Edited By Sarita Thapa,Updated: 12 Apr, 2026 01:41 PM

रामायण की महागाथा में हनुमान जी को अनंत बलशाली और परम ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्र एक ऐसे प्रतापी योद्धा का भी वर्णन करते हैं जिसे हनुमान पुत्र होने का गौरव प्राप्त है।
Son of Hanuman Makardhwaj Story : रामायण की महागाथा में हनुमान जी को अनंत बलशाली और परम ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्र एक ऐसे प्रतापी योद्धा का भी वर्णन करते हैं जिसे हनुमान पुत्र होने का गौरव प्राप्त है। इस रहस्यमयी योद्धा का नाम है मकरध्वज। मकरध्वज के जन्म की कहानी जितनी अलौकिक है, उतनी ही रोमांचक भी, जिसका संबंध लंका दहन के बाद हनुमान जी के समुद्र में विश्राम करने से जुड़ा है। बिना किसी मिलन के हनुमान जी का पसीना कैसे एक पुत्र के जन्म का आधार बना और कैसे पाताल लोक के द्वार पर पिता-पुत्र का पहली बार सामना हुआ, यह कथा भक्ति और आश्चर्य का अद्भुत संगम है। तो आइए जानते हैं कि कौन था मकरध्वज और कैसे वह पाताल लोक का राजा बना।
कैसे हुआ मकरध्वज का जन्म?
मकरध्वज के जन्म की कथा उस समय से जुड़ी है जब हनुमान जी लंका दहन कर रहे थे। लंका को जलाने के बाद हनुमान जी अपनी पूंछ की आग बुझाने के लिए समुद्र में उतरे थे। लंका दहन के परिश्रम के कारण हनुमान जी के शरीर से पसीने की एक बूंद समुद्र के पानी में गिरी। उस पसीने की बूंद को एक विशाल मछली (मकर) ने निगल लिया। उस दिव्य पसीने के प्रभाव से वह मछली गर्भवती हो गई। उसी समय पाताल लोक के राजा अहिरावण के मछुआरों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब मछली का पेट चीरा गया, तो उसमें से एक वानर जैसी आकृति वाला शक्तिशाली बालक निकला। क्योंकि उसका आधा शरीर मछली जैसा था, इसलिए उसका नाम मकरध्वज रखा गया। अहिरावण ने उस बालक की शक्ति को देखकर उसे पाताल लोक के द्वार का रक्षक (द्वारपाल) नियुक्त कर दिया।
मकरध्वज और हनुमान जी की मुलाकात तब हुई जब रावण के भाई अहिरावण ने राम और लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल लोक की जेल में डाल दिया था। जब हनुमान जी प्रभु श्री राम को छुड़ाने पाताल लोक पहुंचे, तो द्वार पर एक बलशाली युवक ने उनका रास्ता रोक लिया। उसने खुद का परिचय हनुमान के पुत्र के रूप में दिया। हनुमान जी यह सुनकर हैरान रह गए कि वे तो ब्रह्मचारी हैं, फिर उनका पुत्र कैसे हो सकता है? तब मकरध्वज ने अपने जन्म की पूरी कथा सुनाई। हनुमान जी ने मकरध्वज को गले लगाया, लेकिन अपने स्वामी श्री राम की रक्षा के लिए उन्होंने मकरध्वज से युद्ध किया और उसे पराजित कर पाताल लोक में प्रवेश किया।
कैसे मिला हनुमान पुत्र होने का सौभाग्य?
हनुमान जी ने जब अहिरावण का वध कर दिया, तब भगवान श्री राम ने मकरध्वज की निष्ठा और शक्ति को देखा। मकरध्वज ने अपने पिता के विरुद्ध जाकर भी अपने कर्तव्य का पालन किया था। प्रभु श्री राम मकरध्वज से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने न केवल उसे हनुमान के पुत्र के रूप में स्वीकार किया, बल्कि उसे पाताल लोक का नया राजा भी घोषित किया। हनुमान जी ने भी अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया। आज भी कई स्थानों पर हनुमान जी के साथ मकरध्वज की पूजा की जाती है, विशेषकर गुजरात के द्वारका के पास बेट द्वारका में उनका प्रसिद्ध मंदिर है।
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