Edited By ,Updated: 10 Jul, 2026 03:36 AM

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर टिकी है लेकिन जब कोई फिल्म संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं को छूती है, तो सरकारी तंत्र अक्सर उसे दबाने की कोशिश करता है। हाल ही में दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ (पहले ‘पंजाब 95’) का मामला इसकी...
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर टिकी है लेकिन जब कोई फिल्म संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं को छूती है, तो सरकारी तंत्र अक्सर उसे दबाने की कोशिश करता है। हाल ही में दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ (पहले ‘पंजाब 95’) का मामला इसकी ताजा मिसाल है। ओ.टी.टी. पर रिलीज होने के मात्र 2-3 दिन बाद फिल्म की भारत में उपलब्धता बंद कर दी गई। यह घटना न सिर्फ सैंसरशिप की बहस को फिर से जीवंत करती है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या लोकतंत्र में सरकार को फिल्मों पर इस तरह अंकुश लगाने का अधिकार है? क्या अतीत की जांच को दबाना राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा है या लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन?
फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पर आधारित है, जो 1990 के दशक में पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियान के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों और अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं की जांच कर रहे थे। खालड़ा ने नगर निगमों के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड खंगाल कर हजारों अज्ञात शवों की जानकारी जुटाई, जो कथित तौर पर पुलिस कार्रवाइयों से जुड़े थे। उनकी आवाज को दबाने के प्रयास हुए और अंतत: वह खुद गुम हो गए। सी.बी.आई. जांच में उनकी हत्या साबित हुई। फिल्म इसी दर्दनाक अध्याय को छूती है। उल्लेखनीय है कि सैंसर बोर्ड ने इस फिल्म में 127 कटौतियां मांगीं, जिसके बाद फिल्म का नाम बदलकर ओ.टी.टी. पर रिलीज की गई। लेकिन रिलीज के बाद इसे जल्द ही हटा लिया गया। दिलजीत दोसांझ ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए खुलकर कहा कि ‘खालड़ा साहब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता।’
यह पहली बार नहीं है जब ऐसी फिल्मों पर प्रतिबंध या कटौतियां लगाई गई हों। भारतीय सिनेमा का इतिहास सैंसरशिप की कई घटनाओं से भरा पड़ा है।
1990 के दशक में दीपा मेहता की ‘फायर’ को लेस्बियन संबंधों के चित्रण के कारण विवाद का सामना करना पड़ा और कुछ राज्यों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। मणि रत्नम की ‘बॉम्बे’ (1995) ने 1992-93 के दंगों को दिखाया, जिस पर आपत्तियां उठीं। ‘परजानिया’ (2005) गुजरात दंगों पर आधारित थी और इसे कई जगहों पर बैन का सामना करना पड़ा। ‘ब्लैक फ्राइडे’ (2007) 1993 के मुंबई ब्लास्ट पर थी, जिसकी शुरुआत में रिलीज में देरी हुई। हाल के वर्षों में ‘पद्मावती’ (2018) पर करणी सेना के विरोध ने रिलीज को प्रभावित किया। ‘द केरला स्टोरी’ (2023) पर पश्चिम बंगाल में बैन लगा, जबकि ‘फराज’ (2023) भी विवादास्पद रही।
‘सतलुज’ के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं उठाई गईं। इस फिल्म पर खालिस्तानी भावनाओं को बढ़ावा देने का आरोप है। पंजाब के इतिहास में आतंकवाद का घाव आज भी ताजा है। पंजाब में 1980-90 के दशक में हजारों निर्दोष मारे गए, सुरक्षा बलों ने जहां एक ओर आतंकवाद दबाया, वहीं उन पर आरोप है कि कुछ मामलों में अतिरेक भी हुआ। खालड़ा की जांच सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और सी.बी.आई. ने हत्याओं की पुष्टि की। फिर भी, फिल्म को दबाना यह सवाल उठाता है, कि क्या सच्चाई को दबाने से घाव भरेंगे या और गहरे होंगे?
