Edited By Sarita Thapa,Updated: 16 May, 2026 12:53 PM

भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में फैले करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र सतगुरु बावा लाल दयाल एक ऐसे दिव्य संत थे, जिनका जीवन स्वयं साधना, तप और आत्मिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है।
Satguru Bawa Lal Dayal Story : भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में फैले करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र सतगुरु बावा लाल दयाल एक ऐसे दिव्य संत थे, जिनका जीवन स्वयं साधना, तप और आत्मिक ज्ञान का जीवंत उदाहरण है। सन् 1355 ईस्वी में माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को लाहौर के समीप कसूर कस्बे में पटवारी भोलामल के घर जन्मे बावा लाल दयाल बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा और आध्यात्मिक तेज के धनी थे। बाल अवस्था में ही उनके मुखमंडल पर झलकती दिव्यता और व्यवहार की गंभीरता ने माता-पिता को चकित कर दिया। एक प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य ने यह भविष्यवाणी की कि यह बालक स्वयं तो मोक्ष की प्राप्ति करेगा ही, साथ ही अनगिनत आत्माओं को भी मुक्ति का मार्ग दिखाएगा। आगे चलकर समय ने इस भविष्यवाणी को अक्षरश: सत्य सिद्ध कर दिया।
बालक लाल ने प्रारंभिक आयु में ही शास्त्रों का गहन अध्ययन किया तथा अपने गुरु चैतन्य देव से अनेक योग सिद्धियां प्राप्त कीं। आध्यात्मिक संस्कार उन्हें अपनी माता श्रीमती कृष्णा देवी से मिले। विद्या, तप और योगबल के कारण वह आगे चलकर परम सिद्ध, योगीराज, ज्ञानी और परमहंस जैसी उपाधियों से विभूषित हुए। मान्यता है कि बावा लाल दयाल ने योग साधना के प्रभाव से लगभग तीन सौ वर्षों का दीर्घ जीवन प्राप्त किया तथा प्रत्येक सौ वर्ष के अंतराल पर पुन: बाल रूप धारण किया।
इतिहास के पन्नों में भी उनका उल्लेख मिलता है। मुगल शासक शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह बावा लाल दयाल की विद्वता, दिव्य दृष्टि और तेजस्वी व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुए। दोनों के बीच हुए आध्यात्मिक संवादों का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है। कहा जाता है कि इन गुणों से अभिभूत होकर दारा शिकोह स्वयं उनके शिष्य बन गए। बाल्यकाल में एक घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। गौएं चराते समय महात्माओं के एक दल से उनका साक्षात्कार हुआ। दल के प्रमुख संत अपने पैरों को ही चूल्हा बनाकर उस पर चावल पका रहे थे।

इस अद्भुत दृश्य को देख बालक लाल ने चरण वंदना की। संत ने उन्हें तीन दाने प्रसाद स्वरूप दिए। जैसे ही उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया, उनके अंत:करण में दिव्य प्रकाश का संचार हुआ और सांसारिक मोह-माया के बंधन टूट गए। बावा लाल दयाल को गुरमुखी, फारसी और संस्कृत सहित अनेक भाषाओं का ज्ञान था। वेद, उपनिषद् और रामायण जैसे ग्रंथ उनके कंठस्थ थे। उनकी विद्वता और आध्यात्मिक अनुभूति से जो भी संपर्क में आता, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
उन्होंने भारतवर्ष के अनेक तीर्थ स्थलों की यात्रा की तथा हरिद्वार, केदारनाथ जैसे पवित्र धामों में कठोर तपस्या की। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने आध्यात्मिक यात्राएं कीं। भ्रमण के दौरान जब वह पंजाब के गुरदासपुर जिले के कलानौर पहुंचे, तो वहां बहती नदी के तट पर साधना में लीन हो गए। यहीं उन्होंने अपने शरीर का कायाकल्प कर पुन: सोलह वर्ष का स्वरूप धारण किया।
यह क्षेत्र उनके मन को अत्यंत प्रिय लगा। उन्होंने अपने शिष्य ध्यानदास को ऐसे शांत स्थल की खोज में भेजा, जहां साधना के साथ स्थायी डेरा स्थापित किया जा सके। वह निकटवर्ती टीले पर उन्हें ले गए जो बावा लाल दयाल को इतना प्रिय लगा कि बाद में वही ध्यानपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहीं उन्होंने अपना स्थायी धाम बनाया। विक्रमी स वत् 1712 में सतगुरु बावा लाल दयाल इसी ध्यानपुर धाम में ब्रह्मलीन हुए, जहां आज भी उनकी समाधि श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