Edited By Niyati Bhandari,Updated: 26 Sep, 2026 07:23 AM

Bhadrapada Purnima Shraddha 2026: पितृपक्ष 2026 में पूर्णिमा श्राद्ध कब और कैसे करें? जानें घर पर ही ऋषि तर्पण और पिंडदान की सरल विधि, सामग्री, मंत्र और पंचबलि नियम।
Bhadrapada Purnima Shraddha 2026: भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष का आरंभ होता है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा और उमा-महेश्वर व्रत का भी विधान है। पूर्णिमा श्राद्ध को 'ऋषि तर्पण' और 'प्रोष्ठपदी पूर्णिमा' भी कहा जाता है, जिसमें ऋषि अगस्त्य का तर्पण विशेष रूप से किया जाता है। श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के कुतूप काल (11:30 AM - 12:30 PM) या रोहिण काल में ही संपन्न करें। घर पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण और पिंडदान करने से पितृ तृप्त होते हैं।
पूर्णिमा श्राद्ध को 'ऋषि तर्पण' भी कहा जाता है
श्राद्ध पक्ष के आरंभिक दिन यानि पूर्णिमा के दिन करने वाले श्राद्ध को ऋषि तर्पण भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मंत्रदृष्टा ऋषि मुनि अगस्त्य का तर्पण किया जाता है। जिन्होंने प्राचीन समय में ऋषि मुनियों की रक्षा के लिए समुद्र को पी लिया था और दो असुरों को खा गए थे। मान्यता है कि इसी के सम्मान में श्राद्धपक्ष की पूर्णिका तिथि को इनका तर्पण करके ही पितृपक्ष की शुरुआत की जाती है।
शास्त्रों में वर्णन है कि जिनकी मृत्यु पूर्णिमा को हुई है उनका श्राद्ध पूर्णिमा को करते हैं। इनका श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को किया जाता है। जिसे प्रोष्ठपदी पूर्णिमा भी कहा जाता हैं।

Bhadrapada Purnima Shraddha vidhi इस विधि से करें पूर्णिमा श्राद्ध
पूर्णिमा पूनम होने के लिहाज से दूध में पकाए हुए चावल में शक्कर एवं सुगंधित द्रव्य जैसे इलायची, केसर और शहद मिलाकर खीर तैयार कर लें। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें। उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दें। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें। इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएं फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें। गाय, काला कुत्ता, कौआ, यह सब करते हुआ याद रखे आप का मुख दक्षिण दिशा की तरफ होना चाहिए साथ ही जनेऊ (यज्ञोपवित ) सव्य (बाई तरह यानि दाहिने कंधे से लेकर बाई तरफ होना चाहिए।
Bhadrapada Purnima Shraddha Rules श्राद्ध का नियम
गरुड़ पुराण और मात्स्य पुराण के अनुसार यदि श्राद्ध में अशुद्धता, अपमान, दिखावा या भूल होती है तो पितर अतृप्त हो जाते हैं और श्राद्ध का फल नहीं मिलता। दान-दक्षिणा बिना श्रद्धा या दिखावे के भाव से करना। श्राद्ध के दिन नया वस्त्र, आभूषण या विलासी सामान पहनना। पिंडदान में गाय के दूध, तिल और चावल का प्रयोग न करना। शास्त्रों में कहा गया है, "श्राद्धे ह्यश्रद्धया यत्कृतं तन्निष्फलं भवेत्।"
अर्थात – बिना श्रद्धा के किया गया श्राद्ध निष्फल होता है।
Tarpan Vidhi at home घर पर तर्पण करने की सरल विधि
तर्पण का अर्थ जल देकर पितरों को तृप्त करना है। इसे घर के आंगन या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में स्वच्छ स्थान पर संपन्न किया जा सकता है:
तैयारी व सामग्री: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (धोती/कुर्ता) धारण करें और हाथ में कुशा की अंगूठी (पवित्री) पहनें। तांबे के पात्र में शुद्ध जल, कच्चा दूध, काले तिल, जौ, तुलसी पत्र और सफेद फूल मिला लें।
दिशा व मुद्रा: तर्पण करते समय अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें।
जल अर्पित करने का तरीका: दोनों हाथों की अंजुली में जल भरकर, अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच वाले स्थान (पितृ तीर्थ) से जल को धीरे-धीरे पात्र में छोड़ें।
मंत्र व ध्यान: जल छोड़ते समय अपने पूर्वजों, माता-पिता व दादा-दादी का स्मरण करते हुए "ॐ पितृभ्यो नमः" या "तृप्यन्ताम्" मंत्र बोलते हुए 3-3 बार जल अर्पित करें।