सरकार फिल्मों को दबाने के पीछे कई तर्क देती है। पहला, राष्ट्रीय सुरक्षा। पंजाब जैसे क्षेत्र में अतीत की घटनाएं आज भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं। अगर फिल्म एकतरफा हो और सुरक्षा बलों को केवल नकारात्मक रूप में दिखाए, तो यह युवाओं में अलगाववाद को बढ़ावा दे सकती है।
दूसरा, सार्वजनिक व्यवस्था। 1990 के दशक की यादें पंजाब में अभी भी विभाजनकारी हैं। कुछ इसे पुलिस अत्याचार मानते हैं, तो कुछ सुरक्षा बलों की बहादुरी। तीसरा, कानूनी प्रावधान। सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 केंद्रीय फिल्म सैंसर बोर्ड को फिल्मों को प्रमाणित करने का अधिकार देता है। इसमें ‘सार्वजनिक नैतिकता’, ‘अखंडता’ और ‘सुरक्षा’ जैसे आधार शामिल हैं। वहीं ओ.टी.टी. प्लेटफॉम्र्स पर भी आई.टी. रूल्ज 2021 के तहत नियंत्रण बढ़ा है। ओ.टी.टी. के एक चैनल ने यह फिल्म हटाई, जो संभवत: सरकारी दबाव या कानूनी नोटिस का परिणाम था। लेकिन क्या ये तर्क लोकतंत्र में उचित हैं? भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19(2) में सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता आदि के लिए उचित प्रतिबंधों का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में (जैसे रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, 1950) कहा है कि सैंसरशिप न्यूनतम होनी चाहिए और केवल ‘क्लियर एंड प्रैजैंट डेंजर’ पर आधारित हो। गौरतलब है कि फिल्में ऐतिहासिक सच्चाई का माध्यम हैं। अगर खालड़ा की कहानी अदालती जांच पर आधारित है, तो उसे दबाना लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है।
सरकार का दमन अक्सर राजनीतिक सुविधा से प्रेरित होता है। सत्ताधारी दल अतीत की गलतियों को उजागर करने वाली कृतियों को ‘एंटी-नैशनल’ करार देते हैं, जबकि अपनी सुविधा की फिल्में आसानी से पास हो जाती हैं। यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र को कमजोर करता है। पश्चिम में भी विवादास्पद फिल्में (जैसे ओलिवर स्टोन की जे.एफ.के. रिलीज होती हैं और बहस छेड़ती हैं लेकिन बैन नहीं होतीं। भारत में सैंसर बोर्ड का राजनीतिक प्रभाव और दबाव समूहों की ताकत समस्या को बढ़ाती है। फिर भी, पूर्ण स्वतंत्रता भी जोखिम भरी है। अगर फिल्में झूठ फैलाएं, समुदायों को भड़काएं या सुरक्षा बलों की गरिमा को बिना सबूत के कलंकित करें, तो राज्य को हस्तक्षेप करना ही चाहिए। इसका समाधान पारदॢशता में है। ऐसे में सैंसर बोर्ड की कार्रवाई सार्वजनिक हो, कटौतियों के कारण स्पष्ट हों और न्यायिक समीक्षा त्वरित हो। ओ.टी.टी. पर स्व-नियमन के साथ राज्य हस्तक्षेप सीमित हो।
‘सतलुज’ प्रकरण हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में इतिहास को दबाया नहीं जा सकता। इंटरनैट युग में फिल्में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे बहस फैलती है। पंजाब को अपने अतीत का सामना ईमानदारी से करना चाहिए। न सिर्फ अत्याचारों की, बल्कि आतंकवाद की कीमत का भी। सरकार को चाहिए कि वह सच्चाई का सामना करे, न कि दबाए। केवल तभी हम एक परिपक्व लोकतंत्र कहला सकते हैं, जहां असहमति को जगह है और सच्चाई की तलाश को सुरक्षा। यह बहस सिर्फ एक फिल्म की नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक परिपक्वता की है। क्या हम अतीत को सीखने की हिम्मत रखते हैं या उसे दफन कर देते हैं? ‘सतलुज’ हट जरूर गई लेकिन खालड़ा की आवाज अब और तेज हो गई है।-रजनीश कपूर