Sarfaroshi Ki Tamanna: जानिए रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन के अंतिम दिनों की कहानी, कैसे उन्होंने फांसी घर में 'सरफरोशी की तमन्ना' गाकर क्रांतिकारियों में जोश भरा और ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी।
Sarfaroshi Ki Tamanna: दिन के 12 बजे जब संतरी बदल गए तो नए संतरियों ने बहुत ध्यान से फांसी घर की कोठरियों को देखा। ताले देखे, जंगले देखे, फिर कैदियों की तरफ देखा। एक कोठरी खाली थी। बाकी तीन कोठरियों में तीन फांसी वाले बंद थे पर उनमें से किसी ने भी आज खाना नहीं खाया था। उनका खाना मिट्टी के बर्तनों में ज्यों का त्यों रखा हुआ था। फांसी वालों को मिट्टी के बर्तन इसलिए दिए जाते हैं कि वे धातु के बर्तनों से सिर न फोड़ लें!
रामदरस जमादार ने सुमेर जमादार से दृष्टि-विनिमय किया, फिर वे जाकर छोटे से हाते के दरवाजे पर बैठ गए। यों फांसी घर के संतरियों को बैठने का हुक्म नहीं था। उनके लिए हुक्म यह था कि एक जमादार फांसी की कोठरियों का एक तरफ से चक्कर लगाए, दूसरा दूसरी तरफ से यानी हर चक्कर में वे दो बार मिलें। इसीलिए रामदरस और सुमेर हाते के दरवाजे पर बैठ गए, जिससे कोई आता हुआ दिखाई पड़े तो वे चक्कर मारने लगें।
फांसी घर के कैदियों ने खाना क्यों नहीं खाया था, यह दोनों जमादारों को अच्छी तरह पता था। आज सवेरे चौथी कोठरी में बंद कृपाल सिंह को फांसी दे दी गई थी। इसी कारण फांसी घर में यह मातम छा गया था। नंबर एक और नंबर तीन कोठरियों के रहने वालों की अपीलें खारिज हो चुकी थीं; हां, नंबर चार वाले की अपील अभी बाकी थी, पर उसमें भी कोई गुंजाइश नहीं थी। उसने दिन-दहाड़े खेत में 2 व्यक्तियों की हत्या कर डाली थी। खेत का मामूली झगड़ा था।
रामदरस ने सुमेर से कहा, ‘‘इनमें से कोई छूटने वाला नहीं।’’
सुमेर को भी यहां ड्यूटी देते हुए महीनों हो गए थे, वह सबको अच्छी तरह जानता था। उदासीनता के साथ बोला, ‘‘जो जैसा करता है, वह वैसा भोगता है।’’
रामदरस ने कहा, ‘‘यह बात नहीं, कई बार बड़े-बड़े भयंकर मुजरिम साफ बरी हो जाते हैं।’’
सुमेर ने इसे अपने तर्क का प्रतिवाद नहीं समझा, बोला, ‘‘जाको राखे साइयां।’’
दोनों बीड़ी पीने लगे। हां उनकी दृष्टि जेल के फाटक की ओर लगी रही। थोड़ी देर बाद रामदरस बोला, ‘‘आज तो सबको जैसे सांप सूंघ गया है। तुम बैठो, मैं इनको बीड़ी पिलाता हूं।’’
‘बैठो’ का मतलब सुमेर को मालूम था। उसका अर्थ था, तुम पहरे पर रहो, मैं बीड़ी पिलाता हूं। कैदियों को बीड़ी पिलाना गैर-कानूनी था, पर कानून से ऊपर भी तो कुछ होता है। आखिर ये भी तो इंसान हैं, इन्हीं के साथ घंटों बैठना है। जो किया है, उसे तो भोगेंगे ही, पर इस तरह खाना छोड़ने से क्या फायदा? जब तक सांस, तब तक आस।
रामदरस ने तीनों फांसी वालों को बीड़िया दीं और स्वयं बीच में खड़ा होकर आत्म-प्रसाद का आनंद लेने लगा जैसे वह मानवता के साथ कोई बहुत भारी उपकार कर रहा हो।
सचमुच बीड़ी पीकर सब लोग उठ खड़े हुए थे और जहां एकदम मुर्दनी छाई हुई थी, वहां कम से कम कुछ चहल-पहल हो गई थी। अभी फांसी वाले बीड़ी पी नहीं चुके थे कि उधर से सुमेर ने कोई इशारा किया तो रामदरस ने फौरन तीनों फांसी वालों से बीड़ी के बचे हुए हिस्से ले लिए और जल्दी से बोला, ‘‘तुम लोग रोटी खाओ।’’
