तालिबानी मानसिकता वाली शक्तियों को पूरी ताकत से रोकना होगा

Edited By Updated: 26 Aug, 2021 04:15 AM

unfulfilled wishes of half the population

अफगानिस्तान पर तालिबान द्वारा फिर से कब्जा कर लेने के बाद इस क्षेत्र सहित सारी दुनिया में धार्मिक कट्टरता का प्रशिक्षण प्राप्त आतंकवादियों के खतरे बारे चर्चा जोरों पर है। अमरीकी साम्राज्य ने अपने लाभ के लिए जिस तरीके से अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों...

अफगानिस्तान पर तालिबान द्वारा फिर से कब्जा कर लेने के बाद इस क्षेत्र सहित सारी दुनिया में धार्मिक कट्टरता का प्रशिक्षण प्राप्त आतंकवादियों के खतरे बारे चर्चा जोरों पर है। अमरीकी साम्राज्य ने अपने लाभ के लिए जिस तरीके से अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में सीधी दखलअंदाजी की और अब अफगानिस्तान को तबाह करके जिस तरह से अपनी सेना की अफगान धरती से वापसी की है, उसने इस ‘महाशक्ति’ के भीतरी खोखलेपन एवं दोगलेपन को सार्वजनिक कर दिया है। 

डा. नजीबुल्ला के नेतृत्व वाली अफगानिस्तान की प्रगतिशील सरकार को खत्म करने के लिए ‘अलकायदा’ नामक ‘महिषासुर’ राक्षस पैदा किया तथा पाला गया और फिर अफगान सरकार को गिराने के लिए इस्तेमाल किया गया। अगले चरण में जब तालिबानी (अलकायदा का बदला नाम) सत्ता ने अपना खूनी दौर शुरू कर दिया तो नाटो सेनाओं ने इस स्व-निर्मित ‘दैत्य’ को भस्म करने के बहाने अफगानिस्तान की धरती पर चढ़ाई कर दी। अफगान लोगों को तालिबान के विरुद्ध जंग में शामिल करने के लिए अरबों डालर चुनावों पर खर्च करके अपनी कठपुतली सरकार बनाई गई। अमरीका द्वारा गत 20 वर्षों में एक ट्रिलियन डालर खर्च करके 3 लाख अफगान फौज खड़ी की गई जिसने नाटो सेनाओं के साथ मिलकर तालिबान का मुकाबला किया। 

मगर जैसे ही तालिबान ने काबुल की ओर पेशकदमी शुरू की, अफगान सेना ने बड़े हिस्से में हथियारों सहित उसके आगे आत्मसमर्पण कर दिया। लोगों के सिर अपनी कठपुतली सरकार थोपने तथा सारी फौजी ताकत झोंकने के बावजूद भी जब खूंखार तालिबानी गिरोह अपना खेल जारी रखते हुए और आगे बढऩे लगे तो उसी ‘शक्तिशाली’ अमरीका ने अपनी धाकड़ सेना को दुम दबाकर अफगानिस्तान से भागने के आदेश दे दिए। पाकिस्तान के समर्थन से फरवरी 2020 को किया गया अमरीका-तालिबान समझौता (दोहा डील) भी कुछ नहीं संवार सका। निर्दोष अफगान नागरिकों को तालिबान के हथियारों  के सामने खड़े करके मौत के मुंह में धकेलने के लिए विश्व भर में साम्राज्यवादी अमरीका की थू-थू हो रही है।  

तालिबान को किसी विशेष धर्म, जाति, नस्ल या रंग के लोगों के साथ जोड़ कर देखना तर्कसंगत नहीं होगा। बल्कि इस व्यवहार को ‘तालिबानी मानसिकता’ कहा जाना चाहिए जो किसी विशेष धर्म या नस्ल के हितों की रक्षा के नाम पर मानवता के खून की प्यासी बन जाती है। यह मानसिकता अमरीका के सारे सरकारी तंत्र तथा पाकिस्तानी शासकों में भी पाई जाती है। अमरीका में अश्वेतों पर जिस ढंग से वहशी हमले किए जाते हैं सब उसी मानसिकता का परिणाम है। 

