Edited By Sarita Thapa,Updated: 19 Jul, 2026 01:58 PM

जल्द ही सावन का महीना शुरू होने वाला है। इस मास को भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। सावन की शुरुआत के साथ ही सारा वातावरण महादेव की भक्ति में रम जाता है। इसी पावन महीने में देशभर में लाखों शिव भक्त भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त...
Kanwar Yatra 2026 : जल्द ही सावन का महीना शुरू होने वाला है। इस मास को भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। सावन की शुरुआत के साथ ही सारा वातावरण महादेव की भक्ति में रम जाता है। इसी पावन महीने में देशभर में लाखों शिव भक्त भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। कंधे पर कांवड़ उठाकर गंगाजल लाने और उसे शिवलिंग पर अर्पित करने की यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए कांवड़ यात्रा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। साल 2026 में कांवड़ यात्रा की शुरुआत सावन महीने में होगी, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से शिव भक्त हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र स्थानों से जल लेने के लिए रवाना होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना बेहद जरूरी माना जाता है। खासकर जो लोग पहली बार कांवड़ यात्रा पर जा रहे हैं, उन्हें कुछ छोटी-छोटी गलतियों से बचना चाहिए, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इनका यात्रा के फल पर प्रभाव पड़ सकता है। तो आइए जानते हैं कि जो पहली बार कांवड़ यात्रा करने का सोच रहे या करने वाले हैं, उन्हें कौन से नियमों का पालन करना चाहिए।
क्या है कांवड़ यात्रा?
कांवड़ यात्रा भगवान शिव को समर्पित एक धार्मिक यात्रा है जो पैदल की जाती है। भक्त कलश और मटकों में पवित्र नदियों से जल भरकर कांवड़ पर रखते हैं और यात्रा करके उस जल को शिवालय तक लाते हैं और फिर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। इस यात्रा को करने वालों को कांवड़िया कहा जाता है।
कहां से शुरू होती है कांवड़ यात्रा?
मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा हरिद्वार से शुरू होती है, लेकिन कई भक्त गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज जैसे पवित्र तीर्थ स्थलों से जल भरकर भी कांवड़ यात्रा शुरू करते हैं। इनमें से हरिद्वार से निकलने वाली कांवड़ यात्रा सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है।

क्या है नियम?
सबसे पहले नियम की बात करें तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कांवड़ में भरा गया जल पवित्र होता है और इसे नीचे रखने की मनाही होती है। यानी कि कांवड़ का स्पर्श ज़मीन पर नहीं होना चाहिए। जब भी आराम के लिए या किसी अन्य कारणवश कांवड़ को कंधे से उतारना पड़े तो इसे कांवड़ स्टैंड पर रखा जाता है या फिर किसी ऊंचे स्थान पर ही रखा जाता है या किसी अन्य साथी को पकड़ाया जाता है।
दूसरे नियम की बात करें तो कांवड़ यात्रा करने वालों को पवित्रता का पूरा ध्यान रखना होता है। यात्रा के दौरान वह किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली, अंडे, प्याज़ और लहसुन आदि नहीं खा सकते हैं। इसके अलावा किसी भी प्रकार के नशे से भी दूरी बनाए रखना अनिवार्य माना जाता है। केवल खाने पीने की चीजें ही नहीं, इस दौरान चमड़े से बनी किसी भी वस्तु का इस्तेमाल वर्जित माना जाता है।
इसके अलावा इस पूरे समय मन और विचारों को भी नियंत्रण में रखना ज़रूरी माना जाता है। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए और क्रोध से भी बचना चाहिए। इस पूरे समय ब्रह्मचर्य का पालन करना भी ज़रूरी माना जाता है।
आगे बता दें कि मुख्य रूप से तो कांवड़ यात्रा नंगे पैर करनी ही मान्यता है और कई शिवभक्त कांवड़ यात्रा के दौरान नंगे पैर चलने की परंपरा भी निभाते हैं। इसे भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। हालांकि कई श्रद्धालु शारीरिक समस्याओं के चलते जैसे घाव, छाले आदि के चलते जूते-चप्पल पहन लेते हैं।
अगर यात्रा के दौरान शौच जाना पड़ जाए तो कांवड़ को दोबारा उठाने के लिए खुद के ऊपर गंगा जल छिड़कना अनिवार्य माना जाता है। यात्रा के दौरान सफेद और केसरिया रंग के वस्त्र धारण करने की परंपरा भी मानी जाती है।

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