फिर दरवाजे की तरफ जाकर उसने झांक कर देखा और समझ गया कि चौथी कोठरी का निवासी आ रहा है। पर यह तो कोई गोरा चिट्टा तेजस्वी व्यक्ति मालूम होता था। साथ में 2 संतरियों के अतिरिक्त 2 नंबरदार और स्वयं जेलर साहब थे।
रामदरस और सुमेर ऐसे खड़े हो गए जैसे अभी तक वे गश्त लगा रहे थे और अब आहट सुनकर इधर आए हैं। रामदरस ने इस बीच एक काम और कर डाला, वह जल्दी से फांसी वालों के पास गया और बोला, ‘‘दो नंबर का आदमी आ रहा है।’’
जेलर साहब के साथ-साथ वह छोटा सा जुलूस फांसी घर के हाते के दरवाजे पर आया। कहीं से बड़ा जमादार आ गया और उसने हाते का ताला खोला। सब लोग भीतर दाखिल हुए और फिर बड़े जमादार ने स्वयं भीतर आकर दरवाजे को ताला मार दिया। दो नंबर कोठरी खोल दी गई। जो व्यक्ति इसके अंदर रहने के लिए आया था, वह कोठरी के दरवाजे तक आया, फिर सूंघ कर अधिकारी आवाज में बोला, ‘‘इसे साफ कराओ, इसमें बदबू आ रही है! फिनायल डलवाओ।’’
यह कह कर उसने घूम कर अन्य तीन साथियों को बारी-बारी देखा और हंसा- जैसे हंसी के द्वारा ही उनका अभिवादन किया हो। सब फांसी वाले उसे देखकर प्रफुल्लित हो गए। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि यह भी कोई फांसी वाला था, पर था वह फांसी वाला ही। ब्रिटिश सरकार 300 अन्य फांसी वालों को छोड़ सकती थी, पर इस रामप्रसाद बिस्मिल को नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि वह गत 13 साल से ब्रिटिश साम्राज्य को उलटने का षड्यंत्र कर रहा था। पहले उसने गेंदालाल दीक्षित के साथ षड्यंत्र किया, पर वह पकड़ा नहीं जा सका।
मैनपुरी में षड्यंत्र का बड़ा भारी मुकद्दमा चला, पर वह उस संबंध में गिरफ्तार नहीं किया जा सका। यहां तक कि वह अंत तक फरार रहा और जब 1919 में सरकार ने कुछ क्रांतिकारियों को आम माफी के सिलसिले में छोड़ दिया, तो उसे भी छोड़ना पड़ा।
उन्हीं दिनों जालियांवाला हत्याकांड हुआ। महात्मा गांधी देश के नेता के रूप में सामने आए, पर इस युवक को इससे संतोष नहीं हुआ। महात्मा गांधी ने भी तो चौरी-चौरा में जो पुलिस वाले जिंदा जला दिए गए, उसके उपलक्ष्य में चले-चलाए आंदोलन को बीच में ही रोक दिया।
फिर से क्रांतिकारी आंदोलन भड़क उठा। जाने कहां के दिलजले और सिर पर कफन बांधे हुए लोग इकट्ठे हो गए और अबकी विराट रूप में दल बना कर क्रांति का आवाहन चला।
शचींद्रनाथ सान्याल, चंद्रशेखर आजाद, मुकुंदी लाल, दामोदर स्वरूप सेठ, सुरेश चक्रवर्ती, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाक उल्ला और जाने कितने ही अज्ञात नाम और अज्ञातधाम युवकों ने मिलकर हिंदोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन कायम किया, जिसका उद्देश्य था क्रांति के द्वारा ऐसे समाज की स्थापना, जिस में मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण संभव न रह जाए।
अब तक इस फांसी घर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं आया था। बड़े जमादार दौड़े, सफैया आया, झाड़ वाला आया, झाड़ू आई, फिनायल आई और कोठरी की अच्छी तरह सफाई हुई जैसी कि शायद कभी नहीं हुई थी। सफाई होने के बाद बड़े जमादार ने कहा, ‘‘पंडित जी, तैयार हैं।’’
