Edited By ,Updated: 26 Sep, 2026 04:03 AM

नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय की ऊंची दीवारों के पीछे से स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ पर सामने आया वह दृश्य, भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे पीड़ादायक और लज्जाजनक घटनाओं में से एक के रूप में याद किया जाएगा। देश ने कांग्रेस दफ्तर से बिना...
नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय की ऊंची दीवारों के पीछे से स्वतंत्रता दिवस की 79वीं वर्षगांठ पर सामने आया वह दृश्य, भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे पीड़ादायक और लज्जाजनक घटनाओं में से एक के रूप में याद किया जाएगा। देश ने कांग्रेस दफ्तर से बिना किसी काट-छांट वाला प्रसारित वह वीडियो देखा, जिसमें ध्वजारोहण समारोह के दौरान श्रीमती सोनिया गांधी ‘वंदे मातरम्’ के सम्पूर्ण गायन को रुकवाने का प्रयास करती नजर आ रही थीं। रिपोर्टों के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी उनकी बात का समर्थन करते हुए नाराजगी भरे स्वर में कह रहे थे कि ‘हम वह संस्करण नहीं गाएंगे, हमारा गीत तो बस इतना ही है।’
राष्ट्रीय गीत का यह अपमान महज निन्दाजनक और दंडयोग्य आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि ‘वंदे मातरम्’ के प्रति नेहरू-गांधी परिवार और उनके नियंत्रण वाली कांग्रेस के उस तिरस्कार का खुला प्रदर्शन था, जो लगभग 9 दशकों से उनकी राजनीति और उनके रवैये में लगातार झलकता रहा है। यह सब तब हुआ, जब भारतीय संसद ने हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित कर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समक्ष कानूनी मान्यता प्रदान की और वंदे मातरम् के सभी 6 पदों का गायन अनिवार्य किया। परिवार और पार्टी के वफादार और उनका पूरा ईकोसिस्टम इस कुकृत्य के बचाव में उतर आए। उन्होंने पहले यह कहानी गढ़ी कि सोनिया गांधी वंदे मातरम् के गायन में बाधा नहीं डाल रही थीं, बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बैठने के लिए कुर्सी लाने के लिए कह रही थीं। फिर दोपहर होते-होते उनका रुख बदल गया और वह अपने असली रंग में आ गए कि हम पूरा वंदे मातरम् नहीं गाएंगे। यहां तक कि संपूर्ण वंदे मातरम् की 2 पंक्तियां गाना भी उन्हें असहज कर देता है।
संपूर्ण वंदे मातरम् के गायन में लगने वाले महज 3 मिनट 10 सैकेंड ने कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के मन में भरे राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के प्रति विद्वेष के साथ-साथ देशभक्ति और सांस्कृतिक गौरव के हर प्रतीक के प्रति गहरे और घृणित पूर्वाग्रह को खुलकर सामने ला दिया। यह केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं थी, बल्कि इस बात का एक और उदाहरण था कि नेहरू-गांधी परिवार के नियंत्रण वाली कांग्रेस किस तरह बार-बार भारत की जनता की देशभक्ति की भावनाओं के विरुद्ध काम करती है। अक्तूबर 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने कट्टरपंथी मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए वंदे मातरम् को केवल 2 पदों तक सीमित कर दिया था। यह फैसला उस समय देश की व्यापक जनभावना के भी विपरीत था। वोट बैंक की राजनीति के लिए वंदे मातरम् की बलि चढ़ा दी और राष्ट्रीय भावना को आहत किया।
