Edited By jyoti choudhary,Updated: 01 Sep, 2026 02:30 PM
अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बावजूद 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की। यह वृद्धि भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के अनुमानित 7 प्रतिशत से भी अधिक रही। इसी अवधि में रियल ग्रॉस...
नई दिल्ली: अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने वैश्विक और घरेलू चुनौतियों के बावजूद 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की। यह वृद्धि भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के अनुमानित 7 प्रतिशत से भी अधिक रही। इसी अवधि में रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में 8.2 प्रतिशत और नॉमिनल GDP में 10.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
इसी तिमाही में अमेरिका की अर्थव्यवस्था 1.5 प्रतिशत, चीन की 4.3 प्रतिशत और ब्रिटेन की सिर्फ 0.4 प्रतिशत बढ़ी यानी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की विकास दर काफी मजबूत रही।
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर ने संभाली अर्थव्यवस्था
जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रों में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली।
- मैन्युफैक्चरिंग: 9.2 प्रतिशत
- कंस्ट्रक्शन: 7.7 प्रतिशत
- सर्विसेज: 10 प्रतिशत
- प्राइवेट कंजम्पशन: 7.1 प्रतिशत
- रियल ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन: 11.9 प्रतिशत
- एक्सपोर्ट: 12 प्रतिशत
रियल ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन में तेजी से निवेश दर GDP के 31.4 प्रतिशत से बढ़कर 34.3 प्रतिशत हो गई। वहीं, सरकारी खपत में सिर्फ 4.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे संकेत मिलता है कि तिमाही में ग्रोथ को मुख्य रूप से निजी क्षेत्र और निवेश से समर्थन मिला।
लिस्टेड कंपनियों का ऑपरेटिंग प्रॉफिट 19.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि बैंक क्रेडिट ग्रोथ भी 19.3 प्रतिशत रही। नेट FDI दोगुना होकर 7.8 अरब डॉलर पहुंच गया और केंद्र सरकार का नेट टैक्स राजस्व 17.8 प्रतिशत बढ़ा।
महंगे तेल के बावजूद महंगाई पर काबू
इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में ट्रैफिक सामान्य स्तर के मुकाबले काफी कम रहा और Brent crude की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसके बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा गया। इसका असर घरेलू महंगाई पर भी दिखा। हाउसहोल्ड कंजम्पशन डिफ्लेटर सिर्फ 2.6 प्रतिशत रहा, जबकि इंपोर्ट डिफ्लेटर 30 प्रतिशत से ज्यादा था।
FCNR(B) स्वैप विंडो के जरिए करीब 65.4 अरब डॉलर जुटाए गए, जिससे रुपए पर दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिली। वहीं, खाद्यान्न का स्टॉक बफर मानक से करीब 4.7 गुना रहा, जिससे कमजोर मानसून के बीच अनाज की कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद मिली।
अर्थव्यवस्था के सामने 5 बड़ी चुनौतियां
मजबूत जून तिमाही के बावजूद अगले तीन क्वार्टर में अर्थव्यवस्था के सामने पांच बड़ी चुनौतियां हैं—तेल, मानसून, रुपया, व्यापार और निजी निवेश की कमान संभालना।
1. कच्चे तेल की कीमत सबसे बड़ी चुनौती
अगस्त में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत करीब 89.7 डॉलर प्रति बैरल रही। मुख्य आर्थिक सलाहकार के मुताबिक, कीमतों में जल्द कोई बड़ी गिरावट आने की उम्मीद नहीं है। सरकार ने घरेलू ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए राजस्व पर दबाव लिया। प्रमुख सब्सिडी में 37.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि एक्साइज कलेक्शन 22.4 प्रतिशत घटा।
ऐसे में नीति के स्तर पर एक्साइज ड्यूटी को एक तरह के बफर के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। जब कच्चा तेल महंगा हो तो एक्साइज में कटौती की जाए और कीमतें नीचे आने पर इसे धीरे-धीरे बहाल किया जाए।
2. कमजोर मानसून से खाद्य महंगाई का खतरा
मानसून की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है। जून के अंत में बारिश की कमी 38 प्रतिशत थी, जो जुलाई के अंत तक घटकर 13 प्रतिशत रह गई। खरीफ की बुवाई भी सामान्य क्षेत्र के करीब 92 प्रतिशत तक पहुंच गई। फिर भी चारों प्रमुख मौसम क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम है। IMD ने अगस्त और सितंबर में बारिश दीर्घकालिक औसत की 94 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान जताया है।
इसका असर कुछ खाद्य वस्तुओं पर दिखने लगा है। मांस, अंडे और मसालों की महंगाई पहले ही 12 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है। स्थिति बिगड़ने पर सरकार को खुले बाजार में चावल और गेहूं जारी करने, दालों और खाद्य तेलों पर आयात शुल्क अस्थायी रूप से घटाने और ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों को प्रभावित जिलों में बढ़ाने जैसे कदम उठाने की जरूरत हो सकती है।
3. रुपए पर दबाव और अतिरिक्त लिक्विडिटी
रुपया 95.7 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है और 31 अगस्त को FCNR(B) विंडो भी बंद हो गई। इस दौरान डॉलर के बदले जारी किए गए रुपए ने बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी बढ़ाई। अगस्त में दैनिक औसत लिक्विडिटी एब्जॉर्प्शन करीब 3.48 लाख करोड़ रुपए रहा, जो जून में 89,000 करोड़ रुपए के आसपास था।
इस स्थिति में RBI के सामने चुनौती यह है कि अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित किया जाए, ताकि यह जरूरत से ज्यादा क्रेडिट ग्रोथ को बढ़ावा न दे। फिलहाल बैंक क्रेडिट करीब 19.3 प्रतिशत बढ़ रहा है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ सिर्फ 15.4 प्रतिशत है।
4. अमेरिका के टैरिफ से एक्सपोर्ट पर दबाव
24 जुलाई से अतिरिक्त 10 प्रतिशत Section 301 tariff लागू हुआ। हालांकि स्मार्टफोन, पेट्रोलियम उत्पाद और फार्मास्यूटिकल्स जैसे कई उत्पाद इससे बाहर हैं। इसी वजह से जुलाई में अमेरिका को भारत का निर्यात 12.9 प्रतिशत बढ़ा।
लेकिन गारमेंट्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, लेदर और सिरेमिक जैसे रोजगार देने वाले क्षेत्रों के निर्यात में गिरावट आई है।
ऐसे में सरकार को श्रम-प्रधान निर्यातकों के लिए ब्याज सहायता, निर्यात प्रोत्साहन और अन्य लक्षित राहत उपायों को जारी रखने की जरूरत बताई गई है। साथ ही यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौतों को जल्द पूरा करने पर जोर दिया गया है।
5. अब निजी निवेश को संभालना होगा ग्रोथ का जिम्मा
सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर जून तिमाही में 23.7 प्रतिशत बढ़ा, हालांकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 52 प्रतिशत बढ़ा था। अब अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम चुनौती यह है कि सार्वजनिक निवेश के बाद निजी निवेश ग्रोथ की कमान संभाले। जून तिमाही में इसके संकेत भी मिले हैं। कैपिटल गुड्स का उत्पादन 15.2 प्रतिशत बढ़ा और मशीनरी आयात में 51.5 प्रतिशत की तेजी आई।