बिस्मिल उठे, कमरे को अच्छी तरह देखा, फिर बोले, ‘‘सूख जाने दो।’’
कहकर वह फिर चहलकदमी शुरू करने ही वाले थे कि एकाएक उनका मन पसीज गया कि हैं ये अंग्रेजों के गुलाम, पर हैं तो अपने भाई, इन्हें क्यों कष्ट दें। वह एकाएक कोठरी के अंदर चले गए और भीतर जाते हुए बोले, ‘‘लाओ मेरी पुस्तकें।’’
थोड़ी देर में कोठरी बंद हो गई। सब लोग चले गए, हां, दो और संतरी रह गए। पूरे फांसी घर के लिए दो संतरी थे और अकेले रामप्रसाद बिस्मिल पर दो संतरी! जेलर को पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि बाहर से चंद्रशेखर आजाद तथा अन्य साथी काकोरी षड्यंत्र के फांसी वालों को भगाने की चेष्टा कर रहे हैं।

सब फांसी वाले अपनी कोठरियों से अनुमान करने लगे कि पंडित जी क्या कर रहे हैं। थोड़ी देर में बिस्मिल चिल्ला-चिल्ला कर गीता के श्लोक गाने लगे, उसके बाद शायद यह समझ कर कि यहां गीता के श्लोकों से लोगों को उतना लाभ नहीं पहुंचेगा जितना दूसरे गीतों से, उन्होंने गाना शुरू किया—
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।
रहबर-ए-राहे मोहब्बत रह न जाना राह में,
लज्जत-ए-सहारा-नवर्दी दूरी-ए-मंजिल में है।
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चर्चा गैर की महफिल में है।
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमां की भीड़,
सिर्फ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-‘बिस्मिल’ में है।
सब लोग स्तब्ध होकर उनका गीत सुन रहे थे और सवेरे से फांसी घर के हाते में जो मुर्दनी छाई थी, वह बात की बात में दूर हो गई थी। जमादार भी गौरव का अनुभव करने लगे कि अब कोई कैदी की तरह बंदी आया है।
काकोरी मुकद्दमे के विषय में उन्होंने पहले ही सुना था और उन्हें मालूम था कि पंडित मोतीलाल नेहरू आदि की तरफ से एक कमेटी बनी है जो इस मुकद्दमे की पैरवी कर रही है। वे यह भी जानते थे कि काकोरी के पास जो रेल डकैती हुई थी, उसी से यह मुकद्दमा चला है। बिस्मिल इसी षड्यंत्र के नेताओं में थे।
बिस्मिल का मन इतना विस्तृत था कि वह हर समय बड़े-बड़े सपने देखा करते थे। एक तो हाईकोर्ट में मुकद्दमा हो रहा था, उसकी पैरवी की तैयारी यह कर रहे थे, दूसरे उन्हें चोरी से अपनी आत्मकथा भी लिखनी थी। थोड़ा-थोड़ा लिखा जाता और चोरी से वार्डन के हाथ ‘स्वदेश’ के दफ्तर में भेज दिया जाता और वहां क्रांतिकारियों के परम मित्र स्वयं अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के हाथों में पांडुलिपि पहुंच जाती।
यह पुस्तक बाद में ‘काकोरी के शहीद’ नाम से प्रकाशित हुई, पर तुरंत ही जब्त कर ली गई। फिर 30 साल बाद यह पुस्तक पुनर्मुद्रित हुई। लिखाई चलती रही, पर साथ ही जो 3 हतभाग्य उनके साथी बन गए थे, उनके लिए भी वह समय निकाल कर एक कार्यक्रम करते थे। वह स्वयं धार्मिक प्रकृति के थे और धर्म में उनका अगाध विश्वास था।
इस बात को लेकर उनमें और कई साथियों में जो अभी पूरे निरीश्वरवादी तो नहीं हुए थे, पर उस ओर बढ़ रहे थे, बड़ी चखचख रहती थी, पर इन बेचारे फांसी वालों को उन बातों को बताकर संशय में नहीं डालना था, वह उन्हें परलोक और परजन्म की बात समझाते और बताते कि यह जन्म सैंकड़ों अन्य जन्मों में एक है, मृत्यु तो इस प्रकार है जैसे एक कपड़ा बदलकर दूसरा पहन लिया। भगवान बड़ा दयालु है, वह सब कुछ क्षमा कर देता है, बशर्ते कि करने वाला पश्चात्ताप करे।
