Edited By Niyati Bhandari,Updated: 10 Jun, 2026 12:37 PM

Mata Mansa Devi Shaktipeeth Panchkula: जानें शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित माता मनसा देवी शक्तिपीठ का प्राचीन इतिहास, अकबर काल की कथा और राजा गोपाल सिंह द्वारा निर्मित मंदिर की महिमा। यहां 40 दिन की पूजा से पूरी होती है मन्नत।
Mata Mansa Devi Shaktipeeth Panchkula: भारत की ऋषि-मुनियों द्वारा पवित्र की गई पावन धरा पर हरियाणा का पंचकूला जिला एक विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। यहां शिवालिक पर्वतमालाओं की गोद में स्थित सिद्ध माता मनसा देवी का मंदिर न केवल करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास का अनूठा संगम भी है।

यहां गिरा था माता सती के मस्तिष्क का अग्र भाग
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब यहां देवी के मस्तिष्क का अग्र भाग गिरा था, इसी कारण इसे 'मनसा देवी' कहा जाता है। शिव पुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के प्राण त्यागने के बाद दुखी शिव उन्हें कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे थे, जिसके बाद शक्तिपीठों की स्थापना हुई। तंत्र चूड़ामणि के अनुसार यहां स्थापित 51 शक्तिपीठों में से एक यह सिद्ध पीठ है, जहां देवी साक्षात निवास करती हैं।
जब सम्राट अकबर ने हटा दिया था तीर्थ यात्रियों पर लगा 'टैक्स'
मंदिर के इतिहास से एक बेहद रोचक कथा जुड़ी है। लगभग सवा चार सौ वर्ष पूर्व मुगल सम्राट अकबर के समय बिलासपुर गांव में देवी भक्त महंत मन्शा नाथ रहते थे। उस दौर में दिल्ली सल्तनत तीर्थ यात्रियों से एक रुपया कर (टैक्स) वसूल करती थी। महंत जी ने इसका पुरजोर विरोध किया और राजपूतों द्वारा मंदिर प्रवेश रोकने पर पहाड़ों पर अपना डेरा जमा लिया।
कहते हैं कि जब 1567 ईस्वी में अकबर कुरुक्षेत्र आए, तो महंत मन्शा नाथ और अन्य नागरिकों ने यात्रियों से वसूली की शिकायत की। अकबर ने उदारता दिखाते हुए तत्काल सभी तीर्थ स्थानों से कर वसूली पर रोक लगा दी, जिसके बाद मनसा देवी के दर्शनों के लिए भी राह आसान हो गई। महंत जी का धूना आज भी सीढ़ियों के पास उनके त्याग की याद दिलाता है।
राजा गोपाल सिंह ने 4 वर्षों में तैयार कराया वर्तमान भव्य मंदिर
वर्तमान मुख्य मंदिर का निर्माण मनीमाजरा के राजा गोपाल सिंह ने अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर सन् 1815 में करवाया था। मंदिर को पूर्ण होने में चार वर्ष का समय लगा था। मुख्य भवन के भीतर माता की मूर्ति के आगे तीन पिंडियां हैं, जो महालक्ष्मी, मनसा देवी और सरस्वती का स्वरूप मानी जाती हैं। इसके अलावा, पटियाला के महाराज द्वारा निर्मित मंदिर और प्राचीन गोल गुम्बदनुमा भवन भी परिसर की भव्यता बढ़ाते हैं।
हरिद्वार की मनसा देवी से क्यों अलग है यह शक्तिपीठ?
अक्सर लोग हरिद्वार स्थित मनसा देवी और पंचकूला की देवी को एक मान लेते हैं, लेकिन शास्त्रों में स्पष्ट अंतर है। हरिद्वार वाली माता मनसा देवी नागराज वासुकी की बहन और जरत्कारू की पत्नी मानी जाती हैं। जबकि पंचकूला की माता मनसा देवी 51 शक्तिपीठों में शामिल वह सिद्ध पीठ हैं, जो सती के अंगों से प्रकट हुईं।
40 दिन की भक्ति और पूर्ण होती है हर मुराद
भक्तों में यह अटूट विश्वास है कि यदि कोई सच्चे मन से निरंतर 40 दिनों तक माता के दरबार में हाजिरी लगाता है, तो उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में यहां भव्य मेला लगता है, जहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु माथा टेकने पहुंचते हैं।