को प्रेरित किया और विश्व हिंदू परिषद, कल्याण आश्रम और जनसंघ के कार्य की नींव रखी।

आर.एस.एस. के दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी  गोलवलकर ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारत की पहली हिंदुत्ववादी पार्टी, ‘भारतीय जनसंघ’ का संस्थापक अध्यक्ष चुना था। 1952 में, मुखर्जी और दुर्गा चरण बनर्जी बंगाल से चुने गए जनसंघ के पहले दो सांसद थे। बंगाल के इस महान सपूत ने भारत की एकता और कश्मीर के पूर्ण विलय के लिए लड़ाई लड़ी और 1953 में अपने प्राणों की आहुति दे दी जिसे अधिकांश  लोग योजनाबद्ध  हत्या मानते हैं। आज बंगाल की सत्ता में बैठी भाजपा, डा. मुखर्जी के भारतीय जनसंघ का ही आधुनिक रूप है। नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने डा. मुखर्जी के गृह क्षेत्र भवानीपुर में ममता बनर्जी को हराया। बंगाल में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने वह कर दिखाया है जो हाल तक असंभव माना जाता था। उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ नफरत और अलगाव की 85 साल पुरानी दीवार को ढहा दिया है। अब शुभेंदु अधिकारी के सामने बंगाल को हिंदू-विरोधी तत्वों से मुक्त करने और सरकारी तंत्र को वाम-लिबरल हिन्दू विरोधी विष से मुक्त-शुद्ध (डिटॉक्स) करने की चुनौती है। उन पर पिछले 79 वर्षों के उस ‘छद्म सैक्युलर’ प्रभाव को वैचारिक तीखे फिनायल से साफ  करने की जिम्मेदारी है, जो शासन की रग-रग में बस चुका है। यह काम आसान नहीं है, लेकिन शुद्धिकरण का यह युद्ध अब शुरू हो चुका है।-तरुण विजय
 

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