जब रामप्रसाद बिस्मिल फांसी वालों से ये बातें कहते थे, तो कोई उनका प्रतिवाद नहीं करता था, जैसे कि हवालात के कई साथी किया करते थे। उस समय तो वह प्रतिवाद बहुत बुरा लगता था, पर आज यह याद करके कि कोई प्रतिवाद नहीं कर रहा है, हृदय में एक टीस ही उठती थी। क्योंकि जीवन-मृत्यु के उन साथियों से फिर मिलना नहीं होना था। सब लोग अलग-अलग जेलों में बांट दिए गए थे और पूर्व-निश्चय के अनुसार इस समय फांसी की सजा पाए हुए क्रांतिकारियों के अतिरिक्त सब लोग अनशन कर रहे होंगे।
कोई परवाह नहीं, जान चली जाए तो जाए, पर प्रदीप जल रहा है; अभी वह टिमटिमा रहा है, पर जल्दी ही वह एक विशाल अग्निकांड का रूप धारण करेगा, जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य खाक हो जाएगा।
तीनों साधारण फांसी वालों में से एक-एक करके सब फांसी पर चढ़ते चले गए, पर क्रांतिकारी दल के इस लौह-पुरुष ने फांसी पर टंगने के लिए जाने वालों को ऐसा दृढ़ बना दिया कि वे खुशी से फांसी पर चढ़ते चले गए। कपड़ा ही तो बदलना है, इस में क्या धरा है! नया शरीर मिलेगा, तब पहले की गलतियां नहीं होंगी।
हर फांसी वाला, जिस दिन फांसी पर चढ़ना होता, उस दिन सवेरे फांसी पर चढ़ने के पहले उन की कोठरी के सामने ठिठक कर खड़ा हो जाता। यद्यपि यह बिल्कुल गैर-कानूनी बात थी, फिर भी जेल अधिकारियों ने इसे स्वीकार कर लिया था। बिस्मिल उसे सांत्वना के वाक्य कहते। वह पैर छूकर चल देता। बिस्मिल पीछे से कहते, ‘‘घबराओ मत, मैं भी जल्दी ही आ रहा हूं।’’
फांसी वाला तो चला जाता, पर बिस्मिल चिल्ला-चिल्लाकर बहुत जोर से गीता के श्लोकों की आवृत्ति करते और मन होता तो ‘सरफरोशी की तमन्ना’ गाते। फांसी लगने का स्थान बगल ही में था, केवल एक ही दीवार बीच में पड़ती थी। जिस समय वह व्यक्ति फांसी पर चढ़ जाता था, उसके कान में बिस्मिल की आवाज होती थी। पुराने फांसी वाले जाते गए, उनके स्थान पर नए फांसी वाले आते गए। बिस्मिल ने उन्हें समझाना जारी रखा। उसमें कभी कोई शिथिलता, कोई कमी नहीं आई।
19 दिसंबर, 1927 का वह दिन भी आया, जब स्वयं रामप्रमाद बिस्मिल को फांसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया गया। वह धीर गंभीर चरणों से फांसी के तख्ते की ओर गए और अंत में वह ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ कहते हुए फांसी पर चढ़ गए। उनका सुंदर सोने का तन थोड़ी ही देर में मांस का लोथड़ा-मात्र रह गया।
पर जिस दिन वह फांसी के हाते में गए थे, उस दिन बचे हुए लोगों में जो मायूसी छा गई थी, वह मायूसी वहां नहीं छाई। सब फांसी वाले रोए, यहां तक कि जमादारों ने भी चुपके-चुपके आंसू बहाए, पर किसी के मन में निराशा नहीं थी।
वह मर कर भी अमरत्व का संदेश छोड़ गए थे और यह सबसे बड़ी बात है कि ऐन फांसी का फंदा गले में डालते समय उन्होंने न ईश्वर का नाम लिया, न गीता के श्लोक कहे, बल्कि केवल ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ कहा!
