Edited By ,Updated: 30 Mar, 2026 03:25 AM

सोशल मीडिया पर सख्त प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे माता-पिता और अभियान समूहों ने लॉस एंजिल्स की एक ज्यूरी के 6 हफ्ते चली बहस के बाद दिए गए फैसले का स्वागत किया।
सोशल मीडिया पर सख्त प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे माता-पिता और अभियान समूहों ने लॉस एंजिल्स की एक ज्यूरी के 6 हफ्ते चली बहस के बाद दिए गए फैसले का स्वागत किया। ज्यूरी ने कहा कि इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप, जो मेटा कंपनी और यूट्यूब जो गूगल की ऐप है, ने जानबूझ कर ऐसे व्यसनकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बनाए, जिनसे कैली, एक 20 साल की लड़की, ने दावा किया कि इन प्लेटफॉम्र्स ने उसकी निजी समस्याओं को और बढ़ा दिया और उन्हें बॉडी डिस्मॉर्फिया, डिप्रैशन और आत्महत्या के विचारों से ग्रस्त कर दिया। मुआवजे के तौर पर कैली को 3 मिलियन डॉलर दिए गए। यह मेटा के खिलाफ ऐसे दावों पर ज्यूरी द्वारा दिया गया पहला फैसला है, क्योंकि कंपनी पर उसके प्लेटफॉर्मों द्वारा युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पडऩे वाले प्रभावों को लेकर मुकद्दमों की बाढ़ आ गई है। हालांकि मेटा के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, ‘‘हम इस फैसले से पूरी तरह असहमत हैं और अपील करेंगे। हम अपने प्लेटफॉर्मों पर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और हानिकारक तत्वों या सामग्री की पहचान करने और उन्हें हटाने की चुनौतियों से भली-भांति परिचित हैं।’’
एक बयान में, न्यू मैक्सिको के अटॉर्नी जनरल राउल टोरेज, जो एक डैमोक्रेट हैं, ने इस फैसले को ‘हर उस बच्चे और परिवार के लिए एक ऐतिहासिक जीत’ बताया, जिसने मेटा द्वारा बच्चों की सुरक्षा से ऊपर मुनाफे को प्राथमिकता देने के कारण नुकसान उठाया है। उन्होंने कहा, ‘‘ज्यूरी द्वारा मेटा को दिए जाने वाले भारी हर्जाने से बड़ी टैक कंपनियों के अधिकारियों को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि कोई भी कंपनी कानून की पहुंच से बाहर नहीं है।’’ इस परिणाम का असर संभवत: अमरीका की अदालतों में चल रहे सैंकड़ों ऐसे ही मामलों पर पड़ेगा।
ऑनलाइन एप्स किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं और उन्हें सोशल मीडिया के एडिक्ट, हिंसक तथा अवसादग्रस्त बना रहे हैं, जिसका अंतत: उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी खराब असर पड़ता है।
दूसरी ओर जर्मनी में भी एक महिला अभिनेत्री ने दावा किया कि गोर्ग नामक एक ऐप ने उसकी फर्जी तस्वीरें और फर्जी डाटा अपलोड किया। उसने कहा कि इससे उसका सारा करियर चौपट हो जाएगा। पिछले सप्ताह डेर स्पीगल, एक जर्मन अखबार, द्वारा रिपोर्ट किए गए इस मामले ने जर्मनी में इंटरनैट पर ‘डिजिटल हिंसा’ को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। 250 से अधिक प्रमुख जर्मन महिलाओं ने सरकार से लोगों को ‘डिजिटल यौन हिंसा’ से बचाने का आह्वान किया है। कई अन्य देशों में भी ‘अपने बच्चे के मासूम बचपन को पुन: प्राप्त करें’ नाम से अभियान चल रहे हैं, जो इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चों के लिए अनियंत्रित ऑनलाइन डाटा और प्रोग्रामों का संपर्क बेहद हानिकारक है, क्योंकि ये उन्हें हिंसक, यौन और फर्जी सामग्री का आदी बनाकर मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे कभी-कभी अपूरणीय क्षति भी हो सकती है। जबकि ऑस्ट्रेलिया और स्पेन ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए इंटरनैट पर प्रतिबंध लगा दिया है, क्या अब भारतीय राज्य और केंद्र सरकारों के लिए 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए इंटरनैट पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून बनाने का समय नहीं आ गया है?
इस बीच, क्या माता-पिता को भी सक्रिय रूप से अपने छोटे बच्चों की आनलाइन गतिविधियों की निगरानी नहीं करनी चाहिए और उन्हें इंटरनैट के उपयोग से रोकना नहीं चाहिए? कुछ माता-पिता का तो यह भी कहना है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सीमित ‘स्क्रीन टाइम’ दिया जाना चाहिए।