जिन्ना की सांप्रदायिक मांगों के सामने नेहरू के समर्पण का परिणाम भारत के विभाजन और सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान के निर्माण के रूप में सामने आया। बदला सिर्फ भारत का भूगोल नहीं था, विस्थापन, रक्तपात और सांप्रदायिक दंगों के बीच इस महान राष्ट्र का इतिहास भी बदल गया। भारत इस कांग्रेस और जिन्ना जनित विनाश से रक्तरंजित होकर निकला लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हमारा संकल्प नहीं टूटा। वंदे मातरम्, भारत के इतिहास और संस्कृति के विरुद्ध किए गए अपने अपराधों के प्रति कांग्रेस कम-से-कम प्रतीकात्मक रूप से भी प्रायश्चित कर सकती थी। कांग्रेस के लिए यह स्वॢणम अवसर था लेकिन दुर्भाग्यवश जिन्ना और मुस्लिम लीग के प्रति कांग्रेस का मोह बना रहा और परिणामत: वंदे मातरम् के विरोध तथा उसके अपमान का सिलसिला भी जारी रहा।
मार्च 1973 में संसद में हुई एक बहस के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस से दो स्पष्ट प्रश्न पूछे थे-मुस्लिम लीग के साथ केरल में सरकार बना कर किसने साम्प्रदायिकता को जिंदा किया है? आजाद हिन्दुस्तान में मुस्लिम लीग की जरूरत क्या है? कांग्रेस तब से इन सवालों से बचती रही है, क्योंकि सच यह है कि वह खुद मुस्लिम लीग के साथ राजनीतिक संबंध रखती रही है और जिन्ना के विचार भी कांग्रेस के राजनीतिक दर्शन में किसी न किसी रूप में प्रतिनिधित्व पाते रहे हैं। यह सिलसिला पहले राहुल गांधी और फिर प्रियंका गांधी के लोकसभा चुनाव अभियानों में भी देखने को मिला है।
वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण देने का मोदी सरकार का निर्णय न केवल विकसित भारत की दृष्टि के अनुरूप है, बल्कि कांग्रेस की उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का प्रयास भी है, जिसे देश को दशकों तक ढोना पड़ा। कांग्रेस के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि मातृभूमि की स्तुति में लिखा गया वह गीत, जिसने कभी ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी थी, आज आखिर कांग्रेस को ही क्यों आहत करता है। कांग्रेस का तर्क रहा कि इस गीत में मूॢत-पूजा के तत्व हैं, जिन्हें इस्लाम स्वीकार नहीं करता। कांग्रेस उस वंदे मातरम् का विरोध कर रही है, जिसके लिए हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। अपने समय के प्रमुख राष्ट्रवादी बंगाली मुस्लिम नेताओं में शामिल रेजाउल करीम ने अपनी पुस्तक ‘फॉर इंडिया एंड इस्लाम’ में इस विचार का समर्थन किया था कि इस्लाम और भारतीय राष्ट्रवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
ऐसे समय में, जब वंदे मातरम् को लगातार सांप्रदायिक विवाद का विषय बनाया जा रहा था, करीम ने कट्टरपंथियों और छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को चुनौती देने का साहस दिखाया। उन्होंने वंदे मातरम् का पक्ष लेते हुए कहा कि यह मुसलमानों के प्रति किसी शत्रुता की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रवाद का सशक्त स्वर है। उन्होंने लिखा कि वंदे मातरम् का विरोध भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन से दूर करने और भारत की आजादी की लड़ाई से अलग-थलग करने की एक सुनियोजित साजिश के तहत खड़ा किया गया था।
कांग्रेस वंदे मातरम् का विरोध इसलिए करती है क्योंकि वह भारतीय सभ्यता की उस अवधारणा को स्वीकार करने से इंकार करती है, जिसे हम ‘राष्ट्र’ कहते हैं। भारतीय ङ्क्षचतन में राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से घिरा कोई भू-भाग या एक राजनीतिक व्यवस्था भर नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सत्ता है, जो सांझा इतिहास, विरासत और अपनत्व की भावना के माध्यम से अपने लोगों को एक सूत्र में बांधती है। एक ऐसा गीत, जिसने पीढिय़ों से इस राष्ट्र को प्रेरित किया है, वह अगर कुछ लोगों को असहज करता है तो समस्या उस गीत में नहीं है। समस्या उन लोगों की सोच में है, जो पूर्वाग्रह, सांप्रदायिकता और ऐसी राजनीति से ग्रस्त है, जिसमें राष्ट्र से ऊपर वोट बैंक को रखा जाता है।-अनुराग सिंह ठाकुर(सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री)