Edited By Sarita Thapa,Updated: 23 May, 2026 11:56 AM

हिंदू धर्म में गंगाा दशहरा का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ माह में गंगा दशहरा का त्योहार मनाया जाता है। इस बार गंगा दशहरा 25 मई को मनाया जाएगा। माना जाता है कि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर ही मां गंगा धरती पर उतरी थी।
Ganga Dussehra Katha : हिंदू धर्म में गंगाा दशहरा का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ माह में गंगा दशहरा का त्योहार मनाया जाता है। इस बार गंगा दशहरा 25 मई को मनाया जाएगा। माना जाता है कि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर ही मां गंगा धरती पर उतरी थी। यही वजह है कि इस दिन को गंगा दशहरा के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन गंगा में स्नान करने, जप-तप और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। माना जाता है कि सच्चे मन से गंगा में स्नान करने और शिव जी की पूजा करने से जीवन में आने वाली हर परेशानी से छुटकारा मिलता है। इस दिन पूजा के साथ मां गंगा की कथा पढ़ने से जीवन में आने वाले हर परेशानी से छुटकारा मिलता है और सभी पापों का नाश होता है। तो आइए जानते हैं गंगा दशहरा की कथा के बारे में-
पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में अयोध्या में राजा भागीरथ हुआ करते थे। वह भगवान श्रीराम के पूर्वज भी माने जाते हैं। राजा भागीरथ के पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा के जल में उनका तर्पण करने की जरूरत थी। उस समय गंगा नदी सिर्फ स्वर्ग में बहती थी। भागीरथ के दादा और पिता ने गंगा को धरती पर लाने के लिए कई सालों तक तपस्या की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद राजा भागीरथ भी हिमालय में चले गए और कठोर तपस्या में लीन हो गए। एक दिन गंगा देवी भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न हो गईं और उन्होंने धरती पर आने का आग्रह स्वीकार कर लिया। मगर भागीरथ के सामने एक दुविधा आ खड़ी हुई। दरअसल, गंगा का वेग इतना ज्यादा था कि उसके धरती पर कदम रखते ही तबाही का खतरा हो सकता था।

राजा भागीरथ बेहद विचलित हो गए और भगवान शिव की अराधना करने लगे। इस बीच माता गंगा अपने गति को लेकर अहंकार में थीं। सिर्फ महादेव यानी भगवान शिव ही थे जो गंगा के वेग को नियंत्रित कर सकते थे। राजा भागीरथ को जब ये पता चला तो उन्होंने शिवजी की तपस्या शुरू कर दी। करीब एक साल तक वे एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर बिना कुछ खाए पिए शिवजी की आरधना करते रहे। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और गंगा को धरती पर लाने में उनकी सहायता करने का आग्रह स्वीकार कर लिया।
फिर ब्रह्माजी ने अपने कमंडल से गंगा की धारा प्रवाहित की। शिवजी ने अपने जटाओं में उस धारा को समेट लिया। लगभग 32 दिनों तक गंगा नदी शिव की जटाओं में विचरण करती रही। फिर ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन महादेव ने अपनी एक जटा खोली और गंगा का धरती पर अवतरण हो गया। भागीरथ ने हिमालय के दुर्गम पहाड़ों के बीच गंगा नदी का रास्ता बनाया और उसका पानी मैदानी इलाके तक पहुंचाने में मदद की। इसके बाद राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल से तर्पण कर उन्हें मुक्ति भी दिलाई। राजा भागीरथ के वजह से माता गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था इसीलिए उन्हें भागीरथी भी कहा जाता है। स्कन्दपुराण में गंगा दशहरे के दिन का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा नाम के स्मरण मात्र से ही सभी पापों का अंत हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक इस दिन जल, अन्न, फल, वस्त्र,पूजन व सुहाग सामग्री, घी, नमक, तेल, शक्कर और स्वर्ण का दान करने व्यक्ति को हर तरह का लाभ मिलता है। इसके अलावा गंगा दशहरा के दिन मां गंगा की वरदान पाने के लिए इस मंत्र का जाप भी करना चाहिए। मंत्र है ''ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः' मान्यता है कि इस मंत्र के जाप से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसे परम पुण्य की प्राप्ति होती है।

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