सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण में गुणवत्ता से समझौता क्यों?

Edited By Updated: 28 Aug, 2026 05:20 AM

why compromise on quality in the construction of roads and flyovers

पिछले कुछ वर्षों में देश भर में सड़कों के धंसने, फ्लाईओवरों के गिरने और नई-नई बनी सड़कों के जल्दी खराब होने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। बारिश हो या सामान्य मौसम, सड़कें गड्ढों में तबदील होती जा रही हैं, सेवा मार्ग धंस जाते हैं और कभी-कभी बड़ी...

पिछले कुछ वर्षों में देश भर में सड़कों के धंसने, फ्लाईओवरों के गिरने और नई-नई बनी सड़कों के जल्दी खराब होने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। बारिश हो या सामान्य मौसम, सड़कें गड्ढों में तबदील होती जा रही हैं, सेवा मार्ग धंस जाते हैं और कभी-कभी बड़ी निर्माण परियोजनाएं भी विफल साबित हो जाती हैं। गुरुग्राम, कानपुर, गुजरात और जम्मू-कश्मीर जैसी जगहों पर हाल की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी में गंभीर खामियां हैं। ये घटनाएं न केवल आम नागरिकों की जान जोखिम में डालती हैं, बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों की छवि भी धूमिल करती हैं।

इसी अगस्त में गुरुग्राम में भारी बारिश के बाद बेहद व्यस्त रहने वाले इफ्को चौक के पास दिल्ली-जयपुर हाईवे की सॢवस रोड धंस गई। करीब 10 से 15 फुट गहरा और कई फुट चौड़ा गड्ढा बन गया। इसी तरह कानपुर में जाजमऊ के सरैया चौराहे पर सड़क में अचानक ‘पाताल’ जैसा गड्ढा बन गया, जो लगभग 3 मीटर चौड़ा और 18 फुट गहरा था। बारिश का पानी देखते ही देखते उसमें समा गया। जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले में निर्माणाधीन फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिरने से मजदूर की मौत हो गई। गुजरात में राष्ट्रीय राजमार्गों पर दरारें और गड्ढों की शिकायतें आईं, जहां ठेकेदारों पर जुर्माना भी लगाया गया। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रैसवे जैसे नए प्रोजैक्ट में उद्घाटन के कुछ हफ्तों में ही सतह फिसलने की घटना हुई। 

इस सब के लिए संबंधित विभाग और अधिकारी स्पष्ट रूप से दोषी हैं। सीवर लाइन, पानी की पाइपलाइन या ड्रेनेज सिस्टम को ठीक से नहीं बिछाया जाता या उनका रखरखाव नहीं होता। मिट्टी भरने (बैकफिलिंग) में लापरवाही, घटिया बिटुमिन या कंक्रीट का इस्तेमाल और गुणवत्ता जांच की औपचारिकता भर ही रह जाती है। परियोजनाओं का पर्यवेक्षण करने वाले इंजीनियर और अधिकारी अक्सर इन कमियों को नजरअंदाज कर देते हैं। ठेकों में ‘एल-1’ बोली प्रणाली में ठेकेदार मुनाफा कमाने के लिए सामग्री में कटौती करते हैं और अधिकारियों की मिलीभगत या उदासीनता इसे बढ़ावा देती है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2026 के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में दर्जनों मामले खराब कार्यक्षमता, खराब डिजाइन और अपर्याप्त पर्यवेक्षण से जुड़े रहे। औपचारिकता के लिए, कुछ ठेकेदारों पर जुर्माना जरूर लगता है लेकिन पर्यवेक्षण करने वाले सरकारी अधिकारियों पर कार्रवाई शायद ही होती है।

राजनीतिक संरक्षण, नौकरशाही की आपसी सुरक्षा और ‘सिस्टम’ का बहाना काम करता है। ठेकेदारों को कभी-कभी ब्लैकलिस्ट भी किया जाता है लेकिन अधिकारी अक्सर सुरक्षित रहते हैं। जनता टैक्स चुकाती है लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षित सड़कें नहीं मिलतीं। आखिर इसका जिम्मेदार कौन? ठेकेदार, पर्यवेक्षण करने वाले इंजीनियर, डी.पी.आर. बनाने वाले सलाहकार और अंतत: नीति बनाने वाले तथा राजनीतिक नेतृत्व।

सरकारें और विभाग अक्सर दावा करते हैं कि ये सड़कें, हाईवे और फ्लाईओवर बेहतरीन तकनीक और आधुनिक सामग्री से बने हैं। नैशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एन.एच.ए.आई.) और राज्य के लोक निर्माण विभाग (पी.डब्ल्यू.डी.) या महानगर विकास प्राधिकरण परियोजनाओं को ‘वल्र्ड क्लास’ बताते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कई सड़कें कुछ महीनों या एक-दो साल में ही खराब हो जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या डिजाइन, सामग्री और निष्पादन तीनों स्तरों पर है। सैंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीच्यूट (सी.आर.आर.आई.) के अधिकारियों ने समय-समय पर इशारा किया है कि तेज गति से निर्माण की होड़ में गुणवत्ता पीछे छूट जाती है। मांग और आपूर्ति के बीच अंतर, सामग्री की गुणवत्ता में समझौता और निगरानी की कमी मुख्य कारण हैं। आई.आई.टी. जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे कम बोली वाले ठेकेदार को काम मिलने से लागत कम करने के लिए घटिया सामग्री का इस्तेमाल होता है। 

ऐसा नहीं है कि इसका समाधान संभव नहीं है। सबसे पहले, स्वतंत्र गुणवत्ता ऑडिट अनिवार्य किए जाएं। सामग्री की जांच प्रयोगशालाओं में हो और रिपोर्ट सार्वजनिक हो। ठेकेदारों के अलावा पर्यवेक्षण अधिकारियों पर भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। खराब काम पर सस्पैंशन, रिकवरी और कानूनी कार्रवाई। डी.पी.आर. तैयार करने में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मानदंड लागू हों। सब-कॉन्ट्रैकिं्टग पर सख्ती हो। सड़कों के जीवनचक्र के अनुसार रखरखाव का बजट अलग से आबंटित हो। सीवर और ड्रेनेज सिस्टम को सड़क निर्माण के साथ समन्वय से बिछाया जाए। पारदॢशता के लिए ठेके, सामग्री और निरीक्षण रिपोर्ट ऑनलाइन उपलब्ध हों। नागरिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का तंत्र बने।

सड़कें और फ्लाईओवर जनता की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। खराब सामग्री और लापरवाह पर्यवेक्षण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। संबंधित विभागों और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराए बिना इस समस्या का समाधान नहीं होगा। अब समय आ गया है कि कागजी दावों से आगे बढ़कर जमीनी गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। केवल तभी ये सड़कें वास्तव में ‘बेहतर तकनीक’ का उदाहरण बन पाएंगी, न कि बारिश के मौसम में धंसने वाली खतरे की निशानी।-रजनीश कपूर 
 

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