Why Gold Price Falling: धड़ाम हुए सोने के दाम, जंग के बीच आखिर क्यों टूटे भाव?

Edited By Updated: 07 Mar, 2026 01:26 PM

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान पर अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बीच वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। आमतौर पर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट के समय निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर सोने की ओर रुख करते हैं, जिससे इसकी कीमतें बढ़ती हैं...

बिजनेस डेस्कः पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान पर अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बीच वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। आमतौर पर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट के समय निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर सोने की ओर रुख करते हैं, जिससे इसकी कीमतें बढ़ती हैं लेकिन इस बार स्थिति उलटी दिखाई दे रही है। पुराने आर्थिक सिद्धांत और मान्‍यताएं गलत साबित होती दिख रही हैं। युद्ध के बावजूद सोने की कीमतें बढ़ने के बजाय धड़ाम हो गई हैं।

फरवरी के अंत में जब युद्ध की आशंका बढ़ रही थी, तब स्पॉट गोल्ड करीब 5,244 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर था। हालांकि कुछ ही दिनों में कीमतों में नरमी आई और 6 मार्च तक यह लगभग 5,120 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों के लिए यह गिरावट इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि आमतौर पर ऐसे संकट के समय सोने की मांग बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के महीनों में सोने में जबरदस्त तेजी देखने को मिली थी। वर्ष 2025 में सोने की कीमतों में लगभग 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि 2026 की शुरुआत में भी इसमें 20 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई थी। जनवरी 2026 में सोना करीब 5,418 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। इसके बाद बाजार में मुनाफावसूली और सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिसे विश्लेषक ‘कंसोलिडेशन फेज’ मान रहे हैं।

सरल भाषा में कहें तो, सोना अपनी अगली बड़ी छलांग लगाने से पहले एक सीमित दायरे में सुस्ता रहा है लेकिन युद्ध के दौरान इस सुस्ती का गिरावट में बदल जाना ‘खतरे की घंटी’ जैसा है। 

सोने में गिरावट के कारण

इस गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी माना जा रहा है। संकट के समय निवेशक आमतौर पर दो सुरक्षित विकल्प चुनते हैं—सोना और अमेरिकी डॉलर। इस बार डॉलर ज्यादा मजबूत साबित हो रहा है। International Monetary Fund के उप प्रबंध निदेशक Daniel Katz के अनुसार वैश्विक वित्तीय प्रणाली में डॉलर अभी भी प्रमुख भूमिका निभाता है और संकट के समय निवेशक नकदी को प्राथमिकता देते हैं।

इसके अलावा तेल की बढ़ती कीमतों ने भी बाजार की दिशा प्रभावित की है। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण Brent Crude की कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई है। चूंकि कच्चे तेल का व्यापार डॉलर में होता है, इसलिए कई देशों और कंपनियों को बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत पड़ रही है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए कुछ निवेशक अपने सोने के निवेश को बेचकर नकदी जुटा रहे हैं, जिससे सोने पर दबाव बढ़ा है।

अमेरिका के केंद्रीय बैंक Federal Reserve की नीतियां भी सोने की कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। पहले उम्मीद थी कि 2026 में ब्याज दरों में कटौती हो सकती है लेकिन तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा है। ऐसी स्थिति में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे निवेशक सोने के बजाय बॉन्ड जैसे विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।

केंद्रीय बैंकों की खरीदारी घटी

दूसरी ओर केंद्रीय बैंकों की खरीदारी में भी कमी आई है। World Gold Council के अनुसार 2025 में वैश्विक सोने की मांग 5,000 टन से अधिक रही थी और केंद्रीय बैंक हर महीने औसतन 27 टन सोना खरीद रहे थे लेकिन जनवरी 2026 में यह खरीद घटकर करीब 5 टन रह गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रुझान जारी रहता है तो आने वाले समय में सोने की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
 

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