अफगानिस्तान में अमरीकी तथा नाटो सेनाओं द्वारा सीधा दखल तालिबान से लडऩे के नाम पर उस धरती के कुदरती खजाने लूटने तथा इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक हितों की पूॢत के लिए दिया गया। अब अफगानिस्तान के साधारण नागरिकों को उन्हीं तालिबानियों के हवाले करके अमरीकी सेनाएं वापस जा रही हैं जिनके खात्मे का ये साम्राज्यवादी शक्तियां दावा करती थीं। दरअसल अफगानिस्तान के प्रति अमरीकी (नाटो सहित) विदेश नीति पूरी तरह असफल सिद्ध हुई है जिससे अमरीका का चेहरा हमेशा के लिए दागदार बना रहेगा।  ‘तालिबानी मानसिकता’  भारत के विभिन्न भागों में भी साम्प्रदायिक तत्वों के हाथों धार्मिक कट्टरवादी नजरिए के अंतर्गत निहत्थे तथा निर्दोष लोगों की हत्याओं के रूप में देखी जा सकती है। विश्व भर में ‘तालिबानी मानसिकता’ विभिन्न रूपों, रंगों तथा धर्म के नाम पर कार्य करती है और मनुष्य का दुश्मन बनाकर उसे खून की होली खेलती है। 

तालिबान चाहता है कि लोग उसके जुल्मों को देख कर खौफजदा हो जाएं और उसके आदेशों के अनुसार पहरावा पहनें, भोजन करें तथा सांस्कृतिक व सामाजिक प्रक्रियाओं को स्वीकार करें। अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा मुसलमान महिलाओं को फिर से पूरी तरह गुलाम तथा बाजार की एक बिकाऊ वस्तु बनाने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है। तालिबान नए रंगरूटों की भर्ती करने के लिए जो शिक्षा देते हैं असल में वह उन्हें ‘अनपढ़’ बनाने का ही एक ढंग है। इसी तरह जैसे अफगानिस्तान की फौज तथा अफसरशाही के बड़े हिस्से ने तालिबानी हत्यारों के सामने हथियार डाल कर आम लोगों की जानमाल की रक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को तिलांजलि दे दी है उसी तरह भारत की पुलिस अन्य अद्र्धसैनिक बलों, अफसरशाही तथा न्यायपालिका के एक हिस्से ने भी शस्त्रधारी दाएंपंथी हुड़दंगियों की ङ्क्षहसक तथा समाज विरोधी कार्रवाइयों की ओर ‘मूकदर्शक’ वाला रवैया अपना रखा है। इस स्थिति में हमारे समाज में साम्प्रदायिक विभाजन, असहनशीलता तथा आपसी  अविश्वास की स्थिति पैदा होती जा रही है। 

तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के साथ इस सारे क्षेत्र तथा विशेषकर भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। हमारी वर्तमान विदेश नीति भी अमरीकी प्राथमिकताओं को ध्यान में रख कर बनाई गई है जिससे स्थिति और भी ङ्क्षचताजनक बनी हुई है। हम कई ओर से भारत के प्रति दुश्मनी भरे संबंधों वाली शक्तियों से घिरे हुए हैं जिनमें से कइयों को तो हमारी सरकार की अपनी नालायकी तथा एकतरफा पहुंच ने हमारे विरुद्ध ला खड़ा किया है। हमारी विदेशी नीति को भारतीय हितों के अनुकूल तथा वैश्विक शांति के झंडाबरदार के तौर पर नए सिरे से निर्धारित करने की जरूरत है। इससे भी अधिक जरूरत है कि देश में किसी भी तालिबानी मानसिकता वाली शक्ति या संगठन को हिंसक, साम्प्रदायिक तथा संकीर्णता वाली कार्रवाइयां या प्रचार करने से पूरी ताकत से रोकना होगा और धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक तथा समानता के असूलों के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराना व मजबूत करना होगा।-मंगत राम पासला

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